शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

रिटायरमेंट में आयु वृद्धि क्यों

केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नवी आजाद उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर चिकित्सा शिक्षकों कीसेवा निवृत्ति की आयु 62 से बढ़ाकर 65 करने को कहा है। प्रदेश सरकार एसजीपीजीआई लखनऊ केचिकित्सा शिक्षकों की आयु बढ़ाने जा रही है। इस संबंध में प्रस्ताव तैयार है जिसे केबिनेट की मंजूरी काइंतजार है। यह भी संभावना है कि प्रदेश के सभी मेडिकल कालेजों के शिक्षकों की आयु में वृद्धि कीजायेगी। सरकार के इस फैसले से बेरोजगार डाक्टरों में हताशा व्याप्त हो गई है। इससे पहले भी सरकारकेन्द्रीय विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की रिटायरमेंट आयु में वृद्धि की वुकी है। क्या सरकार को पता नहीं हैकि देश में हजारों पी-एच.डी., डी.लिट् तथा नेट क्वालीफाइड युवा हैं जो नौकरी की वाट जोहते-जोहतेप्रोढ़ावस्था के कगार पर गये हैं। इसी प्रकार बी.एड.एम.एड. लोगों की भी कोई कमी नहीं है। लेकिनसरकार के अदूरदर्शी निर्णय से इन लोगों का भाग्य भी अंधकारमय हो गया है। शिक्षित बेरोजगारों कीफौज निरंतर बढ़ती ही जा रही है। उस पर भी सरकार अपने शिक्षकों की रिटायरमेंट की आयुसीमा मेंनिरंतर वृद्धि कर रही है। प्रदेश के शिक्षा जगत में भी आयु सीमा 62 वर्ष है। सवाल यह पैदा होता है किजब देश में पढ़े-लिखे और प्रशिक्षित लोग हैं तो इन रिटायर्ड लोगों की फौज का क्यों पाला जा रहा पालाजा रहा है। इसी प्रकार कुछ शिक्षण संस्थानों में अनुभव के नाम पर रिटायर्ड शिक्षकों अथवा डाक्टरों कोरखा जा रहा है। यह क्या युवाओं के साथ द्रोह नहीं है। वस्तुस्थिति यह है कि लगभग सभी शिक्षक अपनीपारिवारिक जिम्मेदारियों से 55-60 की आयु तक मुक्ति पा लेते हैं। रिटायर होने के दो साल पहले से हीवह अपना कार्यभार त्याग देते हैं और अपनी पेंशन, ग्रेच्युटी आदि अन्य लाभों के गुणा-जोड़ में लगे रहतेहैं। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यहां शिक्षित बेरोजगारों की फौज हताशा और निराशा के सागर में गोतेलगा रही है और हमारे देश के कर्णधारों को उनसे कोई मतलब ही नहीं है। इस प्रकार देश के युवाओं कीऊर्जा और योग्यता का सही मूल्याकंन नहीं हो पा रहा है। सरकार को इन लोगों की आयु सीमा तब बढ़ानीशोभा देती कि देश में शिक्षित और प्रशिक्षित लोगों का अभाव है। अतः संस्थाओं के सुचारू संचालन केलिए रिटायरमेंट की सीमा बढ़ाई जा रही है। सरकार के इस तरह के अदूरदर्शी फैसलों से युवाओं केदिशाभ्रमित होने का खतरा मंडरा रहा है। असंतोष और हताशा कब किस शिक्षित युवा को अराजकता कीओर मोड़ दे। कहा नहीं जा सकता। आश्चर्य तो इस बात का भी है कि विपक्ष हर जरूरी और गैरजरूरी बातपर अपनी आपत्ति दर्ज कराता है लेकिन रिटायर्ड लोगों की चारागाह बनाने के लिए उसकी भी मौनस्वीकृति है। वस्तुतः अब समय गया है कि शिक्षित युवाओं को स्वयं ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी।अन्यथा नौकरी के इंतजार में उनकी आयुसीमा निकलने में देर नहीं लगेगी।

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