शुक्रवार, 21 मई 2010

जरूरी नहीं मुस्लमान फतवे को स्वीकारें

मजहबी ठेकेदार समाज पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए अपने धार्मिक अधिकारों का दुरुपयोग करते आ रहे हैं। वह नहीं चाहते कि लोग पढ़ें, लिखें, उनका विवेक जाग्रत हो। अगर लोग पढ़-लिखकर ज्ञानवान और विवकेशील बन जाएंगे तो इन कथित गुरुओं, पंडितों और मुल्लाओं की दुकानें खत्म हो जायेंगी। वस्तुतः हर मजहब के ठेकेदार अपने मजहबी लोगों को सदियों से अपनी लकड़ी से हांकते आ रहे हैं। पहले लोग अशिक्षित थे। ज्ञान के प्रकाश से दूर थे। अतः उनकी वकबास को भी ईश्वर अथवा खुदा का फरमान समझकर स्वीकार कर लेते थे। लेकिन जैसे ही समय ने करवट ली। लोगों में जाग्रति फैली। वह अपने विकास के बारे में सोचने लगा। उसका जीने का नजरिया बदल गया। लेकिन फिर भी कठमुल्ले अपने मजहबी लोगों को हांकने से बाज नहीं आ रहे हैं। अभी हाल में इस्लामी मजहबी संस्था दारुल-उलूम देवबंद द्वारा कामकाजी इस्लामी महिलाओं के बारे में जारी फतवे ने एक नई बहस छेड़ दी है। फतवे के मुताबिक इस्लामी महिलाओं के लिए सरकारी या निजी क्षेत्र में पुरुषों के साथ काम करना, पुरुष सहकर्मियों के साथ मेलजोल बढ़ाना व बातचीत करना इस्लाम विरोधी है। इससे पहले भी विवादास्पद फतवे जारी हुए। महिला की कमाई को हराम घोषित करना, सानिया मिर्जा की स्कर्ट, शोएब-सानिया के विवाह पूर्व साथ-साथ रहने सहित पंचायत चुनाव, बाल काटना, उन्हें काला रंग में रंगने के खिलफ भी फतवे जारी हुए। हालांकि पढ़े-लिखे लोग इन फतवों को अधिक महत्व नहीं देते लेकिन इससे नारी की गरिमा पर चोट तो लगती है।
इस्लाम में गैर-बराबरी नहीं
इस्लाम गैर-बराबरी की इजाजत नहीं देता। प्रगति के लिए मुहम्मद साहब ने कभी कोई बंदिश नहीं लगाई। पैगम्बर से इल्म की तालीम लेने आती थीं। इस फतवे का संभवतः यह आशय हो सकता है कि इस्लामी महिलाएं लाज-शर्म में रहें। वैसे भी आये दिन कामकाजी महिलाओं की यौन शोषण की शिकायतें आती रहती है। अगर वह तड़क-भड़क से दूर रहेंगी तथा मर्दों से अधिक नजदीकियां नहीं बढ़ाएंगी तो वह उनके शोषण से मुक्त रहेंगी। कट्टर इस्लामी देशों में भी औरतें काम करती हैं। पाकिस्तान जैसे इस्लामी देश में औरत ने देश की कमान संभाली है।
फतवा फरमान नहीं होता
वस्तुतः फतवा कोई फरमान नहीं होता जिसकी तामील की जाये। वैसे भी मजहबी ठेकेदारों को अपने मजहबी लोगों पर शिकंजा कसने में मजा आता है। मुल्ला और पुजारी नहीं चाहते कि लोग विवेकशील हों। इन फतवों की परवाह कौन करता है। यह कोई फरमान नहीं जिसे मानने के लिए बाध्य हों। वैसे इन फतवों से मुसलमानों का अहित ही हो रहा है जो आज के दौर में भी बेकारी, भुखमरी और अशिक्षा के वातावरण में जी रहे हैं।
फतवे व्यक्तिगत होते हैं
वैसे इस फतवे पर बेकार में ही हाय-तोबा हो रही है। इस तरह के कई फतवे जारी हुए हैं। लेकिन तरक्कीपसंद और शिक्षित मुसलमानों ने उसे गम्भीरता से नहीं लिया। अगर इन मुल्लाओं का मुसलमानों में इतना ही दखल होता तो हमारे फिल्म-जगत में एक भी मुस्लिम-औरत नहीं होती। फतवा तो सानिया मिर्जा के खिलाफ भी दिया गया था लेकिन उसका क्या हश्र हुआ। सभी जानते हैं।
औरत पर कामकाजी पाबंदी नहीं
इस्लाम में औरत के कामकाज पर कोई पाबंदी नहीं है। वह हिजाब में रहे। अपनी हया और शर्म को बरकरार रखें। उत्तेजक पोशाकों से अपने को महरूम रखें। पर्दा मुस्लिम जगत ही नहीं हिंदुओं में भी है। आज भी देहातों में पर्दा प्रथा है। अपने से बड़ों के सामने पर्दा करना हमारी परम्परा रही है। इस्लामी महिला बिना अत्याधुनिका बने भी प्रगति का सोपान पा सकती है। वैसे शर्म और हया ही औरत का जेवर है। इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता।
फतवा संविधान के खिलाफ
भारतीय संविधान इस देश में रहने वाले प्रत्येक स्त्री-पुरुष को को समानता का अधिकार देता है। हर किसी को पढ़ने-बढ़ने और काम करने की आजादी है तो फिर मजहबी लोग कौन होते हैं पाबंदी लगाने वाले। इस तरह के फतवों से अन्ततः मुस्लिमों का ही नुक्सान होगा जिसकी ठेकेदारी का दम फतवा देने वाले भरते हैं। देश की मुख्यधारा में आने के लिए मुस्लिम महिलाओं को और अधिक शिक्षित होकर देश के निर्माण में अपनी भागीदारी को अंजाम देना होगा।

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