रविवार, 27 जून 2010

मशहूर शायर के. के. सिंह ’मयंक’ की गजलें




जनाब के.के.सिंह मयंक देश के मशहूर शायर हैं। उनकी शायरी में जीवन के हर पलों को शब्दायित किया गया है। समाज में फैली विसंगतियां, पारस्परिक भाईचारा, शांति और अहिंसा की झलक उनके कलामों में साफ दिखाई पड़ती है। इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। एक दीवान भी साया हो चुका है। वह वर्तमान में लखनऊ के विकास खंड, गोमती नगर में निवास कर रहे हैं। उनका संपर्क दूरभाष है ९४१५४१८५६९

छुपाये हम इसे कब हैसियत इतनी हमारी है
कि मां के दूध का ये कर्ज हर कर्जे पै भारी है।।

हकीकत मां की ममता की बयां की है फरिश्तों ने

पयम्बर हो कि वो अवतार हो, मां का पुजारी है।।
अगर जीते जी जन्नत चाहिए, मां के कदम चूमों

यही खुशियां तुम्हारी हैं वही जन्नत तुम्हारी है।।

बहुत रिश्तें है कहने के लिए यू तो जमाने में

मगर जो रिश्ता मां का है हरिक रिश्ते पै भारी है।।
क्यू ऐसी मां की ममता को भला कैसे भुला देगा

कि जिसने तेरी खातिर हर जगह झोली पसारी है।।

जन्म से सूखे बिस्तर पर सुलाया है तुझे मां ने

मगर गीले में सोकर उसने हर शब गुजारी है।।

वो मंदिर और शिवाले में चढ़ावा क्यों चादायेगा

कि मन मंदिर में जिसने आरती मां की उतारी है।।

किसी की कोई भी अब बददुआ लगती नहीं मुझको

मेरी मां ने नजर जबसे मेरी आकर उतारी है।।

जमाने को पसंद आए न आए क्या गरज हमको

हमारी हर अदा लेकिन हमारी मां को प्यारी है।।

सवारी और सवार आनंद दोनों ही उठाते हैं

कि मां की पीठ पर अगर बच्चा करता सवारी है।।

मयस्सकर जिसको ममता का न हो आंचल वो क्या जाने

कि दुनिया भर के गम की धूप इस आंचल से हारी है।।

तू दुख देकर उसे जन्नत तो क्या दोजख ही पायेगा

कि जिस माता ने तेरी, फर्श पै हस्ती उतारी है।।

वसीयत में मयंक अब और तुमको चाहिए भी क्या

तेरे हिस्से में बूढ़ी मां की गर तीमारदारी है ।


वो दिलरुबाई कर नहीं सकते


हमें मालूम है वो दिलरुबाई कर नहीं सकते

मगर फिर भी हम उनसे बेवफाई कर नहीं सकते।।

जो मुमकिन है मुनासिब है तुम्हें हम पेश कर देंगे

तुम्हारे नाम हम सारी खुदाई कर नहीं सकते।।

वो हिंदू हों कि मुसलिम हों इसी मिट्टी में जनमें हैं

वतन से बेवफाई मेरे भाई कर नहीं सकते।।

पड़ोसी हैं कभी लगजिश पै लगजिश कर भी सकता है

मगर फिर भी हम उसकी जग हंसाई कर नहीं सकते।।

खुशी के फूल उनकी जिंदगी में खिल न पायेंगे

चमन की खूनेदिल से जो सिंचाई कर नहीं सकते।।

निशाना साधकर जो दुश्मनों पर वार करते हैं

डराने के लिए फायर हवाई कर नहीं सकते।।

वे खरपतवार से फसलों को अपनी क्या बचायेंगे

समय रहते जो खेतों की निराई कर नहीं सकते।।

मयंक उस कर्ज को लेना कभी मत साहूकारों से

अदा जिस कर्ज की तुम पाई-पाई कर नहीं सकते


3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब महाराज जी क्या कहने। एक बड़े गजलकार से परिचित कराने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया। बहुत शानदार रचनाएं हैं।
    एक बात और मेरे ब्लॉग को डीएलए में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। उम्मीद है आगे भी आशीर्वाद बना रहेगा।

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  2. दोनों ही गज़लें पढ़कर आनन्द आया. जनाब के.के.सिंह मयंक की रचनायें पढ़वाने का बहुत आभार.

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  3. दोनो ही गजृलें कमाल की । माँ वाली तो बहुत ही खूबसूरत ।मयंक जी से परिचय कराने का आभार ।

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