सोमवार, 28 जून 2010

किस कोठे पर हो ?



बड़ा अटपटा लग रहो होगा आपको यह शीर्षक। आप अपने मन में सोच रहे होंगे कि किसी वेश्यागामी अथवा वेश्या के बारे में यह प्रश्न किया जा रहा है। लेकिन आज की सच्चाई है कि हम कितने संवेदनशून्य हो गए हैं कि हमें हर आदमी कि पहचान कोठे से करने कि आदत पड़ गई है।
यह हालत हैं आगरा के पत्रकारिता जगत की । कभी आपने उत्कर्ष पर इठलाता यह शहर अब अपनी बेवशी पर आंसू बहाने के अतिरिक्त कुछ करने में अपने को असमर्थ पा रहा है। एक पत्रकार मित्र जो काफी अरसे तक समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण स्थानों पर रहे लेकिन आज के कुत्सित प्रतिस्पर्धा और गुटबंदी के कारण फिलहाल किसी अख़बार में सेवारत नहीं हैं। यह दर्द उनका ही नहीं तमाम पत्रकारों का है जो संघर्ष के दौर से गुजर रहे हैं।
काफी संवेदनशील इस पत्रकार को इस बात का मलाल है कि पहले जो लोग उनको अपना आराध्य समझते थे। कहीं भी मिल जाएँ तो उनको प्रणाम करना अपना धर्म समझते थे। अख़बारों से विरत होने पर गधे के सर से सींग कि तरह गायब हो गए हैं। यह लोग प्रयास करते हैं कि भूले-भटके भी उनसे इनका आमना-सामना न हो। आखिर बाजारवाद और भौतिकवाद का यही तो जहर समूचे समाज की शिरायों में प्रवाहित हो रहा है कि जो अनुपयोगी है। उसे लिफ्ट मत दो। यानी यूज एंड थ्रो ही तो आज कि कटु सच्चाई है।
वह कहते हैं कि कभी अकस्मात ऐसे लोग मिल भी जाएँ तो इन लोगों का पहला प्रश्न होता है कि गुरु आजकल कहाँ हो ? अर्थात किस कोठे की वेश्या हो। क्या अख़बार की नौकरी के अलावा पत्रकारिता नहीं हो सकती ? क्या पत्रकार बनने के लिए किसी अख़बार में सेवा करना ज़रूरी है ? ऐसे प्रश्न संवेदनशील लोगों को उद्वेलित कर देते हैं।
ऐसे ही एक पत्रकार जिनका इस क्षेत्र में दशकों का तजुर्बा रहा है। पहले उनके मोबाईल की घंटी हर समय निरंतर बजती रहती थी। अब लगता है कि वह घंटी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई कि तरह मौन हो गई है। कई समाजसेवी तथा राजनैतिक लोगों के अपकर्ष व् उत्कर्ष के साक्षी रहे इस पत्रकार को भी यही शिकायत है। पहले जो लोग गर्मजोशी से मिलते थे लेकिन अब मिलने से कतराते हैं। वाह रे आगरा और अजाब तेरी दास्ताँ ।

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