शनिवार, 29 मई 2010

नहीं है ईमानदारी हिंदी पत्रकारिता में



हिंदी पत्रकारिता जिसने आज़ादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका का निर्वहन किया। वह आज कहीं दिखाई नहीं देती। समाज को जाग्रत करने तथा उसे पाखंडों से निकालने की अपेक्षा पत्रकारिता समाज को गलत दिशा में ले जा रही है। कभी सम्मान का यह पेशा अब दलालों, पूंजीपतियों तथा भ्रष्ट नेतायों की जुगलबंदी में बदल गया है। आज का पत्रकार केवल अपने आका को खुश करने में लगा रहता है क्योंकि वह जनता है की वह अपनी योग्यता से नहीं अपितु किसी की मेहरवानी से आया है। सारे देश के हिंदी अखवारों में यही स्थिति है। एक जाति विशेष के पत्रकारों का इस पेशे में वर्चस्व है। अधिकांश पत्रकारों को न तो हिंदी का आधिकारिक ज्ञान है और न ही उसमे विश्लेषण क्षमता है। वह बिना विज्ञप्ति के समाचार नहीं लिख सकता। उसका सामान्य ज्ञान हाई स्कूल तक का भी नहीं है। किसी भी अखवार में पत्रकारों व् सह संपादकों की भर्ती के लिए न तो कोई परीक्षा होती है और न ही इस क्षेत्र में उसकी योग्यता को मापा जाता है। यह भी सच्चाई है की किसी भी संपादक को योग्य, ईमानदार और अपने से अधिक शिक्षित पत्रकार पसंद नहीं होते । वह उन्हें हर समय अपमानित और नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। सभी को दल्ले, जुगाडू और चमचों की जरूरत है। यह मेरा दावा है कि हिंदी के अखवारों के अधिकांश पत्रकार केंद्र सरकार कि एस एस सी कि परीक्षा और सम्पादक पीसीईस कि प्रारम्भिक परीक्षा भी पास नहीं कर सकते। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग कि नेट परीक्षा पास तो वह जिंदगी में नहीं कर सकते. अखवारों के मालिक और सम्पादक जातीय पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। यही कारन है कि दलित पत्रकार अखवारों में खोजने से भी नहीं मिलते। देश में धर्म और जाति का जो नंगा खेल चल रहा है उसके लिए मीडिया के जातीय और संकीर्ण विचारधारा के यही लोग जिम्मेदार हैं। आज की हिंदी पत्रकारिता का यही सच है। मीडिया बहुत मृत की बात करता है लेकिन क्या उसने कभी अपने गिरेबान में झाँकने का प्रयास किया कि वह कितने पानी में है। चमचों को तरक्की मिलती है और योग्य लोगों को हाशिये पर डाला जाता है. पत्रकारिता में पराड़कर, पालीवाल, विद्यार्थी, सुरेन्द्र प्रताप सिंह जैसे निष्पक्ष पत्रकारों का युग समाप्त हो गया। आप हिंदी पत्रकारिता दिवस है। इस दिन सिवाय आंसू बहाने के और क्या किया जा सकता है। पूँजी और चाटुकारों कि टोलियाँ इस मिशन को ध्वस्त करने में लगीं हैं.

1 टिप्पणी:

  1. नहीं ऐसा नहीं है ईमानदारी भले ना हो लेकिन इमानदार लोग अब भी हैं हिंदी पत्रकारिता में जिनको सहायता और सहयोग पहुँचाने की जरूरत है |

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