रविवार, 29 अगस्त 2010

बढ़ता भ्रष्टाचार और निठल्‍ला चिंतन करते बुद्धिजीवी



लोकसभा में सदस्यों के वेतन का मसला उठा। इस संदर्भ में मीडिया ने अपने समाचारों तथा बहस के द्वारा सिद्ध किया कि अधिकांश सांसदों की आय में कई गुना की वृद्धि हुई है। माना जा सकता है कि यह सब दूसरे रास्ते से हुआ होगा जिसपर आज देश चल रहा है। वस्तुतः देश के विकास को घुन की तरह खाये जा रहा है जीवन के हर क्षेत्र में पांव जमा बैठा भ्रष्टाचार। समाज के हर क्षेत्र में जो गिरावट आई है। उसके लिए यही जिम्मेदार है। शिक्षा जगत कभी शिक्षा का मंदिर हुआ करता था। ज्ञान और विज्ञान के लिए इन मंदिरों के आगे लोग श्रद्धा से सिर झुकाते थे। अब भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंसकर अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। शिक्षा के नाम पर दुकानें खुल गईं है। इनका प्रचार भी आम उत्पादों की तरह हो रहा है। हर कोई पास करने और सुरक्षित भविष्य की गारंटी दे रहा है। पैसे दो डिग्री लो, का मंत्र चहुंओर गुंजायमान हो रहा है। शिक्षक शिक्षक कर्म छोड़कर धन कमाने की अंधी दौड़ में किसी से पीछे नहीं है। वह केवल धन कमाने तक ही सीमित नहीं हैं अपितु उन्होंने अपनी नैतिकता को भी ताक में रख दिया है। चिकित्सा क्षेत्र में भी सेवा की जगह कमाई ने ले ली है। पृथ्वी का साक्षात भगवान अब कसाई में बदल गया है। वह विशुद्ध व्यापारी हो गया है। जिस प्रकार व्यापार में सब कुछ जायज है। उसी प्रकार इस क्षेत्र में व्यापार के सारे घोषित-अघोषित नियम चल रहे हैं। रातों-रात डाक्टर अथवा चिकित्सा व्यवसायी बेतहाशा दौलत के स्वामी हो गये हैं। जहां तक नौकरशाही की बात है। वह तो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। हमारी सेना कभी शौर्य और पराक्रम का प्रतीक मानी जाती थी। इसके अफसरों को देखकर देशवासियों का सिर सम्मान से झुक जाता था। आज वह चोरी-चकारी में व्यस्त है। इसका उदाहरण हम रोज अखबारों में देख रहे हैं। इस भ्रष्टाचार में लेफटीनेंट जनरल से लेकर मेजर जनरल, ब्रिगेडियर, कर्नल आदि अन्य अधिकारी रोज पकड़े जा रहे हैं। उनका कोर्ट मार्शल हो रहा है। व्यापारी मिलावट, कालाबाजारी और मुनाफाखोरी से अकूत धन कमा रहा है। बेबस है तो बस देश का आम आदमी। जो ईमानदार है। मेहनतकश है। वह भगवान अथवा खुदा से डरता है। अफसोस इस बात का है कि अब न तो समाज भ्रष्टाचार के मामले में चिंतित है और न ही सरकार। इस बात चौंकाने वाली है कि जब सरकार को यह पता है कि कुछ लोग कुछ सालों में बेतहाशा सम्पत्तियों के मालिक हो गये। जो सड़क पर घूमते थे। वह करोड़पति हो गये तो फिर सरकार मौन क्यों है ? सरकार का मौन यह दर्शाता है कि उसने भी भ्रष्टाचार को अनुमति दे दी है। हो सकता है कि सरकार इस मुद्दे को इसलिए हवा नहीं दे रही क्योंकि उसके कुछ सम्मानीय लोग भी इस लपेटे में आ सकते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि देश में असमानता, महंगाई और शोषण को मिटाना है तो सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़नी होगी। सामाजिक संगठनों सहित बुद्धिजीवियों को भी इस बारे में हस्तक्षेप करने की जरूरत है। वैसे बुद्धिजीवी भी कम नहीं है इस मामले में। अधिकांश कथित बुद्धिजीवी सत्‍ता के चारण भाट हैं और बचे खुले पूंजीपति घरानों के जरखरीद गुलाम हैं। इनसे देश की जनता को कोई बदलाव की आशा नहीं है। कमरे, ब्‍लॉग और फेसबुक पर निठल्‍ला चिंतन कभी देश की वर्तमान तस्‍वीर नहीं बदल सकेगा।

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

आगरा में संपन्न ब्लोगर्स मीट के फोटोग्राफ्स






हिंदी जगत के प्रमुख ब्लोगर दिल्‍ली निवासी अविनाश वाचस्पति के सम्मान में आगरा में २५ अगस्त को ब्लोगर्स मीट श्याम होटल स्थित अनु शर्मा के संसथान पर संपन्न हुई। इस गोष्ठी में बात-बेबात के ब्लोगर डाक्टर सुभाष राय, व्यंगम शरणम्.......के डाक्टर राकेश शरद, विचार-विगुल के डाक्टर महाराज सिंह परिहार, गहराइयाँ के डाक्टर त्रिमोहन तरल, महामिलन के डाक्टर राजेंद्र मिलन, मदन मोहन शर्मा (अरविन्द), संजीव गौतम, कमल आशिक, अनु शर्मा, अरविन्द समीर,डाक्टर केशव शर्मा आदि मौजूद थे। इस अवसर पर ब्लॉग चर्चा सहित काव्य पाठ हुआ।
इसी गोष्ठी की चित्रावली का अवलोकन करें।

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

छत की टीन पुरानी उसको तड् तड् नहीं बजाओ................. आगरा में हुआ ब्‍लॉगर्स मिलन




बरसात का मौसम और ब्‍लॉगरों की म‍हफिल। अजीब संयोग था। इस पर भी कविता की भीनी-भीनी फुहार। मन मयूरा नाच उठा। एक घंटे का कार्यक्रम कब तीन घंटे तक चलता रह़ा पता ही नहीं चला। दरअसल बात यह थी कि हमारे दिल के ब्लोगर भाई अविनाश वाचस्‍पति अपनी आगरा स्थित ससुराल सनूने यानी रक्षाबंधन पर बूरा खाने आये। इसी दिन डीएलए कार्यालय में उनसे मुलाकात हो गई। उसी दौरान डा। सुभाष राय से सलाह-मशविरे के दौरान यह राय बनी कि पच्चीस अगस्‍त को कहीं ब्लॉगरों की बैठक हो। स्थान लगभग तय हुआ सेंट जौंस क्रासिंग से आगे, लोहामंडी रोड पर श्याम होटल के भूतल स्थिति अनु शर्मा की अंग्रेजी सीखने संस्‍थान पर।


जैसे ही मैं कार्यक्रम स्थल पर पहुंचा। वहां डा; सुभाष राय, अविनाश वाचस्पति, मदन मोहन शर्मा *अरविंद* सहित शहर के चर्चित साहित्यकार डा. राजेन्द्र मिलन पहले से ही मौजूद थे। उसके बाद में ब्‍लॉगर व कवियों का आना आरंभ हुआ। व्यंग्याचार्य डा. राकेश शरद की कुछ ब्लॉग सम्बंधी जिज्ञासाओं के निवारण के लिए अविनाश जी ने कुछ टिप्स दिए। फिर इसके बाद शुरू हुआ कविताओं का दौर। इस अनौपचारिक व अध्यक्ष विहीन कवि गोष्ठी का शुभारंभ मदन मोहन अरविंद के भीगे आंचल में सिमटी सी बदली घर-घर घूम रही है, इकलौते चिराग की टिमटिम मौसम का रूख भांप रही थी, प्रस्तुत किया। गीत से हुआ। संजीव गौतम ने 'सोने चांदी सी कभी तांबे जैसी धूप........ तथा अविनाश जी ने लौकी पुराण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी। पुष्पेन्द्र शर्मा ने जीवन को परिभाषित किया-जिंदगी तलाश है किसी गुमशुदा की....। डा. केशव शर्मा ने ब्रज का लोकगीत तथा अनु शर्मा ने अपने मन की बात कही। डा. राजेन्द्र मिलन ने संचार क्रांति पर प्रहार करते कहा-मेरे भारत देश का अजब हुआ है हाल॥बातें तो सस्‍ती हुईं महंगी रोटी दाल तथा कमल आशिक 'करवटें बदलता रहा मैं रात भर - जाने क्‍यूं तड्फता रहा रात भर एवं डा. महाराज सिंह परिहार ने 'मौन निमंत्रण की बातें मत आज करो......व अरविंद समीर ने 'बुझादो शौक से मुझको...पेश किया। गोष्ठी को शिखर पर पहुंचाया अपने तीखे तेवरों से डा। त्रिमोहन तरल ने - छत पर टीन पुरानी उसको तड. तड. नहीं बजाओ, बरखा हौले हौले आओ.... तथा डा. सुभाष राय ने ' लोग जीने की रिहर्सल कर रहे हैं, एक नाटक है जहां मुर्दे भी चल रहे हैं प्रस्तुत किया।

रविवार, 22 अगस्त 2010

अन्नदाता पर गोलिया: किसानों पर अत्याचार क्यों

एक ओर तो हम किसान को अन्नदेवता कहते नहीं थकते। वहीं दूसरी ओर किसान को समाप्त करने का कुचक्र जारी है। विभिन्न सरकारी अथवा गैरसरकारी योजनाओं के लिए किसानों की भूमि का जबरन अधिग्रहण किया जा रहा है। जब किसान इस अधिग्रहण का विरोध अथवा उचित मुआवजे की मांग करता है तो उसे गोलियों से भून दिया जाता है। सरकार किसनों के लिए घड़ियाली आंसू बहाती है। कई योजनाएं भी चालू करती है। लेकिन उसे न तो राहत मिली है और न ही उसके जीवन में खुशहाली आई है। सारे देश में अघोषित रूप से षड़यंत्र जारी है कि किसान से उसकी जमीन छीन लो और उसे दर-दर का भिखारी बना दो। जब खेती नहीं रहेंगी तो किसान भी नहीं रहेगा। फिर बहुराष्टीय कंपनियां यहां मनमानी कीमतों पर खाद्यान्न बेचेंगी और देश भुखमरी की दिशा में अग्रसर होगा। आखिर सरकार 1894 में ब्रिटिश काल में बने भूमि अधिग्रहण अधिनियम में किसान व देश हित में उचित संशोधन क्यों नही करती ? विगत वर्ष जब सरकार की अधिग्रहण नीति के खिलाफ बंगाल के सिंगूर में किसान जब सड़क पर आ गया तो सरकार को झुकना पड़ा। किसानों को बंगाल के किसानों के संघर्ष से प्रेरणा लेनी चाहिए।

अधिग्रहण और बिक्री पर लगे रोक
जिस तेजी से देश में औद्योगीकरण बढ़ रहा है। यातायात के लिए सड़के बन रहीं है। इस तथाकथित विकास की बलिवेदी पर देश की बहुमूल्य सिंचित कृषि भूमि भेंट चढ़ रही है। आज तेजी से खेती का रकबा कम होता जा रहा है। इस ओर न किसान का ध्यान है और न सरकार का। उपजाऊ कृषि भूमि के अधिग्रहण और बिक्री पर रोक लगनी चाहिए। अगर इसी तरह कृषि भूमि का अधिग्रहण और बिक्रय जारी रहा तो देश अन्न के दाने-दाने के लिए तरस जायेगा।

खेतिहर मजदूरों की अनदेखी
सरकार जब किसी कृषि भूमि का अधिग्रहण करती है तो किसान को उसका मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देती है। लेकिन इस अधिनियम में खेती पर सदियों से आश्रित खेतिहर मजदूरों के पुर्नवास की कोई व्यवस्था नहीं है। खेती की जमीन का अधिग्रहण हो तो खेतिहर मजदूरों को भी पर्याप्त मुआवजा मिलना चाहिए। अधिग्रहण की सबसे भयानक मार तो खेतिहर मजदूर पर पड़ती है। उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। किसान को तो मुआवजा मिल जायेगा लेकिन खेतिहर मजदूर भुखमरी का शिकार होगा।

एलीट वर्ग के लिए किसानों पर कहर
किसानों की भूमि पर सरकारी जबरिया कब्जा न देश के विकास के लिए हो रहा है और न ही किसानों के परिवारों के लिए। देश के एलीट वर्ग के लिए किसानों पर कहर ढाया जा रहा है। देश के आम आदमी को न सिक्स लेन सड़क की जरूरत है और न ही हाईटेक सिटी की। यह चौड़ी सड़के अमीरों की कीमती कारों तथा टाउनशिप करोड़पतियों के लिए बनाये जा रहे हैं। सरकार के इस कदम से किसान दर दर का भिखारी हो जायेगा।

बंजर और अनुपजाऊ भूमि पर निर्माण
जब देश में लाखों एकड़ जमीन बंजर और अनुपजाऊ है। फिर सरकार की निगाहें सोना उगलती उपजाऊ कृषि भूमि पर क्यों है ? क्या बंजर जमीन पर सड़क और अन्य निर्माण कार्य नहीं हो सकते। वैसे भी देश में अन्न का संकट है। कम पैदावार के कारण गरीब आदमी कराह रहा है। किसी भी कीमत पर सिंचित कृषि भूमि का अधिग्रहण नहीं होना चाहिए। सरकार और निजी क्षेत्र को अपनी परियोजनाएं बंजर क्षेत्रों में आरंभ करनी चाहिए। इससे औद्योगीकरण की रफतार बढ़ेगी और कृषि भूमि सुरक्षित रहेगी।

किसानों की पीढ़िया बर्वाद होंगी
एक किसान अपनी विरासत में अगली पीढ़ियों को केवल खेती का टुकड़ा दे जाता है। यही खेती का टुकड़ा परिवार के भरण पोषण का माध्यम बनता है। अगर यही टुकड़ा उससे छिन जाये तो उसकी भावी पीढ़िया भूखमरी से रूबरू होंगी। ही किसान के जीवन का एकमात्र आसरा होता है। अगर वही उससे छिन जायेगा तो वह बिना आत्मा के शरीर जैसा प्रतीत होगा। हमें ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जिसमें खेती भी न उजड़े और देश का विकास हो।




शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

देश के सांसदों की वेतन वृद्धि


सांसदों की वेतन वृद्धि के मामला जनमानस में चर्चा का विषय बना हुआ है। अधिकांश लोग कहते हैं कि इनके पास अकूत पैसा है फिर इन्हें अपनी तनख्वाह बढ़वाने की क्यों पड़ी है। गरीब जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले इन सांसदों को आम जनता की बेवसी का तो ख्याल रखना चाहिए और सादगी तथा त्याग का परिचय देना चाहिए। दरअसल वास्तविकता यह है कि विगत कई दशक से हमारे जनप्रतिनिधियों की छवि आम जनता में अच्छी नहीं है। अधिकांश तो भ्रष्ट है और अधिकाधिक सदस्य करोड़पति। लेकिन लोग भूल जाते हैं कि देश सभी सांसद भ्रष्ट और धनी नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि कुछ सांसद तो इतने ईमानदार है कि वह विरासत में अपने परिवार के लिए एक अदद पक्का मकान भी नहीं छोड़ कर जाते। वाम दलों के सांसदों का पूरा वेतन पार्टी फंड में जमा होता है और वह केवल महंगाई व दैनिक भत्तों से ही अपना तथा अपने परिजनों की गुजर-बसर करते हैं। वह पूरे चैबीस घंटे जनता की सेवा में रहते है। उन्हें अपने से मिलने वालों को चाय-नाश्ता तथा आवश्यकता पड़ने पर खाना भी खिलाना पड़ता है। हां यह वेतन वृद्धि उन सांसदों के लिए कोई महत्व नहीं रखती जो पूंजीपति हैं। फिल्म स्टार हैं अथवा अन्य धंधों से जुड़े हुए हैं। इस संदर्भ में लोकसभा में लालू प्रसाद यादव का यह बयान भी गौर करने वाला है कि महंगाई के दौर में उन्हें भी अन्य लोगों की भांति अपनी वेतन वृद्धि की मांग करने का हक है। जो सांसद जनता से सीधे जुड़े अर्थात् लोकसभा के सदस्य हैं। उनकी अपने क्षेत्र की जनता के प्रति बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। जब उनके क्षेत्र के गरीब-गुरबा दिल्ली आते हैं तो इन सांसदों को उनके भोजन तथा किराये आदि का इंतजाम करना पड़ता है। हां जो हवा-हवाई नेता हैं। टेबल पाॅलिटिक्स करते हैं अथवा जुगाड़बाजी से राज्यसभा में पहुंच जाते हैं। उन लोगों पर जनता का प्रत्यक्ष दवाब नहीं होता। केवल राजनीति करने वाले सांसद के लिए वस्तुतः वर्तमान वेतन अपर्याप्त है। इस वेतन से वह ईमानदारी से अपने क्षेत्र के लोगों से न तो संपर्क रख सकते हैं और न ही उनकी आवभगत कर सकते हैं। एलीट वर्ग के मंत्रियों और सांसदों को शायद पता नहीं है कि जब दिल्ली में पूर्वांचल,बिहार, उड़ीसा, महाराष्ट और मध्यप्रदेश, झारखंड का आम आदमी आता है तो वह सांसद के निवास पर ही ठहरता है। वह सांसद को राजी-गैरराजी भोजन और चायपानी के लिए विवश कर देता है। कुछ जुझारू और गरीब मतदाता तो अपने सांसद से दिल्ली आने का किराया लेना अपना अधिकार और मजबूरी मानते हैं। जब देश में सभी की आय बढ़ रही है। व्यापारी कालाबाजारी करके अरबों कमा रहा है। नौकरशाही भ्रष्टाचार की गंगा में गोते लगा रहा है। तो सैद्धांन्तिक रूप से सांसदों की वेतन वृद्धि को अनुचित करार नहीं दिया जा सकता।

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

डाक्टर परिहार का स्वाधीनता दिवस पर विशेष

जश्न-ए-आजादी

जश्न मन रहा आजादी का मेरे भारत देश में
बगुले भी मुस्तैद खड़े हैं अब हंसों के वेश में

मिटी गरीबी ना भारत की
केवल मिटा गरीब है
लूटा देश स्वार्थ की खातिर
जो सत्ता के करीब हैं
जीवन की मुस्काने छीनी
छीना बचपन बाल का
त्ंादूरों में हर महिला है
रूठा यौवन लाल का

घोटालों की घिरी कालिमा अब सारे परिवेश में
बगुले भी मुस्तैद खड़े हैं अब हंसों के वेश में

लुच्चे चोर दलालों का ही
केवल यहां सम्मान है
नैतिकता को देदी फांसी
सत्य गया श्मशान है
कदम कदम पर रिश्वतखोरी
और भ्रष्टों की खान है
ईमान यहां बिकता टुकड़ों में
अंधा हुआ विधान है

अमर तिरंगा शरमाता है आपस के विद्वेष में
बगुले भी मुस्तैद खड़े हैं अब हंसों के वेश में

जग जवानी जाग देश की
तुझे वतन की आन है
परिवर्तन का बिगुल बजादे
यही तुम्हारी शान है
सच्चाई का शंखनाद कर
भ्रष्टों को ललकार दो
रोटी कपड़ा दो जन-जन को
सबको प्यार दुलार दो

फिर फुदके सोने की चिड़िया सारे देश विदेश में
बगुले भी मुस्तैद खड़े हैं अब हंसों के वेश में

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

दूसरी आजादी की जंग की ज़रुरत

कभी वो दिन भी आएगा कि आजाद हम लोंगे
ये अपनी ही जमीं होगी, यह अपना आस्मां होगा
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा

शहीद कवि ओम प्रकाश की यह पंिक्तयां हमसे प्रश्न करती हैं कि हमने अपनी कुर्बानी देकर भारत को आजाद तो करा लिया लेकिन क्या बाकई में आजादी आई है या वह कुछ लोगों के घर की दासी बन गई है। आजादी के छह दशक बाद भी न तो देश से गरीबी मिटी और न ही बेकारी। धन का वितरण इस प्रकार हुआ कि मुट्ठी भर लोगों के हाथ में देश की अधिकांश सम्पदा है। आजादी से क्या हर चेहरे पर मुस्कान आई ? क्या गरीबों को जीने का हक मिला ? क्या आजाद भारत में कानून का शासन है ? क्या देश के कर्णधारों सामाजिक और आर्थिक विषमता मिटाने के लिए कुछ किया ?
लगता है कि हम आजादी के महत्व को भूल गये हैं। जिस स्वाधीनता के लिए हजारों लोगों ने कुर्बानी दी। लाखों लोग ब्रिटिश हूकूमत की जेलों में गये। यातना और उत्पीड़न के दौर से रूबरू रहकर जिन लोगों ने देश को आजादी दिलाई। उनकी आत्मा निश्चित रूप से चीत्कार कर रही होगी। शहीदों ने क्या ऐसे भारत की परिकल्पना की होगी। जहां अनाज गोदामों में सड़ता हो और जनता भूखी मरती हो। अपने हकों के लिए आवाज बुलंद करने पर उनके सीने पर गोलियां बरसती हों। सादगी और सात्विकता के मिसाल हमारे नेता वस्तुतः आज विलासिता में डूबे हुए हैं। उन्हें न तो देश की आजादी से मतलब है और न ही उस कोटि-कोटि जनता से जिन्होंने आजादी के बाद अपने भाग्य पलटने की कल्पना की होगी। आजादी के बाद भौतिक विकास हुआ लेकिन इस दौर में हमने अपनी परम्परागत संपदा राष्टीय चरित्र को मिटा दिया। ईमानदारी और नैतिकता केवल किताबों और भाषणों तक ही सीमित रह गई है। भ्रष्टाचार का अजगर हमारी समूची अर्थव्यवस्था को पंगु बनाये हुए है। जातीय सामंत पहले से अधिक खूंखार होकर विचरण कर रहे हैं। शिक्षा और चिकित्सा को इतना महंगा कर दिया गया कि आम आदमी के सामने मरने और अशिक्षित रहने के कोई चारा नहीं हैं। जीवन के हर क्षेत्र में गिरावट आई है। विचारधारा औेर सिद्धांतों की राजनीति के स्थान पर अब धन-पशु और माफिया हावी है। जाति और धर्म के नाम पर वोटों की फसल बेखौफ काटी जा रही है। जनता का विश्वास आज की भ्रष्ट राजनीति से उठता जा रहा है। बेसहारा और बेजुबान लोगों का आक्रोश विविध रूपों में सामने आ रहा है। रोम जल रहा है लेकिन नीरो को बंशी बजाने से ही फुर्सत नहीं है।
प्रथम स्वाधीनता समर के दौरान जफर ने सही कहा था -
हिन्दियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की
तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।
आज आवश्यकता दूसरी आजादी के संग्राम की हो। जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ा जाना चाहिए। सामाजिक और आर्थिक असमानता के खिलाफ लड़ा जाना चाहिए। मुनाफाखोरी और मिटावटखोरी के खिलाफ लड़ा जाना चाहिए। स्वाधीनता दिवस पर केवल तिरंगा फहराने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। हमने बहुत बड़ी कुर्बानी देकर यह आजादी पाई है। हमारी आजादी को बाहरी शक्ति से नहीं अपितु देश में छिपे जयचंदो-मीरजाफरों से खतरा है। आओ हम उनकी शिनाख्त करें और ऐसे तत्वों के खिलाफ युद्ध छेड़े जो भारत माता को पुनः गुलामी की जंगीरों में जकड़ने का प्रयास कर रहे हैं। आओ! हम स्वाधीनता दिवस पर शपथ लें कि देश को वास्तविक आजादी दिलाने के लिए संघर्ष करेंगे। यह संघर्ष कलम, तूलिका से लेकर विचारधारा के हथियार के साथ लड़ा जायेगा।

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

वैल्थलूट यानी कोमन वैल्थ खेल

यह दुखद स्थिति है कि जब भारत की लोकसभा महंगाई पर गंभीर रूप् से चिंतन मनन करने में व्यस्त है। ऐसे समय में कॉमनवैल्थ खेल के घपले भी सामने आ रहे हैं। कई हजार करोड़ से हाने वाले इन राष्टमंडल खेलों से आखिर भारत को क्या हासिल होगा ? क्या यहां के खेलों का स्तर ऊंचा होगा और देश में खेल क्रांति की संभावना बनेगी। लगता है कि खेल के नाम पर खेल हो रहा है। रोज नये-नये घपले उजागर हो रहें हैं। इसके नाम पर दिल्ली सरकार ने तो अनुसूचित जातियों के विकास को मिलने वाली ग्रांट ही इस खेल में लगा दी है। कई कंपनियों को अवैध रूप् से धन का स्थानांतरण किया जा रहा है। लगता है कि आईपीएल के बाद देश में खेल के नाम पर दूसरा घपला होने जा रहा है। राष्टमंडल खेलों से देश में खेल का विकास हो अथवा न हो लेकिन इस खेल के नाम पर करोड़ों, अरबों का खेल हो रहा है।
यह हमारे लिए शर्म की बात है कि क्रिकेट के अतिरिक्त देश में अन्य खेल विलुप्त होते जा रहे हैं।
हमारे परम्परागत खेल कहीं दिखाई नहीं देते। कभी हम हाकी के बेताज बादशाह थे लेकिन आज हाकी में हमारी अपमानजनक स्थिति है। कितना अच्छा होता कि हम हाकी, फुटबॉल, तैराकी, एथलीट, पहलवानी, तीरंदाजी आदि में अपना परचम समूचे संसार में फहराते। स्वस्थ और मजबूत भारत के लिए खेलों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इस मामले में कॉमनवैल्थ खेल मील का पत्थर साबित हो सकते हैं। एक तरफ देश भूख, गरीबी और बेतहाशा महंगाई से जूझ रहा है। सरकार आम आदमी की रोटी की बात तो दूर शुद्ध पेयजल भी मुहैया नहीं करा पा रही है। ऐसे में कॉमनवैल्थ खेल के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई का बंदरबांट हो रहा है। वास्तव में सरकार महंगाई से जनता का ध्यान बांटने के लिए इन खेलों का सहारा ले रही है। इतना महंगा खेल भारत जैसे गरीब देश के लिए शोभा नहीं देता। जिस देश के लोग भुखमरी का शिकार हों। उनके लिए यह खेल मात्र विलासिता ही हैं।
आखिर क्या बुराई है कॉमनवैल्थ खेल आयोजन में। इस आयोजन से देश में काफी संख्या में विदेशी आयेंगे। देश का पर्यटन बढ़ेगा और देश में खेलों के प्रति जुनून जाग्रत होगा। हमें नकारात्मक सोच का त्याग कर सकारात्मक सोच अपनाना चाहिए। इन खेलों के नाम पर दिल्ली सहित अन्य नगरों में जो विकास हो रहा है। उससे वास्तव में यहां के निवासी ही लाभांवित होंगे। खेल वैसे भी मानव के लिए जरूरी है। इससे हममें अधिक प्रतिस्पर्धा की भावना जाग्रत होगी और हमारे खिलाड़ियों की प्रतिभा निखरेगी।
हम भले ही कॉमनवैल्थ खेलों के नाम पर खुश हों कि देश में महत्वपूर्ण खेल हो रहे हैं। लेकिन इस वास्तविकता से इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारे देश में खेलों का बुनियादी ढांचा ही ध्वस्त हो चुका है। हमारे स्कूल और कालेजों में खेल का बुनियादी ढांचा ध्वस्त हो गया है। खेल मैदानों में कॉम्पलैक्स और मार्केट बन गये हैं। स्कूल और कॉलेज के अधिकांश मैदान विवाह स्थल में परिणित हो गये हैं। अधिकांश निजी शिक्षा संस्थानों में तो क्रींडांगन तथा क्रीड़ा शिक्षक भी नहीं है। वास्तव में बच्चे में खेल का अंकुर छात्र जीवन से ही अंकुरित होता है। वही कालांतर में अच्छे खिलाड़ी बनते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली खेल विरोधी है। बच्चों पर पढ़ाई का इतना अधिक बोझ लाद दिया गया है कि वह चाहकर भी खेल में भाग नहीं ले पाते। जब बच्चों पर उनके वजन से अधिक किताब-कापियों का बोझ होगा तो वह खेल की ओर कैसे उन्मुख होंगे। कॉमनवैल्थ खेलों से भारत को कुछ विशेष हासिल नहीं होगा।

चिट्ठों में छिनालवाद और ज्योतिष

हिंदी चिट्ठाजगत अपनी ऊंचाइयों पर है। साहित्य तो समूचे ब्लॉग जगत में सिर पर चढ़कर बोल रहा है। शौकीन अथवा मात्र ब्लाग लेखन से अलग कुछ ऐसे भी व्यक्तित्व हैं जिनके कारण हिंदी चिट्ठाजगत स्वयं गोरवांवित हो रहा है। ऐसे ही ब्लॉगर हैं गिरीश पंकज। पंकज का ब्लॉग वैचारिक पैनापन लिए हुए है। मौलिक और विषय के सूक्ष्मविश्लेषण के साथ प्रस्तुत उनकी पोस्ट सहज ही अपनी ओर खींचती हैं। वह साहित्य जगत का चर्चित नाम है। वह विगत पैतीस सालों से साहित्य एवं पत्रकारिता में समान रूप से सक्रिय हैं। विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी पंकज की बत्तीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका काव्य, व्यंग्य, कहानी, उपन्यास चिंतन सहित प्रत्येक विधा पर समान अधिकार है। मन दर्पण नाम से उनका ब्लॉग इस समय चर्चा में बना हुआ है क्योंकि उन्होंने नया ज्ञानोदय में प्रकाशित महात्मा गांधी हिंदी अन्तर्राष्टीय विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा लेखिकाओं के लिए प्रयुक्त ‘छिनाल‘ शब्द को अपने तरीके से व्यक्त किया है। देखें-

’’साहित्य में इन दिनों ‘छिनालवाद’ का सहसा नव-उदय हुआ है. इसके आविष्कर्ता है वर्धा के अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय. यह ‘छिनालवाद’ इस वक्त सुर्खियों में है और लम्बे समय तक रहेगा. साहित्य में चर्चित बने रहने के लिये कुछ हथकंडे अपनाये जाते हैं, नवछिनालवाद इसी हथकंडे की उपज है. नया ज्ञानोदय को दिए गए अपने साक्षात्कार में स्त्री लेखिकाओं के लिये जिस भाषा का प्रयोग किया है, उसके लिये अब उन्होंने माफी माँग ली है, लेकिन इसके बावजूद उनका अपराध अक्षम्य है. कुलपति पद पर बैठ कर भाषागत संयम जो शख्स न बरत सके, उसे पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है. लेकिन नैतिकता अब बहिष्कृत शब्द है. जिसके बारे में चर्चा करना ही बेमानी है. और वैसे भी यह देखा गया है, कि बहुत से लोग कुलपति बनाने के बाद नैतिक नहीं रहा पाते. पता नहीं यह पद के कारण है, या कोई और बात है. कुलपति होने का दंभ भी व्यक्ति को अनर्गल प्रलाप के लिये विवश कर देता है।

डनकी कविता भी सहज और संप्रेषणीय है-

सचमुच सबकी माता धरती
अपनी भाग्यविधाता धरती

लूट रहा है किसकी अस्मत
मानव समझ न पाता धरती

काश कहीं तुम मिल जाती तो
अपना दर्द सुनाता धरती

तुझ में ही तो खो जाना है
तुझसे ऐसा नाता धरती

संगीता पुरी का नाम भी ब्लॉग जगत में जाना पहचाना है। उनके ब्लॉग अपनी विशिष्ट पहचान लिए हुए हैं। इस कारण वह सबसे अलग दिखाई देते हैं। गत्यात्मक चिंतन, गत्यात्मक ज्योतिष आदि उनके ब्लॉग इन विषयों पर गंभीर, शोधित तथा नवीनतम जानकारी प्रस्तुत करते हैं। ज्योतिष व प्राचीन आख्यानों की समसामयिक संदर्भों में व्याख्या करने में संगीता जी सिद्धहस्त हैं। वह अपने ब्लॉग परिचय में लिखती हैं ‘‘ईश्वर न सही प्रकृति है............ कहीं तो नतमस्तक होना ही होगा हमें।‘‘
वैदिक साहित्य के आख्यानों और पौराणिक मिथकों को विज्ञान की गल्प कथाएं कहा जा सकता है‘‘ में वह लिखती हैं।
’’इस प्रकार के तथ्य के अन्वेषण का कारण यह है कि प्रायः देखा जाता है कि विज्ञान का कोई नया आविष्कार सामने आते ही उससे मिलती जुलती पौराणिक कथाएं या शास्त्राख्यानों की तरु सहज ही ध्यान आकर्षित होता है और भारतीय मनीषी यह सोंचने लगते हैं कि उदाहरण के लिए डी एन ए के सिद्धांत के विकास के साथ जैसे ही विज्ञान ने इच्छित व्यक्ति के क्लोन बनाने की ओर कदम बढाए , तारकासुर के वध के लिए शिव के वीर्य से उद्भुत पुत्र की कथा सामने आ गयी। हृदय , किडनी , लीवर जैसे अंगों के प्रत्यारोपण की वैज्ञानिक क्षमता की तुलना में अज शिर के प्रत्यारोपण , जैसी अनेक कथाएं से पौराणिक मिथक भंडार परिपूर्ण है , जहां तक विज्ञान को जाना शेष है। पार्वती द्वारा गणेश का निर्माण और देवताओं द्वारा अत्रि के आंसु से चंद्रमा के निर्माण की कथाएं मानव के लिए चुनौती हैं। वायुशिल्प की जिन ऊंचाइयों को रामायण और महाभारत के वर्णन छूते हैं , वहां तक पहुंच पाना हमें दुर्गम लगता है। वायुपुत्र हनुमान की परिकल्पना, उसकी समसत गतिविधियों में विज्ञान के बढते चरणों के लक्ष्य को नापने लगती है। मानव का पक्षी की तरह आकाश में उड पाने का सपना ही हनुमान का चरित्र है।‘‘

सोमवार, 9 अगस्त 2010

प्रभु वर्ग कानून से ऊपर क्यों ?

प्रभु वर्ग कानून से ऊपर क्यों ?

हमारे
संविधान में सभी को समान अधिकार दिये गये हैं।
कानून की निगाह में राजा और रंक
बराबर हैं। यह बात सैद्धान्तिक रूप से तो अच्छी लगती है लेकिन सच्चाई कुछ और ही है।
कानून का डर केवल आम आदमी को है। प्रभु वर्ग हमेशा से ही उसके साथ खिलवाड़ करता
रहा है। अभी गुजरात में गृहराज्य मंत्री अमित सीबीआई की गिरफत में आये हैं। उन पर
सोहराबुद्दीन शेख के फर्जी मुठभेड़ का संगीन आरोप है। उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी हो चुका है। लेकिन वह कानून की पकड़ से फिलहाल दूर हैं। अतः उन्हें फरार घोषित किया गया है।अफसोस इस बात का है कि एक कथित आरोपी जिस पर संगीन आरोप हैं।
वह कैसे चुनाव जीत गया और कैसे वह गृहराज्य मंत्री की कुर्सी पर आसीन हो गया। ऐसे और भी उदाहरण हो सकते हैं। परंतु चाल, चलन और चरित्र का ढिंढोरा पीटने वाली पार्टी से यह
उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह कानून की धज्जियां उड़ाने वालों को संरक्षण प्रदान करे।

राजनीति पनाहगाह है अपराधियों की

कभी राजनीति में त्यागी, तपस्वी और समाजसेवा का भाव आत्मसात किये लोग आते थे। लेकिन अब राजनीति का पूरा चरित्र ही बदल गया है। हर राजनीतिक दल को जिताऊ प्रत्याशी चाहिए। जिताऊ प्रत्याशी वह होता है जिसके पास जीतने के सभी हथकंडे हों। ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से कोई शरीफ और ईमानदार आदमी नहीं हो सकता। राजनीति दलों की इस नीति के कारण अच्छे लोग राजनीति से दूर हो गये और अपराधी तत्वों का बोलवाला हो गया। इन लोगों से जनता कोकोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

जनता भी बराबर की दोषी

अगर राजनीति में अमित शाह जैसे लोग हैं। तो इसके लिए तो भाजपा दोषी है और ही
अमित शाह। आखिर उन्हें जनता ने ही तो चुनकर विधानसभा भेजा था। वोट देते समय जब
जनता जातिवाद, क्षेत्रवाद और धर्मवाद का ख्याल रखती है तो इसी प्रकार कानून की धज्जियां उड़ती रहेगी।अगर जनता फैसला कर ले कि किसी गलत आदमी को जीतने नहीं
दिया जायेगा तो कोई भी अवांछनीय तत्व राजनीति में चमक नहीं सकता।

जनता के पास सीमित विकल्प

हर मतदाता चाहता है कि उसका प्रतिनिधि ईमानदार और संघर्षशील हो। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि उसके पास विकल्प नहीं हैं। हर दल ऐसे ही लोगों को टिकिट देता है जो बेईमान और भ्रष्ट हो। आखिर इन्हीं के पास तो पैसा और ताकत होती है चुनाव लड़ने की। जब सभी दलों के प्रत्याशी एक तरहके हैं तो जनता क्या करें। इन्हीं लोगों में से उसे चुनना होता है अपना प्रतिनिधि। विकल्पहीनता केअभाव में जनता कैसे दोषी हो सकती है। इसके लिए चुनाव आयोग को पहल करनी होगी।

भ्रष्ट नौकरशाही का प्रभाव

हमारी नौकरशाही वस्तुतः भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है। उसकी जबावदेही भारतीय संविधान और जनता के प्रति है। लेकिन वह राजनेताओं के हाथ की कठपुतली बनी हुई है। इसका कारण यह है कि वह ईमानदार नहीं रही। हमारी पुलिस और जांच एजेन्सियां निष्पक्ष और निर्भीक नहीं है। इसीलिए अमित शाह जैसे राजनेताओं की हिम्मत हो जाती है कि वह कानून के साथ खिलवाड़ करें। सत्तान्मुखी नौकरशाही देश के लोकतंत्र के लिए खतरा है। वस्तुतः नौकरशाही की संरचना औरकार्यकलापों में आमूलचूल परिवर्तन होना चाहिए।

जनता की जागरूकता अपरिहार्य

जनता में जागरूकता का अभाव है। जब तक स्वच्छ राजनीति नहीं होगी। भ्रष्ट नौकरशाही हावी रहेगी और जनता शोषण और यातना का शिकार होती रहेगी। वस्तुतः पूरे देश में राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ जनांदोलन होना चाहए। जनता को भी प्रत्याशी चयन में योग्यता को प्राथमिकता देनी होगी। जब हमारा समाज ही दिशाभ्रमित हो गया है तो राजनीति तो
बेलगाम होगी ही। जनजागरण से इस तस्वीर को बदला जा सकता है। इसके लिए समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों को आगेआना होगा।

रविवार, 8 अगस्त 2010

मानवाधिकार प्रहरी डा- मुन्ना लाल भारतीय



डा- मुन्ना लाल भारतीय जी महासचिव आगरा

मानव अधिकारों के प्रति समर्पित करके आप जो सराहनीय कार्य कर रहे हैं, इसके लिए अंतर्राष्ट्रीयमानवाधिकार सुरक्षा परिषद् दिल से आपका शुक्रगुजार है और मानवता इसके लिए आपकी ऋणीरहेगी। आज भी हमारा एक वर्ग समाज की मुख्य धरा से कटा हुआ निस्सहाय प्रशासनिक व्यवस्था सेकोसों दूर अपने आप को भगवन भरोसे छोड़ कर जीवन यापन कर रहा है। ऐसे लोगों के लिए आपका यहलगाव और प्यार अति सराहनीय है। इसके लिए संगठन आपको नमन करता है और उम्मीद करता है कीआप इसी तरह से अपना कार्य जिम्मेदारी और निस्स्वार्थ भाव से करते रहेंगे।

धन्यवाद

कमरुद्दीन सिद्दीकी
राष्ट्रीय अध्यक्ष
अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार सुरक्षा परिषद्
संपर्क- नगला अजीता, सेक्टर-४ रोड आगरा
मो- ९८३७१४००७३

शनिवार, 7 अगस्त 2010

क्यों हुआ संसद में महंगाई पर हंगामा



लगता है कि धूमिल ने सही ही कहा था-

संसद तेल की वह घानी है
जहां आधा तेल और आधा पानी है

संसद के हर सत्र प्रायः हंगामें से शुरू होते हैं। हंगामे के कारण कई दिनों तक संसद की कार्यवाही ठपरहती है। क्या हमारे संविधान निर्माताओं ने इसी संसद की कल्पना की थी जिसमें गंभीर बहस के स्थान
नारेबाजी और शोर-शराबा होता रहे। संसदीय मर्यादा की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जायें। सत्ता और विपक्ष अपने-अपने पाले में तलवार भांजते रहें और बेचारी जनता मूक दर्शक की भांति इनका नाटक-नौटंकी देखती रहे। कभी हमारे देश की संसद में महान व्यक्तित्व थे जो अपनी योग्यता ईमानदारी, त्याग और जनसरोकारों से परिपूर्ण थे। सत्ताधारी दल भी योग्य विपक्षी नेताओं का सम्मान करता था और विपक्ष भी सरकार के लोकोपयोगी कार्यों की दलगत भावना से ऊपर उठकर समर्थन करता था। लगता है कि मतैक्य की भावना हमारी संसद से विदा हो चुकी है। सत्ता पार्टी का विपक्ष की बात मानना और विपक्ष का सत्ताधारी दल की हर बात का विरोध करना चलन बन गया है। महंगाई के मुद्दे पर हमारी संसद हंगामे की शिकार हो रही है। एक ओर विपक्ष काम रोको प्रस्ताव पर अड़ा है। वहीं दूसरी ओर सरकार किसी अन्य तरीके से इस बहस को कराना चाहती है जिससे बहस के बाद मतदान की नौबत आये।
मजाक बना दिया है
लगता है कि विपक्ष ने संसदीय कार्यवाही को मजाक के रूप में परिणित कर दिया है। विपक्षी हर मामले
में काम रोको प्रस्ताव के तहत बहस की मांग कर रहे हैं। वह चाहते हैं कि इसके माध्यम से सरकार को मतदान के संकट का सामना करना पड़े। संसद गंभीर बहस के लिए है। इस तरह की शोर-शराबे से जनता में गलत संदेश जा रहा है और संसद की मर्यादा का हनन हो रहा है। विपक्ष को हठधर्मी नहीं अपनानी चाहिए। वस्तुतः महंगाई से सारा देश पीड़ित है। इस पर संसद में किसी किसी रूप में बहस होनी चाहिए।
जनता को बेवकूफ बनाते हैं
संसद जनभावनाओं को मुखरित करने का संवैघानिक मंच है। लेकिन हमें इस बात को
कि समझना होगा कि संसद में वोटों की राजनीति के तहत कैसे लोग पहुंच रहे हैं।सभी महंगाई का रोना
रो रहे हैं। लेकिन कोई भी महंगाई को दूर करना नहीं चाहता। अब हमारी संसद में करोड़पतियों की भरमार है। महंगाई पर चर्चा महज उनके लिए बुद्धि-विलास है। हकीकत तो यह है कि विपक्षी दलों की जहां राज्य सरकारें हैं वह भी कालाबाजारियों तथा मुनाफाखोरों पर सख्ती करने में असमर्थ रहीं हैं।

सरकार क्यों घबराती है
जब केन्द्र में यूपीए सरकार का बहुमत है तो वह काम रोको प्रस्ताव के तहत महंगाई
पर चर्चा क्यों नहीं कराती ? आज महंगाई देश का ज्वलंत मुद्दा है। विपक्षी दल अपने
भी अपने दायित्वों का सही तरीके से निर्वहन कर रहे हैं। वैसे भी यह विपक्ष दलों का फर्ज होता है कि वह जनता की आवाज को संसद में बुलंद करें। सरकार को आखिर काम रोको प्रस्ताव पर आपत्ति क्यों
है ? आखिर वह आम जनता के नाम पर ही सत्ता में आई है।
स्पीकर निर्दलीय हो
अगर हमें लोकसभा की मर्यादा बनाये रखनी है तो स्पीकर को निर्दलीय होना चाहिए।
हालांकि स्पीकर सत्ताधारी दल का होता है लेकिन उससे यह अपेक्षा की जाती है की वह विपक्ष
की भावनाओं को भी सम्मान दे। अगर स्पीकर निर्दलीय होगा तो निश्चित रूप से अपने विवेक से
न्यायसंगत फैसला ले सकता है। स्पीकर की भी मजबूरी है कि आगे भी उसे सत्ताधारी दल से चुनाव लड़ना है। इसलिए वह सरकार के खिलाफ जाने की अधिक हिम्मत नहीं जुटा पाते।
जनता सब जानती है
ऐसा नहीं है कि भारतीय जनता बेवकूफ है जो राजनेताओं के घड़ियाली आंसुओं की सच्चाई को नहीं पहचानती। अगर हमारे सांसद वास्तव में ईमानदार है तो उन्हें संसद में हंगामें और कार्य सम्पादित होने के कारण अपने वेतन-भत्ते का त्याग करना चाहिए। संसद में हंगामा करने से महंगाई कम नहीं होगी। अगर हमारे सांसदों को महंगाई का अहसास होता तो वह संसद के स्थान पर
मुनाफाखोरों और कालाबाजारियों के खिलाफ मोर्चा खोलते। कोई कुर्सी पर बने रहने तो कोई कुर्सी पाने के लिए हंगामा कर रहे हैं।

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

सुप्रीम कोर्ट की बेबसी


शर्मनाक बात है कि देश की सर्वोच्च न्यायालय को यह कहने के लिए विवश होना पड़ा है कि अगर उसकेआदेश का पालन हो तो अपनी किस्मत पर रोइए। सुप्रीम कोर्ट के पास तो पुलिस है और ही ऐसाकोई अधिकार जिसके तहत वह किसी व्यक्ति को गिरफतार कर सके। यह पीढ़ा न्यायमूर्ति मार्कंडेयकाटजू और न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर की नहीं अपितु हमारी समूची न्याय व्यवस्था की है। जोन्यायपालिका देश के संविधान की रक्षक और व्याख्याकार है। कार्यपालिका और विधायिका से निराशऔर हताश नागरिक के लिए न्यायालय ही एकमात्र मंच रह जाता है जहां वह न्याय के लिए गुहार लगासकता है। परंतु जब न्यायपालिका ही बेवश हो तो जनता आखिर किसके पास जायेगी। किससेगुजारिश और मनुहार करेगी अपने न्याय के लिए। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बिडम्बना है किलोकतंत्र का प्रमुख स्तम्भ न्यायपालिका आज अपने को निर्बल और असहाय महसूस कर रही है। इससेअधिक दुर्भाग्यपूर्ण और क्या होगा कि उसके आधीनस्थ उच्च न्यायालय भी उसके आदेश तथा निर्देशोंकी धज्जियां उड़ा रही है। अब तक तो संसद और न्यापालिका तथा न्यायपालिका बनाम कार्यपालिकाटकराव की स्थितियां पैदा हुईं लेकिन जब न्यायपालिका का अपना तंत्र ही बेलगाम हो जाये तो स्थितिविस्फोटक हो सकती है। पूर्व सांसद पप्पू यादव की जमानत के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की चिंता जायज हैकि उसके स्पष्ट निर्देश के बाद पटना हाईकोट्र ने पप्पू यादव को जमानत दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देशमें अभियुक्त की जमानत याचिका खारिज करते समय दिया था कि अभियुक्त को कोई भी अदालतजमानत दे। इसके बावजूद अभियुक्त को जमानत दिया जाना न्यायिक अराजकता के सिवाय औरक्या है। सवाल यह भी उठता है कि जब सुप्रीम कोर्ट के आधीनस्थ कोर्ट ही उसके दिशा निर्देशों का पालननहीं करेंगे तो क्या न्यायपालिका की सर्वोच्चता और गरिमा अक्षुण्ण रह पायेगी। इस मामले में जस्टिसद्वय द्वारा जाहिर की गई बेवसी से कुछ नहीं होगा। लगता है कि सुशासन बाबू के बिहार में सब कुछ ठीकनहीं चल रहा। जब सुप्रीम कोर्ट ने 3 मई को पप्पू यादव को पटना हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत रद्द करदी तो अब तक बिहार पुलिस ने उसे गिरफतार क्यों नहीं किया ? क्या बिहार सरकार की जिम्मेदारी नहींहै कि वह माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन कराना सुनिश्चित करती। लगता है कि नीतीश कुमारभी कानून पालन के मामले में राजनीति कर रहे हैं ? हो सकता है कि
2007 वह इस बाहुबलि नेता को अपनीपार्टी में लेना चाहते हों। इसीलिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी की। बात कुछ भी लेकिनइस बारे में समूचा देश एकमत है कि न्यायपालिका की गरिमा और मर्यादा कायम रहनी चाहिए। उसमर्यादा का अतिक्रमण करने वाली किसी भी संस्था को बख्शा नहीं जाना चाहिए।