शनिवार, 24 अप्रैल 2010

सेना से ही ईमानदारी की अपेक्षा क्यों

अभी सकुना मामले में सारे देश में भूचाल मचा हुआ है जिसके तहत ले-जनरल अवधेश प्रसाद सहित कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों पर कोर्ट मार्शल के आदेश हुए हैं। इससे पहले तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल दीपक कपूर ने इस आरोपी सैन्य अधिकारियों के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई की सिफारिश की थी। लेकिन रक्षा मंत्री के हस्तक्षेप के बाद उन्हें आरोपियों के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई करने का आदेश दिया। इसी तरह के अन्य मामले अखबारों की सुर्खियों पर अक्सर आते रहते हैं। सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार पर समूचा देश चिंतन करता है। चिंता करता है। देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा बताते हुए स्यापा करता है। और आखिर में फतवा जारी कर देता है कि सेना में भ्रष्टाचार किसी भी कीमत पर समाप्त होना चाहिए। इसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। इस भ्रष्टाचार के मामले को इस प्रकार उठाया जाता है कि केवल सेना ही भ्रष्ट है और समाज के समस्त अंग ईमानदारी से अपने काम को अंजाम दे रहे हैं और पाक-साफ हैं।इस सच्चाई से लोग आंखें मूंद लेते हैं कि हमारी सैन्य में व्यवस्था में सेनाध्यक्ष का स्थान सातवां है। महामहिम राष्टपति सेना के सुप्रीम कमंाडर होते हैं। इसके बाद प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, रक्षा राज्य-मंत्री, रक्षा उपमंत्री, केबिनेट सेक्रेटरी और रक्षा सचिव सभी सिवलियन अथवा असैनिक होते हैं। फिर सेना में घपले के लिए केवल सेना को ही दोष नहीं दिया जा सकता। सेना के लगभग सभी महत्वपूर्ण निर्णय इन्हीं उच्चाधिकारियों द्वारा लिये जाते हैं।हमारी सैन्य संरचना में ब्रिगेडियर से ऊपर के पद यानी मेजर जनरल, ले। जनरल, जनरल आदि पदों पर नियुक्ति व प्रोन्नति केबिनेट कमेटी फॉर एपांटमेंट (केबिनेट की नियुक्ति समिति) करती है। अतः इन अधिकारियों पर भी सीधा दवाब ऊपर वाले आकाओं का ही रहता है।वास्तविकता यह है कि जब समूचा समाज भी भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ हो। भ्रष्टाचार को समाज से मान्यता मिल गई हो। समाज में भी धनी आदमी का सम्मान हो। धन के माध्यम से सब कुछ खरीदा जाता हो तो हम केवल सेना से ईमानदार होने की अपेक्षा क्यों रखते हैं ? आखिर सेना भी तो समाज का अंग है। इसमें आने वाले सिपाही अथवा अधिकारी इसी समाज से ही तो आते हैं जो भ्रष्टाचार अथवा गलत तरीके से कमाये धन को बुरा नहीं मानता। एनडीए में आने वाले अधिकारी सत्रह वर्ष तक इसी भ्रष्ट समाज में रहते हैं। इसी प्रकार सीडीएस के माध्यम से सेना में अधिकारी बनने वाले युवा भी इसी भ्रष्ट समाज की देन है। सब समूचा समाज ही भ्रष्ट होगा। तो उसी परिवेश में पला-पढ़ा फौजी कैसे ईमानदार हो सकता है। यह मानवीय स्वभाव है जिसे बदला नहीं जा सकता। आखिर फौजी भी इसी समाज का अंग है। उसे अपने परिवार के साथ इसी समाज में रहना है। बच्चे पढ़ाने हैं। उनकी विवाह-शादी करनी है और आखिर में रिटायर होकर इसी समाज में आकर रहना है। उसे भी इंजीनियरिंग व मेडीकल में प्रवेश पाने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। लड़कियों की शादी में दहेज देना पड़ता है। अब प्रश्न यह पैदा होता है कि मनोवैज्ञानिक, सामाजिक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सेना अन्य समाज के अंगों से कैसे अलग हो सकती है। अगर सेना ही भ्रष्ट है तो क्या समूचा देश ईमानदार है ? हमारे देखते ही देखते चिकित्सा और शिक्षा भारी-भरकम मुनाफा कमाने वाले व्यापार में बदल गई है। देश व प्रदेश का कोई ऐसा विभाग नहीं है जहां भ्रष्टाचार की तूती नहीं बोलती हो। और तो और हमारे राजनेता तो आज भ्रष्टाचार के पर्याय बन गये हैं। हमारे कथित धार्मिक गुरू भी भ्रष्टचार की पावन गंगा में आकंठ डूबे हुए हैं।अगर सेना से भ्रष्टाचार को रोकना है तो सारे देश से भ्रष्टाचार को समाप्त करना पड़ेगा। भ्रष्टाचार की जड़ों पर प्रहार करना पड़ेगा। जब समाज ईमानदार होगा। शिक्षा व्यवस्था सकारात्मक व नैतिक मूल्यों की झंडावरदार होंगी। समाज में भ्रष्टों का अपमान व ईमानदारों का सम्मान होगा। सारे देश में भ्रष्टचारियों के खिलाफ जोरदार मुहिम चलाई जाये। भ्रष्टाचार को राष्टीय समस्या घोषित किया जाये। अवैध तरीके से अर्जित चल-अचल सम्पति जब्त की जाये। भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कोर्ट मार्शल जैसी अदालतें स्थापित हो जो भ्रष्टाचार के मामले पर तीन महीने के अंदर अपना फैसला सुनायें। समाज भी भ्रष्टाचारियों को महिमामंडित करने से रोके। मुनाफाखोरी, जमाखोरी तथा कालाबाजारी पर प्रतिबंध लगाया जाये क्योंकि अनाप-शनाप धन एकत्रित-अर्जित करने वाला यह वर्ग ही समूची व्यवस्था को भ्रष्ट बनाने पर तुला हुआ है।

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