रविवार, 13 जून 2010

बड़ो के प्रति न्यायपालिका की नरमी

यह प्रश्न देशवासियों को निरंतर मथ रहा है कि 1984 में भोपाल में हुई भयानक त्रासदी के आरोपियों को पर्याप्त दंड नहीं मिला। यूनियन कारबाइड सयंत्र भोपाल में जहरीली गैस रिसने से 15000 लोग काल-कवलित हो गये। लगभग पांच लाख लोग प्रभावित हुए। इस मामले में माना जा रहा था कि आरोपियों को कठोर दंड मिलेगा। लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। उनको मामूली दो वर्ष की सजा सुनाई गई। मुख्य आरोपी अमेरिकन वारेन एंडरसन को अछूता छोड़ दिया गया। इस निर्णय से देश में कड़ी प्रतिक्रिया हुई है। केन्द्रीय विधि मंत्री मोइली तक को कहना पड़ा कि इस निर्णय से न्याय दफन हो गया है। इसके बाद उन्होंने पलटी मारते हुए कहा कि मामले के मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन के खिलाफ मामला बंद नहीं हुआ है। कानूनी दांव-पेंच चाहे जो भी हों लेकिन इतना निश्चित है कि इस देश में आम आदमी की जिंदगी की कोई कीमत नहीं है। सरकार भी फैसला आने के बाद चेती है। अगर समय रहते सरकारी तंत्र सजग और चौकन्ना रहता तो निश्चित रूप से बड़ी मछलियां भी कानून के शिकंजे में होतीं। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लाग पर यह लिखकर कि इस निर्णय पर देशव्यापी चर्चा होनी चाहिए। इस मामले की गंभीरता को उल्लेखित किया है। इस महत्वपूर्ण व मानवीय त्रासदी से जुड़े मामले में सीबीआई की भूमिका को सराहनीय नहीं माना जा सकता। देश की सर्वाच्च जांच एजेंसी की लचर कार्रवाई से ही आरोपी कानून की नरमी का लाभ उठा गये। अगर सीबीआई मुस्तैद रहती तो कोई कारण नहीं था कि आरोपी इतने सस्ते में छूट जाते। मुख्य आरोपी को भी दंडित होना पड़ता। बदलते परिवेश में सीबीआई की जबावदेही भी तय होनी चाहिए।
जहां एक व्यक्ति की हत्या पर फांसी हो जाती है। वहीं 15000 लोगों के हत्यारों को मामूली सजा देकर छोड़ना हमारी न्यायपालिका की अस्मिता पर सवाल खड़ा करती है। इस मामले की सभी आरोपियों को कम से कम फांसी की सजा मिलनी चाहिए। हजारों लोगों के हत्यारों का इस प्रकार मामूली सजा पाकर छूटने से ऐसे तत्वों के हौंसले बुलंद होंगे और बेचारी जनता को हाथ मलते रहना पड़ेगा। यह प्रवृत्ति समाप्त होनी चाहिए। भोपाल गैस त्रासदी में अमेरिका का प्रभाव दिखाई दिया। मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन के लिए 1989 में गैर जमानती वारंट जारी हुआ लेकिन अमेरिका सरकार ने इस आरोपी के प्रत्यर्पण से इंकार कर दिया। इस कंपनी को भी चुपचाप बिक जाने दिया गया। लगता है कि इस मामले में हमारी सरकार ने अमेरिका के सामने घुटने टेक दिये। कानून भले ही आरोपियों के प्रति नरमी बरते लेकिन देश की जनता इस आरोपियों को कभी माफ नहीं करेगी। इस मामले में यदि प्रदेश सरकार प्रभावी पहल करती तो परिणाम आशानुकूल हो सकते थे। अब प्रदेश सरकार की नींद खुली है। वह आरोप लगा रही है कि केन्द्र सरकार ने इस त्रासदी को गंभीरता से नहीं लिया। अब मध्यप्रदेश सरकार की पांच सदस्यीय समिति मामले की समीक्षा करेगी। यदि समय रहते प्रदेश सरकार भी जाग्रत रहती तो आरोपी इतनी आसानी से कानून की नरमी का लाभ नहीं उठा पाते। जिस मुख्य आरोपी को गिरफतार किया गया फिर कुछ घंटे बाद छोड़ देना प्रदेश सरकार पर सवालिया निशान लगाता है। इस मामले को हल्के पन से नहीं लिया जाना चाहिए। केवल बयानबाजी से काम नहीं चलेगा अपितु अब तक हुई कमियों से सबक लेकर आगे की प्रभावशाली कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। सरकार को भोपाल गैस त्रासदी के फैसले के खिलाफ सरकार को हाई कोर्ट में अपील करनी चाहिए तथा देश के वरिष्ठतम कानूनविदों की सलाह लेनी चाहिए। प्रभावशाली पैरवी से ही इस त्रासदी के खलनायकों पर कानून का शिकंजा कसा जा सकता है। अब इस मामले में और ढील नहीं दी जानी चाहिए।।


2 टिप्‍पणियां:

  1. आपका कहना सही है, लेकिन जनता कुछ नहीं कर पायेगी... कांग्रेस ने बंटवारे के भयानक बीज बो दिये हैं जनता के दिल में. वर्ड वेरीफिकेशन????

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  2. खुद्दार एवं देशभक्त लोगों का स्वागत है!
    सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले हर व्यक्ति का स्वागत और सम्मान करना प्रत्येक भारतीय नागरिक का नैतिक कर्त्तव्य है। इसलिये हम प्रत्येक सृजनात्कम कार्य करने वाले के प्रशंसक एवं समर्थक हैं, खोखले आदर्श कागजी या अन्तरजाल के घोडे दौडाने से न तो मंजिल मिलती हैं और न बदलाव लाया जा सकता है। बदलाव के लिये नाइंसाफी के खिलाफ संघर्ष ही एक मात्र रास्ता है।

    अतः समाज सेवा या जागरूकता या किसी भी क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों को जानना बेहद जरूरी है कि इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम होता जा है। सरकार द्वारा जनता से टेक्स वूसला जाता है, देश का विकास एवं समाज का उत्थान करने के साथ-साथ जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों द्वारा इस देश को और देश के लोकतन्त्र को हर तरह से पंगु बना दिया है।

    भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, व्यवहार में लोक स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को भ्रष्टाचार के जरिये डकारना और जनता पर अत्याचार करना प्रशासन ने अपना कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं। ऐसे में, मैं प्रत्येक बुद्धिजीवी, संवेदनशील, सृजनशील, खुद्दार, देशभक्त और देश तथा अपने एवं भावी पीढियों के वर्तमान व भविष्य के प्रति संजीदा व्यक्ति से पूछना चाहता हूँ कि केवल दिखावटी बातें करके और अच्छी-अच्छी बातें लिखकर क्या हम हमारे मकसद में कामयाब हो सकते हैं? हमें समझना होगा कि आज देश में तानाशाही, जासूसी, नक्सलवाद, लूट, आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका एक बडा कारण है, भारतीय प्रशासनिक सेवा के भ्रष्ट अफसरों के हाथ देश की सत्ता का होना।

    शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-"भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान" (बास)- के सत्रह राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से मैं दूसरा सवाल आपके समक्ष यह भी प्रस्तुत कर रहा हूँ कि-सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! क्या हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवक से लोक स्वामी बन बैठे अफसरों) को यों हीं सहते रहेंगे?

    जो भी व्यक्ति इस संगठन से जुडना चाहे उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्त करने के लिये निम्न पते पर लिखें या फोन पर बात करें :
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
    भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
    राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
    7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
    फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
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