शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

सुप्रीम कोर्ट की बेबसी


शर्मनाक बात है कि देश की सर्वोच्च न्यायालय को यह कहने के लिए विवश होना पड़ा है कि अगर उसकेआदेश का पालन हो तो अपनी किस्मत पर रोइए। सुप्रीम कोर्ट के पास तो पुलिस है और ही ऐसाकोई अधिकार जिसके तहत वह किसी व्यक्ति को गिरफतार कर सके। यह पीढ़ा न्यायमूर्ति मार्कंडेयकाटजू और न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर की नहीं अपितु हमारी समूची न्याय व्यवस्था की है। जोन्यायपालिका देश के संविधान की रक्षक और व्याख्याकार है। कार्यपालिका और विधायिका से निराशऔर हताश नागरिक के लिए न्यायालय ही एकमात्र मंच रह जाता है जहां वह न्याय के लिए गुहार लगासकता है। परंतु जब न्यायपालिका ही बेवश हो तो जनता आखिर किसके पास जायेगी। किससेगुजारिश और मनुहार करेगी अपने न्याय के लिए। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बिडम्बना है किलोकतंत्र का प्रमुख स्तम्भ न्यायपालिका आज अपने को निर्बल और असहाय महसूस कर रही है। इससेअधिक दुर्भाग्यपूर्ण और क्या होगा कि उसके आधीनस्थ उच्च न्यायालय भी उसके आदेश तथा निर्देशोंकी धज्जियां उड़ा रही है। अब तक तो संसद और न्यापालिका तथा न्यायपालिका बनाम कार्यपालिकाटकराव की स्थितियां पैदा हुईं लेकिन जब न्यायपालिका का अपना तंत्र ही बेलगाम हो जाये तो स्थितिविस्फोटक हो सकती है। पूर्व सांसद पप्पू यादव की जमानत के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की चिंता जायज हैकि उसके स्पष्ट निर्देश के बाद पटना हाईकोट्र ने पप्पू यादव को जमानत दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देशमें अभियुक्त की जमानत याचिका खारिज करते समय दिया था कि अभियुक्त को कोई भी अदालतजमानत दे। इसके बावजूद अभियुक्त को जमानत दिया जाना न्यायिक अराजकता के सिवाय औरक्या है। सवाल यह भी उठता है कि जब सुप्रीम कोर्ट के आधीनस्थ कोर्ट ही उसके दिशा निर्देशों का पालननहीं करेंगे तो क्या न्यायपालिका की सर्वोच्चता और गरिमा अक्षुण्ण रह पायेगी। इस मामले में जस्टिसद्वय द्वारा जाहिर की गई बेवसी से कुछ नहीं होगा। लगता है कि सुशासन बाबू के बिहार में सब कुछ ठीकनहीं चल रहा। जब सुप्रीम कोर्ट ने 3 मई को पप्पू यादव को पटना हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत रद्द करदी तो अब तक बिहार पुलिस ने उसे गिरफतार क्यों नहीं किया ? क्या बिहार सरकार की जिम्मेदारी नहींहै कि वह माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन कराना सुनिश्चित करती। लगता है कि नीतीश कुमारभी कानून पालन के मामले में राजनीति कर रहे हैं ? हो सकता है कि
2007 वह इस बाहुबलि नेता को अपनीपार्टी में लेना चाहते हों। इसीलिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी की। बात कुछ भी लेकिनइस बारे में समूचा देश एकमत है कि न्यायपालिका की गरिमा और मर्यादा कायम रहनी चाहिए। उसमर्यादा का अतिक्रमण करने वाली किसी भी संस्था को बख्शा नहीं जाना चाहिए।

2 टिप्‍पणियां:

  1. शर्मनाक है ये अवस्था पूरे देश समाज और देश के प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति के साथ-साथ हर इमानदार और देश भक्त नागरिकों के लिए |

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