शनिवार, 17 जुलाई 2010

परिकल्पना ब्लॉगोत्सव 2010 के श्रेष्ठ लेखक व लेखिका


हिंदी ब्लॉगिंग अपने परवान पर है। इसने भी अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में अपनी पहचान बना ली है। ब्लॉग लेखन में अद्वितीय योगदान के लिए इस उत्सव में पुणे की श्रीमती सरस्वती प्रसाद को वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका तथा भोपाल के रवि रतलामी उर्फ रविशंकर श्रीवास्तव को श्रेष्ठ लेखक के रूप में पुरस्कृत किया गया। वस्तुतः हिंदी ब्लॉग की लोकप्रियता काफी बढ़ी है। कई रचनात्मक लेखकों और कवियों ने इसे समृद्ध बनाया है।
ब्लॉग ‘मैं और मेरी सोच‘ सरस्वती प्रसाद का है। इस ब्लॉग का परिचय इन पंक्तियों में समाहित है। ‘‘सुंदरता एक ऐसा चित्र है, जिसे तुम आंख बंद करने के बाद भी देख लेते हो और कान बंद करने के बाद भी सुन लेते हो.....ठीक उसी तरह कल्पनाओं की धरती अपनी हो जाती है, जब हमारे हाथ में कलम हो तो...............
सरस्वती प्रसाद के इस ब्लॉग में अधिकांश कविताएं ही हैं। लेकिन उन्हें संस्मरण पर पुरस्कार मिला है। ब्लॉग पर उनकी कविता-
दो निगाहों के लिए,
दो नयन भटके हर कहीं
पर न पाया ठौर
अपना भी बना कोई नहीं
अब ये क्या अपनाती
जब जा रही बरात है...........
क्या अनौखी बात है

उनकी पोस्ट संस्मरण-प्रश्नों के आइने में, मैं उन्होंने अपने जीवन के अछूते पहलुओं पर प्रकाश डाला है। इसमें उन्होंने सुमित्रानंदन पंत के पत्र का भी जिक्र किया है जो उन्हें लिखा गया। बचपन की सुखद अनुभूतियों से यह आलेख सराबोर है। ब्लॉगर की एक पुस्तक ‘नदी पुकारे सागर‘ प्रकाशित हो चुकी है।
श्रेष्ठ लेखक के रूप में पुरस्कृत रवि रतलामी चिट्ठा जगत का जाना-पहचाना नाम है। उनके दो ब्लॉग ‘‘रचनाकार तथा छींटें और बौछारें हैं। रचनाकार वस्तुतः ब्लॉग पत्रिका लगती है जिसमें विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं प्रकाशित होती हैं। इस प्रकार इसे रचनाकारों का साक्षा मंच भी कहा जा सकता है।
छींटें और बौछारें अपने आप में हिंदी का संपूर्ण ब्लॉग है। ब्लॅाग के परिचय में ‘‘टेड़ी दुनियां पर रवि की तिर्यक रेखाएं‘‘ अपने आप में बहुत कुछ कह जातीं हैं। ब्लॉग में कई लेबल यथा व्यंग्य, तकनीकी, विविध, हिंदी के तहत रचनाएं पोस्ट की गई हैं। जिस प्रकार चिट्ठाकार लेखन में सिद्धहस्त है उसी प्रकार उसके कैमरे की निगाहें भी काफी तीक्ष्ण हैं।
चित्रावली में उनके द्वारा पोस्ट फोटो बोलते प्रतीत होते हैं। उनका कैमरा वहां पहुंच जाता है जहां शब्द विवश हो जाता है। देश-दशा पर व्यंग्यात्मक दृष्टि ही उनक लेखन की विशेषता है। शिक्षा-रोजगार का जन्मसिद्ध अधिकार है, इसके अंतर्गत एक बच्चे को सिर पर टोकरी लिए मजदूरी करते दिखाया गया है। इसी प्रकार पार्किंग पर चलती जिंदगी, चटाई घड़ी, पुरातत्व इमारतों की जर्जर स्थिति आदि फोटो प्रभावित करने के साथ हमारी व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करते प्रतीत होते हैं। उनकी गजल की बानगी दृष्टव्य है-
देश तो साला जैसे सुबह का अखबार हो गया
वे तो एक नोवेल था कैसे अखबार हो गया

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें