शुक्रवार, 21 मई 2010

सोनिया-राहुल की राजनीति

भीषण गर्मी में भी उत्तर प्रदेश का राजनैतिक वातावरण गरमाया हुआ है। सोनिया गांधी तथा राहुल गांधी इन दिनों प्रदेश के दौरे पर हैं। उनकी निगाहें 2012 पर हैं जब यहां विधान सभा के चुनाव होने हैं। उन दोनों की कोशिश है कि आगामी चुनावों में पार्टी अपना पुराना गौरव प्राप्त कर ले जिससे आगामी लोकसभा चुनावों में उसे अपने बूते पर स्पष्ट बहुमत मिल चुके। हालांकि इस समय केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार है। इससे पहले भी कांग्रेस के नेतृत्व में केन्द्र में सरकार रही है। लेकिन कांग्रेस को अपनी सरकार चलाने के लिए कदम-कदम पर समझौता करना पड़ रहा है। वह न तो अपनी नीतियों को प्रभावशाली ढंग से लागू करवा पा रही है और न ही यूपीए सरकार में अनुशासन की भावना पैदा कर रही है। कांग्रेस के सहयोगी दल किस तरह से उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। कभी ममता नाराज तो कभी शरद पवार की उलटबांसी। कभी करुणानिधि की चेतावनी तो कभी उनकी पार्टी के लोगों की बेवाकी। इन सबसे संभवतः राहुल और सोनिया खुश नहीं हैं। वैसे भी कांग्रेेस को एकछत्र राज करने की आदत है। इसलिए वह मजबूरी में अपने ऊपर उदारता का लबादा ओढ़े हुए है। यही सच्चाई उन्हें रास नहीं आ रही हैं। इसलिए मां-बेटे दोनों ही प्रदेश में पार्टी का जनाधार बढ़ाने में लगे हुए हैं। राहुल जहां अपना विकास और मनरेगा के विषय को उठाकर राज्य सरकार को आढ़े हाथों ले रहे हैं। वही दूसरी ओर उनकी मां गरीबों की हमदर्द के रूप मे अपने को स्थापित कर रहीं हैं। वह कहती हैं कि अभी तक प्रदेश में गरीबों को अपने मकान नहीं मिले। प्रदेश में कानून और व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है। अब सवाल पैदा यह होता है कि किस प्रकार मां-बेटे प्रदेश में अपने दल का जनाधार बढ़ाएंगे। वह अपने को बसपा की प्रमुख विरोधी के रूप् में प्रस्तुत कर रही है। जबकि इस हकीकत को पूरा देश जानता है कि लोकसभा में कटौती प्रस्ताव पर बसपा ने यूपीए सरकार के पक्ष में बोट दिया था। इसी प्रकार मुलायमसिंह यादव ने भी सदन से वाक-आउट करके कांग्रेस की अप्रत्यक्ष मदद की थी। इन तथ्यों से जनता में स्पष्ट संदेश जा रहा है कि कांग्रेस बसपा-सपा से मिली हुई है। अतः जनता बसपा के खिलाफ उसे क्यों वोट दे ? वही स्थिति सपा के प्रति भी है। यह कैसे संभव है कि बसपा और सपा की छाती पर पैर रख्.कर कांग्रेस प्रदेश में जनाधार बना लेगी। अगर कांग्रेस को मजबूत करना है तो उसे बसपा-सपा से दूरी बनानी होगी। सत्ता के लिए समझौता बंद करना होगा। पार्टी संगठन में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा। दलाल और भूमाफिया को पार्टी से निकालना होगा तथा स्वच्छ तथा ईमानदार लोगों को पार्टी में स्थापित करना होगा। वह गांधीवाद की बात करती है तो उसे जमीनी हकीकत में उसे बदलना होगा। अगर यह नहीं हुआ तो सोनिया-राहुल का प्रदेश में प्रभावी होने का सपना कभी भी फलीभूत नहीं होगा। प्रदेश की जनता सोनिया-राहुल के भाषण से ही बदलने वाली नहीं है।

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