सोमवार, 26 जुलाई 2010

गुरुता हुई कलंकित, गुरु बने गुरु घंटाल

कभी भारत को विश्व गुरू कहा जाता है। यहां ज्ञान का अथाह भंडार था। गुरु सात्विक जीवन और नैतिक मूल्यों में विश्वास करते थे। राजा से लेकर रंक तक उनका सम्मान करता था। यह उन गुरूओं की महानता ही थी कि आरुणि, एकलव्य जैसे शिष्यों ने गुरू के प्रति अपनी श्रद्धा अनवरत जारी रखी। लेकिन बदलते परिवेश में भारत में गुरूओं की तो बाढ़ गई है लेकिन गुरुता दम तोड़ती नजर रही है। कोई धर्म-गुरु, कोई आध्यात्मिक-गुरु, कोई कुलगुरु, कोई कला और संगीत गुरु तो कोई विद्या-गुरु। अब तो चोर और डाकुओं के भी गुरु होने लगे हैं जो उन्हें उस पेशे का हुनर ईमानदारी से सिखाते हैं। वक्त के साथ गुरु-शिष्य परंपरा बदलती गई। गुरु या तो मास्टर हो गया है कोच। वह पूरा व्यवसायिक हो गया। इसी प्रकार शिष्य भी बदल गया। गुरु को वह या तो वेतनभोगी समझता है अथवा ट्यूशन खोर। उसके मन में गुरु के लिए कोई श्रद्धा और सम्मान नहीं है। आखिर कैसे बदला यह सब। गुरुओं के प्रति श्रद्धा घटने कामुख्य कारण शिक्षा जगत में अयोग्य लोगों का प्रवेश है। योग्य और प्रतिभाशाली लोग तो सिविलसर्विसेज, चिकित्सा, इंजीनियरिंग तथा वैज्ञानिक क्षेत्र में चले जाते हैं। जो इनसे बचे रहते हैं। वह शिक्षक बन जाते हैं। वह शिक्षक भी अपनी योग्यता के आधार पर नहीं अपितु भ्रष्टाचार और भाई-भतीजेवाद के कारण बनते हैं। जब ऐसे लोगों में शिक्षा के संस्कार ही नहीं है तो गुरुत्व कहां रहेगा ? जब से शिक्षा का बाजारीकरण हुआ है तब से शिक्षामंदिरों की दुर्दशा हो गई है ? गुरु और शिष्य का संबंध ग्राहक और दुकानदार का हो गया है। सरकारी और अनुदानित शिक्षा संस्थानों में शिक्षा का वातावरण समाप्त हो गया है। गुरु भी पैसे के लिए दौड़ रहा है। यह अपने कर्तव्य से विमुख हुआ है। जब अपने को राष्ट्रनिर्माता कहने वाला ही नैतिक मूल्यों और सात्विक जीवन में विश्वास नहीं रखेगा तो गुरुता में तो गिरावट आयेगी। वस्तुतः कुछ लोगों ने तो गुरु शब्द को ही अपने कर्मों और व्यवहार से कलंकित कर दिया है। कान में मंत्र फूंकने वाला अथवा कंठी-माला पहचाने वाला ही गुरु नहीं होता बल्कि गुरु तो शिष्य को अज्ञानरूपी अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले जाता है। कबीर ने भी गुरु को गोविंद से श्रेष्ठ माना है। वस्तुतः गुरु तो व्यक्ति है और ही संस्था। वह तत्व है जिसे पाने के लिए उसे ज्ञान अर्जन कर उसे वितरण करना होता है। आज समाज में गुरु कम गुरु घंटाल अधिक दिखाई देते हैं। जबगुरुओं ने ही सात्विक जीवन और नैतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ा दी है तो कौन शिष्य उनका सम्मान करेगा। आज का गुरु ज्ञानपिपासु कम भोगपिपासु अधिक हो गया है। सारे देश में धर्म-गुरुओं सहित शिक्षा-गुरुओं की बाढ़ आई हुई है लेकिन फिर भी समाज में गिरावट जारी है। इसका मुख्यकारण गुरुओं का गुरुता से हट जाना है। गुरुओं का समर्पण अपने परिवार को भौतिक साधन जुटाने तक सीमित रह गया है। यही कारण है कि आज हर क्षेत्र का गुरु साधन-संपन्न है। गुरुओं को अपना सम्मान अक्षुण्ण रखने के लिए भारतीय दर्शन और नैतिक मूल्यों को आत्मसात करना होगा।
आज का गुरु केवल अपने तक सीमित है। उसकी प्राथमिकताएं बदल गई हैं। शिक्षा मंदिरों में गुरुओं ने अपनी प्रासंगिकता खो दी है। बदलते सोशियो-इकोनोमिक परिवेश का उसपर पूरा प्रभाव पड़ा है।गुरु-शिष्य परंपरा तो गुरुकुल के बाद समाप्त हो गई। आज के गुरु रूपी शिक्षक को अपने वेतन से मतलब है। उसमें ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा नहीं रही। जब वह ही ज्ञान और सृजन से दूर भाग रहा है तो शिष्यों को कैसे प्रेरित करेगा। अगर शिक्षक प्रोफेशनल ओनेस्टी अपनाएं तो बहुत कुछ बदलाव हो सकता है। हकीकत यह है कि आज छात्र पढ़ना चाहता है और शिक्षक पढ़ाना। जब शिक्षक को बिना पढ़ाए पूरा वेतन और प्रोन्नति सहित सुविधाएं मिल रहीं है तो वह क्यों अपने कर्तव्य का पालन करे ? उस पर कोई अंकुश नहीं। निजी क्षेत्र का शिक्षक अल्पवेतन से परेशान है और सरकारी और अनुदानित संस्थान के गुरु निरंकुश हैं। कहां रहा गुरु और शिष्य का रिश्ता ?
पहले गुरुओं के पास अभिभावक ज्ञान और विज्ञान प्राप्त करने के लिए भेजते थे। गुरु और शिष्य का रिश्ता अटूट था। उनमें आत्मीयता और लगाव था। वह गुरुओं का सम्मान करते थे। लेकिन आज का अभिभावक बच्चों को पढ़ाने नहीं अपितु पास कराने के लिए आता है। वह स्कूल-कालेजों में सीधी बात कहता है कि बच्चा फर्स्ट क्लास पास होना चाहिए। जब से शिक्षा जगत में नकल का बोलवाला हुआ है। गुरु और शिष्य के संबंध आहत हुए हैं। अभिभावकों ने ही गुरु को भ्रष्ट बनाया है और उसी ने ट्यूशनखोर। आरंभ में अभिभावकों ने गुरु रूपी शिक्षक को लालच देकर खरीदा और अब गुरु अपनी कीमत पर बिक रहा है। शिक्षा जगत में आई गिरावट के लिए अभिभावक जिम्मेदार हैं। उन्होंने बच्चों में संस्कार नहीं दिए कि गुरु का कैसे सम्मान किया जाए ? पैसे के बल पर लोगों ने कला और धर्मगुरुओं तक को खरीद लिया। अतः उनकी गुरुओं के प्रति श्रद्धा नहीं है तो गुरुओं की उनके प्रति आत्मीयता कैसे रहेगी ?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें