शनिवार, 18 सितंबर 2010

भाजपा पर संघ की लगाम

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा को चेताया है कि उसकी ताकत केवल राम मंदिर आंदोलन से ही बढ़ी है। उसके अनदेखी उसके लिए महंगी पड़ सकती है। यह बयान देकर संघ प्रमुख ने स्पष्ट कर दिया कि अगर भाजपा चलेगी तो उस पर संघ की लगाम होगी। अब वह दिन हवा हो गये जबकि अटल और आडवानी संघ के इशारों और निर्देशों की अनदेखी कर देते थे। शायद इसीलिए संघ के इशारे पर नितिन गड़करी जैसे स्थानीय नेता को भाजपा की कमान सौंपी जिससे वह अपनी औकात में रहकर संघ के निर्देशों का अक्षरक्षः पालन कर सकें। संघ प्रमुख की बात से यह तो स्पष्ट हो गया कि भाजपा संघ की राजनीतिक विंग है। वह अपने एजेंडे को भाजपा के माध्यम से लागू करना चाहता है। अतः उन लोगों की आंखें खुल जानी चाहिए जो यह कहते हैं कि संघ और भाजपा अलग अलग हैं। जब हम संघ को साम्प्रदायिक मानते हैं तो भाजपा को साम्प्रदायिक मानने में कोई बुराई नहीं है। आखिर भाजपा को स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है। उसके अधिकांश संगठन मंत्री संघ के प्रचारक हैं। इसके अतिरिक्त अपवादों को छोड़कर अधिकांश नेता नेकरघारी हैं। कितने अफसोस की बात है कि भाजपा अपने जन्म से आजतक स्वतंत्र दल नहीं बन पायी तथा उसपर संघ का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। वैसे भी भाजपा की न तो कोई नीति है और न ही सिद्धांत। उसका न तो कोई स्वतंत्र दर्शन है और न ही नीति। संघ के इशारे पर ही उसकी नीति और सिद्धांत तय होते हैं। उसकी नियति एक स्वतंत्र दल की न होकर संघ की चेरी की बन गई है। गाहे बगाहे संघ नेता फरमान जारी करते रहते हैं कि भाजपा को यह करना चाहिए और यह नहीं। ऐसी स्थिति में इस लोकतांत्रिक देश में भाजपा कैसे अपने स्वतंत्र स्वरूप को बनाए रख सकती है। वैसे भी भाजपा ने अपनी अलग पहचान के लिए चाल, चरित्र और चेहरे का नारा दिया था। वह अब खोखला साबित हो चुका है। न तो उसकी चाल स्पष्ट है और न ही चेहरा। जहां तक चरित्र की बात है तो उसका चरित्र सत्तान्मुखी हो गया है। किसी भी मुद्दे पर जनांदोलन करने का उसका बूता नहीं है। पहले लोग भाजपा को केन्द्र में विकल्प के रूप में देखते थे। परंतु उसके क्रियाकलापों से जाहिर हो गया कि वह अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है। अगर भाजपा पर संघ की छाया नहीं हटी। संघ नेताओं की भाजपा की दैनंदिनी राजनीति में इसी प्रकार दखलंदाजी चलती रही तो निश्चित है कि भाजपा अपना राजनैतिक दल का स्वरूप खो सकती है। युवा पीढ़ी भाजपा में आने से कतरा रही है। पुरानी पीढ़ी या तो थक गई है या उसका भाजपा से मोहभंग हो गया है। भाजपा का कश्मीर में धारा 370, समान नागरिक संहिता आदि मूल विचारधारा सत्ता की धारा में प्रवाहित हो चुकी है। राम मंदिर भी उसके लिए साध्य न होकर साधन मात्र रह गया है। देश की अर्थ, कृषि, खेल व युवा नीति के बारे में उसके विचार स्पष्ट नहीं है। आरक्षण के मुद्दे पर उसकी स्थिति शुतुरमुर्ग की है। जब उसकी नीतियां और नीयत ही स्पष्ट नहीं है तो भविष्य में भाजपा की क्या दुर्दशा होगी। यह इतिहास के गर्भ में है। भाजपा को देश की मजबूत और केन्द्र की विकल्प पार्टी बनने के लिए संघ की छाया से मुक्त होना पड़ेगा। अपनी नीति और अपने सिद्धांत तय करने होंगे। नागपुर की अपेक्षा दिल्ली के फरमानों को प्राथमिकता दी जायेगी तथी भाजपा बच पायेगी।

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

पानी पर होगा युद्ध



इस समय समूचा देश जल संकट से त्राहि-त्राहि कर रहा है। अगर यही आलम रहा तो पानी ही लड़ाई का प्रमुख कारण बन जायेगा। क्योंकि जीने के लिए भोजन से भी अधिक पानी की जरूरत होती है। आश्चर्य इस बात का है कि इस भयावहता की ओर न तो सरकार का ध्यान है और न ही जनता का। वह किसी चमत्कार का इंतजार कर रही है। अगर समय रहते हम नहीं चेते तो निश्चित रूप से इस महान देश पानी के अभाव में काल-कवलित हो जायेगा।
बढ़ते औद्योगीकरण तथा हरित क्रांति का सबसे बड़ा भार पानी पर पड़ा है। हमारी नदियां गंदे नाले में परिवर्तित हो गयीं हैं। गांव और शहरों का सारा कूड़ा-कचरा तथा सीवर नदियों में बेखौफ प्रभाहित की जा रही है। भूगर्भ जल का अत्यधिक दोहन करने से उसके जलस्तर में निरंतर गिरावट आ रही है। वर्षा के जल का हम संचय नहीं कर रहे। तालाबों और पोखरों पर हमने कब्जा करके आलीशान इमारतें खड़ी कर ली हैं। नदियों के पाट पर भी हम डायनासोर की तरह फैेलते जा रहे हैं। इस चिंतनीय स्थिति की ओर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। सन् 1947 में देश मे प्रतिव्यक्ति जल की उपलब्धता 6000 घनमीटर थी जो कि 2017 तक घटकर मात्र 1600 घनमीटर रह जायेगी। ताजे जल का एक मात्र स्रोत भूगर्भ जल, जो पीने के अतिरिक्त कृषि और उद्योग के उपयोग में आता है। हरित क्रांति के बाद भूगर्भ जल का अत्यधिक मात्रा में दोहन हआ है। पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जिन्होंने हरित क्रांति में अर्वाधिक फायदा उठाया, वही बेतहाशा नलकूपों के लगने से भूमिगत जल के स्रोत लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गये हैं। भूमिगत जल के अत्यधिक नीचे जाने से पानी में लवण की मात्रा भी काफी बढ़ गई है। सिंचाई हेतु जो नहरें बनाई गई थीं, उनका पचास फीसदी पानी ही वास्तविक रूप से सिंचाई के लिये प्रयुक्त हो पाता है। मौसम परिवर्तन की वजह से वर्षा भी कम जोती जा रही है। जहां सबसे अधिक पानी बरसता था, वो भी पेयजल संकट से ग्रसित हो गये हैं। इजरायल जहां वर्षा का औसत महज 25 सेमी है। उनसे हमें सबक लेना चाहिए कि वे जल की एक-एक बूंद की कीमत समझते हैं। इसके विपरीत भारत में वर्षा का औसत 115 सेमी है। जिसके मात्र पच्चीस फीसदी जल-संचय से हम पानी के संकट से मुक्ति पा सकते हैं। लेकिन हमारा 90 फीसदी वर्षा का जल नदियों के माध्यम से सागर में समा जाता है। इस ओर हमने कोई ध्यान नहीं दिया है। इस वर्षा जल को बचाने हेतु वाटर हार्वेस्टिंग को प्रोत्साहन, तालाब, पोखरों की सफाई, कुओं को रिचार्ज करना, बंजर भूमि व पहाड़ी ढालों पर वृक्षारोपण, कृषि के लिए उचित फसल चक्र अपनाने, पेयजल आपूर्ति करने वालली पाइप लाइनों की नियमित देखरेख आदि से जल-संरक्षण को नई दिशा दी जा सकती है। सरकार ने अभी तक भूजल संरक्षण के लिए अभी तक कोई कठोर कदम नहीं उठाये हैं। शहरों के मकानों में कुकुरमुत्तों की तरह लगे समरसेबिल भूजल का अत्यधिक अपव्यय कर रहे हैं। आर-ओ प्लांट अथवा जल बेचने वाले औद्योगिक संस्थानों में पिचहत्तर फीसदी अवशिष्ट जल बेकार चला जाता है। जरूरत इस बात की है कि सरकार जल संरक्षण को प्राथमिकता दे तथा कड़ाई से जल का दुरुपयोग करने वालों को दंडित करे। जनता को भी इस सच्चाई का समझना होगा कि हमारे द्वारा किये गये जल के अपव्यय का खामियाजा हमारी आगामी पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

भ्रष्टाचार की जय बोलता भारत


शीघ्र सेवानिवृत हो रहे केन्द्रीय सर्तकता आयुक्त का यह बयान कि देश में 30 फीसदी लोग भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं। केवल 20 फीसदी लोग ही ईमानदारी से अपना जीवन निर्वाह कर रहे हैं। यह उन्होंने कुछ नया नहीं कहा। रातों-रात जो लोग अमीर हो रहे हैं। देश में अरब-खरबपतियों की जो संख्या बढ़ रही है। वह केवल भ्रष्टाचार के कारण है। अफसोस इस बात का है कि केन्द्रीय सर्तकता आयुक्त का यह बयान कल ही बेमानी हो जाएगा। जब देश की सत्ता, प्रशासन, शिक्षा, चिकित्सा, उद्योग तथा व्यवसाय सभी इस रास्ते पर हैं तो भगवान ही जाने अंजाम क्या होगा।
भ्रष्टाचार केवल रिश्वत ही नहीं है अपितु कालाबाजारी, मुनाफाखोरी, ठगी, दलाली इसके दायरे में आते हैं। नैतिकता और शुचिता के प्रतीक हमारे कथित धार्मिक गुरु भी भ्रष्टाचार करने में पीछे नहीं हैं। कोई दवा बेच रहा है तो कोई बाल काले करने का लोशन। कोई अपनी विद्या के नाम पर सभी बीमारियों को ठीक करने का दावा कर रहा है तो कोई मंच से ही गाली-गलौच कर रहा है। लेकिन इन लोगों में यह समानता है कि सभी अरबपति हैं और विलासी जीवन जीते हैं।
वस्तुतः हमने बच्चों ईमानदार बनाने का प्रयास नहीं किया। उसे इस बात की शिक्षा नहीं दी कि सादा जीवन उच्च विचार ही जीवन का आधार होना चाहिए। वह बच्चों को इंसान नहीं बल्कि धन कमाने की मशीन बना रहे हैं। जब किसी के जीवन का लक्ष्य ही धन कमाना है तो इसमें अच्छा और बुरा कोई मायने नहीं रखता। साफ है हम चाहते तो है भगत सिंह पैदा हो लेकिन पड़ोसी के घर। हमारे घर तो ऐसा कुलदीपक होना चाहिए जो दुनिया भर की दौलत येन-केन-प्रकारेन अपने घर में भर सके। एक सवाल मुझे बराबर कौंधता है कि हमारे जितने भी धर्मस्थल व गुरू हैं। वह भी इस प्रश्न पर मौन साधे हुए है। आखिर मौन क्यों न साधे। लोगों की काली कमाई का एक हिस्सा उनकी तिजोरियों में जो जा रहा है। मुझे आजतक किसी भी धर्म का परमपुरूष ऐसा नहीं मिला जो सीना ठोंक कर कहे कि हमारे पूजा-गृह में केवल ईमानदार लोग ही आएं। यहां दान-पात्र में रिश्वत अथवा कालाबाजारी की कमाई नहीं डालें। सब लोग देख रहे है कि गलत क्या है और सही क्या है लेकिन फिर भी धृतराष्ट् की भांति अपना आचरण कर रहे हैं। यह वास्तविकता है कि समाज में भ्रष्ट ही सम्मानीय और पूज्यनीय है। क्योंकि वही चंदा देता है। अपने भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए मीठा बोलता है। उसकी कोशिश होती है कि वह हर कार्यक्रम में जाये और अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन करें। अखबारों में रोज छपने वाले समाजसेवियों की जन्मप़त्री खंगाली जाये तो कोई गबन में जेल काट चुका होगा तो कोई फर्जी कारखानों के नाम पर सरकारी कोयले को ब्लैक में बेचकर करोड़पति बना हुआ होगा। हां अपवाद के रूप में कुछ लोग हो सकते हैं जो ईमानदारी से समाजसेवा कर रहे हैं लेकिन अखबारों में फोटों और टीवी में चेहरे भ्रष्ट लोगों के ही आयेंगे क्योंकि उनके पास खरीदने की क्षमता है। भ्रष्टाचार की गंगोत्री बहाने में राजनीति का अनन्यतम योगदान है। किसी भी दल का छुटभैये से लेकर बड़ा नेता लाखों-करोड़ों में खेल रहा होगा। एक जमाना था कि आपको लोकसभा सदस्य और विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्रों में पैदल या रिक्शा-तांगों में मिल जाते थे। परंतु धन्य है भ्रष्टाचार की माया कि मामूली पार्षद और ग्राम प्रधान भी चौपहिया वाहनों में चलते हैं।
आज लोगों के ‘रोल मॉडल’ महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, भामाशाह जैसे महामानव नहीं हैं अपितु उनका स्थान बेतहाशा धन कमाने वालों ने ले लिया है। हम स्टील किंगों, मेगास्टारों व पूंजीपतियों, महंगे नाचने-गाने वालों को अपना रोल मॉडल मानते हैं। कोई न तो कुष्ठ रोगियों की सेवा करने वाला बाबा आमटे बनना चाहता है और न ही मदर टेरेसा न ही जलपुरुष राजेन्द्र सिंह और न ही स्वामी अग्निवेश और सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडे ? अतः जब हमारा पैसा कमाना ही जीवन का एकमात्र ध्येय रह गया है तो भ्रष्टाचार के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है जिससे रातों-रात धनी बना जा सके। इसीलिए किसी घर में इस बात पर विवाद नही होता कि इस घर में हराम की कमाई यानी रिश्वत नही आनी चाहिए। हम काली कमाई खाने की अपेक्षा भूखा मर जाना पंसद करेंगे। याद रखिए कि हमारा वर्तमान ही हमारे भविष्य का निर्माण करता है। जो हमने बोया हैं उसे उसे ही काट रहे हैं।

आई.ए.एस परीक्षा परिणाम में गोपनीयता ?



देश के अधिकांश मेधावी छात्रों का यह सपना होता है कि वह कड़ी मेहनत और योग्यता के बल पर देश की सर्वोच्च सेवा आईएएस में चयनित हों। इसके लिए वह अपने शहरों सहित इलाहाबाद और दिल्ली में कोचिंग लेते हैं। दिन-रात मेहनत करते हैं। लेकिन जब रिजल्ट आता है तो उन्हें यह भी पता नहीं चलता कि उनकी स्थिति क्या है ? उनके कितने नम्बर है। यह यह भी नहीं जान पाता कि इस परीक्षा में कितने अंक प्राप्त करने वाले सफल हुए हैं। उसके लिए सूचनाधिकार-2005 भी निरर्थक साबित हुआ है। जबकि सूचनाधिकार को एक नयी क्रांति की शुरूआत माना गया। यूपीए सरकार ने इसे अपनी विशेष उपलब्धि मानते हुए इसे चुनावों में भुनाया भी। लेकिन इस अधिनियम की धज्जियां उड़ा रहा है संघ लोक सेवा आयोग। आप इस अधिकार के तहत मंत्री से लेकर राष्टपति भवन तक की जानकारी ले सकते हैं परंतु संघ लोक सेवा आयोग की नही। यह आयोग अपने को सूचनाधिकार से ऊपर मानता है। इसके विरोध में विगत सप्ताह जंतर मंतर दिल्ली पर संघ लोक सेवा आयोग की आईएएस की प्रारंभिक परीक्षा मे असफल रहे हजारों प्रतियोगियों ने प्रदर्शन किया। उनकी मांग की थी कि आयोग इस परीक्षा की उत्तर कुंजी और कट-ऑफ लिस्ट क्यों नहीं जारी करता। जबकि देश के सर्वोच्च शिक्षा संस्थान आईआईएम, आईआईटी, एम्स, परमाणु व अंतरिक्ष आदि परीक्षाओं में शामिल अभ्यर्थियों के लिए आन्सर की यानी उत्तर कुंजी अपनी वेबसाइट पर डालते हैं। अभ्यर्थियों की कट-ऑफ लिस्ट जारी की जाती है। परंतु संघ लोक सेवा आयोग अब भी ब्रिटिश शासन के दौरान जारी गोपनीयता का आवरण ओढ़े हुए है जिसका इन परीक्षाओं की पारदर्शिता और ईमानदारी पर प्रश्न लगना आरंभ हो गया है। इसके विरोध में गत रविवार को सिविल परीक्षा के प्रतियोगियों ने जंतर-मंतर पर केंडल मार्च किया। ट्रांसपेरेंसी सीकर फोर एकाउंटेबिलिटी के बैनर तले निकले इस कैंडल मार्च में परीक्षार्थियों के अंक घोंषित करने तथा प्रारंभिक परीक्षा में पास होने के फार्मूले को उजागर करने की मांग की। उनकी मांग थी प्रारंभिक परीक्षा में जी.एस अर्थात् सामान्य अध्ययन के आधार पर उत्तीर्ण किये गये हैं अथवा विषय विशेष के अंकों के या दोनों विषयों के प्राप्तांकों के आधार पर उत्तीर्ण किये गये हैं। सूचनाधिकार के तहत भी सूचना मांगने पर आयोग कहता है कि वह सूचनाधिकार के दायरे में नहीं है। इस स्थिति को सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए। जब देश की सर्वोच्च सेवा की चयन प्रक्रिया पर सवाल उठना शुरू हो गया तो इन सेवाओं की गरिमा और विश्वास का क्या होगा जिसे लम्बे अरसे से देशवासी स्वीकार करते रहे हैं। इस सचाई की अनदेखी नहीं की जा सकती कि कहीं आयोग के कार्यकलापों में कोई गड़बड़ घोटाला तो नहीं है। जब प्रदेशों के लोक सेवा आयोग भ्रष्ट साबित हो सकते हैं। उनकी नियुक्तियों व चयन को हाईकोर्टों सहित सुप्रीम कोर्ट ने अवैध ठहराया है तो संदेह पैदा होता है कि गोपनीयता की आड़ में कहीं कुछ हो तो नहीं रहा। छात्रों सहित सारे देश को इसका उत्तर मिलना चाहिए कि आखिर आयोग क्यों अपने को देश की सरकार और न्यायपालिका से ऊपर मान रहा है। अगर एक बार देश का इस आयोग से विश्वास हट गया तो उसे कायम करने में बरसों लग जायेंगे।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

'शब्द श्री' सम्मान से विभूषित हुए मशहूर शायर मयंक



लखनऊ-३० अगस्त: लखनऊ की सुप्रसिद्ध सांस्कृतिक-साहित्यिक संस्था, 'शब्द' द्वारा देश के विख्यात गीत-गजलकार, के.के.सिंह 'मयंक' का सूचना निदेशालय के सभागार में भव्य सम्मान किया गया. साहित्यकारों, साहित्य प्रेमियों की खचाखच उपस्थिति से गर्म इस आयोजन के अध्यक्ष आकाशवाणी के पूर्व निदेशक श्री मनुज एवं मुख्य अतिथि डॉ. सुरेश उजाला थे. श्री के. के. सिंह 'मयंक' को 'शब्द श्री' से अलंकृत किया गया.
के.के सिंह मयंक को सम्मान- पत्र एवं अंग वस्त्र तथा स्मृति-चिह्न प्रदान करते हुए श्री मनुज ने कहा कि मयंक जी की रचनाएँ सीधे मानव हृदय से सम्वाद करती हैं. डॉ. सुरेश उजाला ने अपने संस्मरण बांटते हुए कहा कि मयंक जी एक बेहद शरीफ इंसान हैं लेकिन मंच से बाहर तक. मंच पर वह दोस्ती नहीं निभाते बल्कि अपनी रचनाओं से आप पर ऐसा प्रहार करते हैं जिससे आदमी हीन भावना से ग्रस्त हो जाए.
शब्द की संस्थापिका, श्रीमती डॉ. प्रीति कबीर ने कहा कि मयंक जी का सम्मान करके हमारी संस्था स्वयं गौरवावित हुई है.उन्होंने कहा कि मयंक जी जैसे रचनाकार का एक बार सम्मान करने से मन नहीं भरता, सम्भवतः संस्था भविष्य में मयंक जी को कुछ अन्य रचनात्मक कार्यों में सहभागी बनाने का प्रयत्न करेगी.
कार्यक्रम का संचालन श्री अरुणेश एवं संयोजन अरविन्द 'असर' ने किया.
सम्मान समारोह के दूसरे चरण में एक रष्ट्रीय काव्य गोष्ठी आयोजित की गई जिसमें श्री के.के. सिंह 'मयंक' ने:
जो तिरंगे को करना नमन छोड़ दें
उनसे कह दो वो मेरा वतन छोड़ दें
पढकर देश प्रेम का परिचय दिया. इसके अतिरिक्त सुरेश उजाला, मनुज, अरविन्द असर, अरविन्द झा, प्रीति कबीर, अरुण मिश्रा, मनोज कुमार मनोज, डॉ. सुरेश, महताब हैदर, रामप्रकाश बेखुद आदि रचनाकारों ने भी राष्ट्रीय चेतना बोध की रचनाएँ प्रस्तुत कीं। बात-बेबात के ब्‍लॉगर व सुप्रसिद्ध संपादक डा. सुभाष राय व विचार-बिगुल के ब्‍लॉगर डा; महाराज सिंह परिहार ने केके सिंह मयंक को शब्‍दश्री सम्‍मान मिलने पर उन्‍हें बधाई दी है।
प्रेषित - अलका सर्वत मिश्रा