रविवार, 21 नवंबर 2010

हिंदी की उपेक्षा के दुष्परिणाम

यह कितना विरोधाभाष है कि एक ओर तो हम हिंदी को संयुक्त राष्ट्रसंघ में मान्यता दिलाना चाहते है दूसरी ओर हमारे देश में ही उसकी दुर्गति हो रही है। अभी उत्तर प्रदेश पीसीएस मुख्य परीक्षा का परिणाम आया है। इसमें शर्मनाक बात यह है कि 450 प्रतिभागी हिंदी विषय में फेल हैं। यह स्थिति अत्यंत निराशाजनक ही नहीं अपितु हमारी शिक्षा प्रणाली को भी सवालों के घेरे में खड़ा करती है। जिस प्रदेश ने हिंदी को समूचे विश्व को परिचित कराया। प्रदेश की सरकारी काम-काज की भाषा हिंदी है फिर इसी विषय में कुल प्रतिभागियों में से 10 फीसदी का अनुत्तीर्ण होना हमारी दिशाहीनता को इंगित करता है। इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि मुख्य परीक्षा में अधिकांश सफल प्रतियोगियों के हिंदी में नम्बर भी केवल पास लायक ही होंगे। युवाओं को इस वास्तविकता से परिचित होना चाहिए कि प्रशासन में आने के लिए हिंदी का ज्ञान आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य है। केवल अंग्रेजी रटने से वह प्रशासनिक सेवाओं में कभी नहीं आ सकते। यहां के लोगों की मातृभाषा भी हिंदी है। अतः इस भाषा में फिसड्डी रहना शिक्षा जगत के गाल पर तमाचा है। इस स्थिति के लिए कौेन जिम्मेदार है ? जिस भाषा को हमने मां की घुट्टी के रूप में प्राप्त किया है! उसमें हमारी कमजोरी दर्शाती हैे कि शिक्षा जगत अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन नहींे कर पा रहा है। जब प्रतियोगी हिंदी में ही फेल हैं तो उनके इतिहास, गणित, विज्ञान आदि अन्य विषयों में योग्य होने की उम्मीद करना बेकार है। इस स्थिति के लिए सरकार के साथ अभिभावक भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। उन पर अंग्रेजी का ऐसा भूत सवार हुआ है कि वह अपने बच्चों को कुकुरमुत्तों की तरह उगे कथित इंग्लिश मीडियम स्कूलों में प्रवेश कराकर गर्व का अनुभव करता है। बच्चा स्कूल में अधकचरे शिक्षकों से अंग्रेजी पढ़ता है और घर आकर हिंदी के वातावरण में चहलकदमी करने लगता है। इस विरोधाभास का दुष्परिणाम यह होता है कि बच्चा न तो अंग्रेजी भाषा में प्रवीणता प्राप्त कर पाता है और अंग्रेजी के चक्कर में अपनी मातृभाषा को भी भूल जाता है। इसका खामियाजा उसे आगे चलकर भोगना पड़ता है। हम वर्तमान परिप्रेक्ष्य की अनदेखी नहीं कर सकते कि अंग्रेजी विश्वभाषा का रूप धारण करती जा रही है। लेकिन हिंदी की कीमत पर विदेशी भाषा को आत्मसात करना न तो ज्ञान के लिए उचित है और न ही विज्ञान के लिए। हर व्यक्ति में विचार का प्रादुर्भाव उसकी अपनी भाषा में होता है। उसकी मेधा और ऊर्जा भाषा से ही प्रेरित और प्रभावित होती है। हिंदी की यह उपेक्षा केवल शिक्षा जगत में ही नहीं अपितु सभी जगह अपने पांव पसार चुकी है। मातृभाषा के अभाव में हमारा चिंतन मौलिक नहीं होता। जब चिंतन मौलिक नहीं होगा तो हम किस प्रकार नये अनुसंधान और शोध कर पायेंगे।

दिशाहीनता के शिकार भारतवासी



‘‘भारत ने अपना लगभग सब कुछ खो दिया-उसने अपनी आत्मा तक खो दी है। लेकिन हमें फिर भी चिंतित नहीं होना चाहिए और आशा नहीं छोड़नी चाहिए। किसी कवि ने कहा है, तुमको अपना पौरुष फिर से प्राप्त करना है। हां, अवश्य ही फिर से मनुष्य बनना है। इस सुन्दर भारत देश में इस समय ऐसे लोग विचर रहे हैं जारे निर्जीव अतीत की प्रेतात्माओं के समान हैं। चारों ओर निराशा है, मौत है, आरामतलबी है, बीमारी है, अटूट दुख है-भारत के सम्पूर्ण क्षितिज पर दुर्भाग्य के बादल छा गये हैं। ....लेकिन इस सम्पूर्ण निराशा,ज ड़ता, निर्धनता और भुखमरी के होते हुए भी तथा एक ओर भूख से पीड़ित लोगों की चीख-पुकार को डुबोते हुए, और दूसरी ओर विलासिता के दलदल में फंसे लोगों की पाखंडपूर्ण खिलखिलाहट को अनसुनी करते हुए, हमें दुबारा भारत का राष्ट्रीय संगीत छेड़ना है और वह है..........उत्तिष्ठ, जाग्रत।...उठो, जागो।’’

लगता है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा 27 दिसम्बर 1915 को अपने मित्र हेमंत कुमार सरकार को लिखे पत्र के यह अंश आज के भारत सी सच्ची तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हों। लगभग एक शतक होने के बाद भी भारत माता की वेदना में कोई अंतर नहीं आया है। हमने आजादी भले ही प्राप्त कर ली लेकिन अपनी आत्मा को खो दिया है। हमें पता ही नहीं कि हम किसके लिए और क्यों जी रहे हैं। न हमारे कोई सपने हैं और न ही राष्ट्रीय सरोकारों से हमें कोई मतलब रह गया है। हमारा राष्ट्रीय चरित्र खो चुका है। सिर्फ स्वार्थ-साधना ही हमारे जीवन का एकमात्र लक्ष्य बनता जा रहा है। देश दो भागों में बंट चुका है। एक और वह भारत है, जहां संपन्नता है, खुशी है। मस्ती है। संवेदनशून्यता है। अहंकार है। वहीं दूसरी ओर असली भारत है। जहां गरीबी है। बेरोजगारी है। शोषण और अत्याचार है। निराशा और चीत्कार है। अफसोस इस बात का है कि किसी भी देश की असली ताकत उसकी युवा शक्ति होती है। लेकिन लगता है कि उनके भी सपने मरते जा रहे हैं। शिक्षाध्ययन के बाद उनका एकमात्र लक्ष्य रोजगार पाना ही रह गया है। रोजगार पाने के बाद वह भी इसी सड़ी-गली व्यवस्था का अंग हो जाता है। लेकिन इसके लिए युवाओं को दोेषी नहींे ठहराया जा सकता। हम आजादी के बाद अपने लोगों को सपने तो आसमान से ऊंचे दिखाते रहे लेकिन उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं से महरूम रखा। यही कारण है कि युवाओं के सामने पहली प्राथमिकता अपने जीने के अस्तित्व की है। इसीलिए छात्र जीवन में कभी मार्क्स और कभी लोहिया दर्शन की बात करते नहीं अघाता युवा कालांतर में यथास्थितिवादी हो जाता है। ऐसे हालात में नहीं लगता कि हम देश को आगे ले जाने का साहस रखते हैं। केवल भौतिक विकास ही मनुष्य का वास्तविक विकास नहीं है। अगर लोगों में मानवीयता ही मर जाये तो ऐसे लोगों और पशुओं में अंतर ही कहां रह जाता है। यह देश का सामने बहुत बड़ा खतरा है। जिस आजादी के लिए कुर्बानियां दी गईं । उन शहीदों का नाम लेने वाला भी कोई नहीं है। सिर्फ स्वतंत्रता दिवस के दिन हम उन्हें रस्मी तौर पर याद कर लेते हैं। जब हमारे जीवन के आयाम ही बदल चुके हैं तो फिर कैसे जागेगा भारत। भूखा भारत कब तक इंतजार करता रहेगा विकास की भोर का। जीवन के हर क्षे़त्र में निराशा का वातावरण है। नैतिक मूल्यों की होली जलाई जा रही है। समाजसेवा का प्रतीक राजनीति अपने पथ से च्युत हो गई है। शिक्षा और चिकित्सा बाजारू हों गईं हैं। पहले लोग दूसरे के लिए जीने में विश्वास रखते थे लेकिन बदलते परिवेश मे वह दूसरों की जान की कीमत पर जी रहे हैं। आखिर हमारे इस स्वार्थपूर्ण आचरण का क्या परिणाम होगा। इस पर हमने विचार नहीं किया है। इसी प्रकार अगर लोगों में हताशा और निराशा बढ़ती गई तो निसंदेह शांति नहीं रहेगी। इसका खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ सकता है जो विलासिता में आकंठ डूबे हैं और जिनके कान में भूखों की चीत्कार नहीं पहुंच पा रही है। हमें अपने विकास मॉडल पर पुनर्विचार करना होगा। कुछ लोगों के विकास के लिए असंख्य लोगों को उजाड़ना बंद करना होगा। सामाजिक संरचना की अनदेखी के बिना विकास अधूरा है। क्या यह हमारे निजाम और कथित सभ्य समाज के गाल पर तमाचा नहीं है कि जहां मिड डे मील खाने से बच्चे इस लिए मना कर देते हैं कि उसे किसी दलित ने बनाया है। जाति और धर्म में जकड़ा भारत सुभाष के सपनों का कैसे भारत बनायेगा और कैसे अपने अस्तित्व के लिए हुंकारेगा....उठो, आगे बढ़ो।

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

मदन मोहन 'अरविन्द' को विशेष अकादमी सम्मान


जालंधर स्थित लायंस भवन के सभागृह में आयोजित एक भव्य समारोह में पंजाब कला साहित्य अकादमी द्वारा मदन मोहन 'अरविन्द' को विशेष अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया. इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश के पूर्व बागवानी मंत्री ठाकुर सत्य प्रकाश के हाथों प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिन्ह भेंट किये गए. समारोह में मिजोरम और आन्ध्र प्रदेश सहित देश के अठारह राज्यों से आये अनेक साहित्यकार और हिंदी सेवी उपस्थित थे. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं पंजाब के स्थानीय निकाय मंत्री श्री मनोरंजन कालिया के अतिरिक्त पंजाब की अन्य गणमान्य विभूतियाँ भी इस समारोह से जुडी रहीं.
विदित रहे कि मदन मोहन 'अरविन्‍द' हिंदी साहित्‍य के जाने माने रचनाकार हैं। कविता से लेकर गजल तथा कहानी लेखन में भी आप पारंगत हैं। देश की प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं अक्‍सर प्रकाशित होती रहतीं हैं। आकाशवाणी के विभिन्‍न केन्‍द्रों द्वारा भी आपकी रचनाएं प्रसारित होती हैं। उनके इस सम्‍मान पर जनसंदेश टाइम्‍स के संपादक डा। सुभाष राय, चर्चित ब्‍लॉगर अविनाश वाचस्‍पति, डा. महाराज सिंह परिहार आदि ने हर्ष व्‍यक्‍त किया है।

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

दीपावली पर सिसकते दीये

दीपों के पर्व दीपावली की चारों ओर धूम मची हुई है। शेयर बाजार आसमान पर चढ़कर हमारी आर्थिक समृद्धि का उद्घोष कर रहा है! सरकारी आंकड़ों की बाजीगAरी से देश की विकास दर बढ़ रही है लेकिन जमीन पर गरीबी अपना तांडव नृत्य कर रही है। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया व अखबार विलासिता के उत्पादों के विज्ञापनों से भरे हुए हैं। कहीं सोने की गिन्नी बिक रही है तो कहीं जड़ाऊ आभूषण। एलसीडी टीवी के साथ ही मंहगे परिधानों की एक से एक बढ़कर दिलकश रेंज है। महंगी कारों की बिक्री के रिकार्ड टूट रहे हैं। अतः दीपावली को देखकर लगता नहीं कि यहां कोई गरीबी है। चारों ओर देखकर मन भ्रमित हो जाता है कि किस प्रकार लक्ष्मी पैसों की मुक्त हस्त से बरसात कर रहीं हैं। इस जगमग और चकाचौंध से परे हटकर हम उन मलिन बस्तियों व गांवों को देखें जहां आज भी दो जून की रोटी के लाले पड़े हैं। गर्मियों में वह प्यासा मरता है क्योंकि उसके पास पानी खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। अब वह ठंड में वस्त्रों के अभाव में जान देगा। दवा-दारू के बिना तो वह हर समय मरता ही रहता है। वैसे भी गरीब की यही नियति है कि वह चाहे अकाल से मरे, बाढ़ अथवा भूकंप से मरे। भूखा मरे या प्यासा मरे। हमारे निजाम को इसकी कोई चिंता नहीं है। अखिर दीवाली का क्या यही संदेश है कि हमस ब घरों की रोशनी को छीनकर अपने घरों में कैद कर लें और इतना पुखता इंतजाम कर लें कि समृद्धि और शांति की एक भी किरण उन मजलूमों के घर नहीं पहुंचे ? आखिर कौन सुनेगा इनकी फरियाद ? अब त्रेता तो है नहीं कि श्रीराम बालि और रावण की भांति गरीबी और भ्रष्टाचार का वध कर दें। द्वापर भी नहीं है कि कृष्ण-कन्हैंया अपनी मुरली की तान से हमारे सारे कष्टों को हर लें। अब जमाना न किसी भगवान का है और न किसी राजा का। प्रजा ही राजा का चुनाव करती है। इतनी शक्तिशाली होने के बाद भी वह आज भूख और लाचारी से क्यों चीत्कार कर ही है। इस प्रश्न पर चिंतन करना होगा कि आखिर गलती कहां हो रही है ? उसके हितों पर डाका कौन डाल रहा है। लगता है कि हमारे नेताओं और समाजसेवियों की प्राथमिकता सूची से गरीब गायब है। तभी तो सारी योजनाओं का लाभ उस वर्ग को मिल रहा है जिसके पास पहले से ही सब कुछ है। ऐसा नहीं है कि हमारी सरकारें इन गरीबों की खुशी के लिए कुछ नहीं कर रहीं लेकिन उस विकास के दीपक को दलालों और भ्रष्ट नौकरशाही ने अपना गुलाम बना लिया है। परंतु अफसोस इस बात का है कि आम लोगों की दीवाली छीनने वाले निर्मम और क्रूरता की पराकाष्ठा पार कर रहे हैं। मिलावट ने इस पर्व को बेरौनक और अपावन बना दिया है। आज लोग देशी घी के दीपक के स्थान पर चर्बी का दीपक जलाने का विवश हैं। सिंथेटिक मिठाइयों से लक्ष्मी-गणेश का भोग लगाने को अभिषप्त हैं। जब तक ऐसे तत्व दीपावली के पर्व को कलंकित करते रहेंगे तो कहां मिटेगा अंधकार। एक बात हम बड़े गर्व से कहते हैं कि वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा के हमीं सर्जक है। अगर है तो वह यथार्थ में क्यों नहीं दिखाई देता। आखिर गरीब कब तक इंतजार करता रहेगा सच्ची दीपावली का। जब उसके यहां ज्ञान, धन और सम्मान की किरणें जगमग होंगी। उसके बच्चे किसी अमीर के बच्चों को पटाखें या फुलझड़ी चलाते बेवसी से नहीं निहारेंगे। वह भी फटे चिथड़ों के स्थान पर नये वस्त्र पहनकर लक्ष्मीजी की पूजा अर्चना करेंगे। वास्तव में सच्ची दीपावली तभी होगी जब हर व्यक्ति खुशहाल होगा। सत्य, अहिंसा, दया, करुणा और मैत्री की धारा बहेगी। हर अंधेरे में दीपक जलेगा और अज्ञान रूपी अंधकार को चीरेगा। मिलावटखोरी का अंत होगा। भ्रष्टाचार का खात्मा होगा। दरिद्र पर नारायण की कृपा होगी। अपमान, सम्मान में बदलेगा। अभाव का सिसकता चेहरा खुशी से दमकेगा। समाज में असमानता के स्थान पर समरसता अपना परचम लहरायेगी।