सोमवार, 9 अगस्त 2010

प्रभु वर्ग कानून से ऊपर क्यों ?

प्रभु वर्ग कानून से ऊपर क्यों ?

हमारे
संविधान में सभी को समान अधिकार दिये गये हैं।
कानून की निगाह में राजा और रंक
बराबर हैं। यह बात सैद्धान्तिक रूप से तो अच्छी लगती है लेकिन सच्चाई कुछ और ही है।
कानून का डर केवल आम आदमी को है। प्रभु वर्ग हमेशा से ही उसके साथ खिलवाड़ करता
रहा है। अभी गुजरात में गृहराज्य मंत्री अमित सीबीआई की गिरफत में आये हैं। उन पर
सोहराबुद्दीन शेख के फर्जी मुठभेड़ का संगीन आरोप है। उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी हो चुका है। लेकिन वह कानून की पकड़ से फिलहाल दूर हैं। अतः उन्हें फरार घोषित किया गया है।अफसोस इस बात का है कि एक कथित आरोपी जिस पर संगीन आरोप हैं।
वह कैसे चुनाव जीत गया और कैसे वह गृहराज्य मंत्री की कुर्सी पर आसीन हो गया। ऐसे और भी उदाहरण हो सकते हैं। परंतु चाल, चलन और चरित्र का ढिंढोरा पीटने वाली पार्टी से यह
उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह कानून की धज्जियां उड़ाने वालों को संरक्षण प्रदान करे।

राजनीति पनाहगाह है अपराधियों की

कभी राजनीति में त्यागी, तपस्वी और समाजसेवा का भाव आत्मसात किये लोग आते थे। लेकिन अब राजनीति का पूरा चरित्र ही बदल गया है। हर राजनीतिक दल को जिताऊ प्रत्याशी चाहिए। जिताऊ प्रत्याशी वह होता है जिसके पास जीतने के सभी हथकंडे हों। ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से कोई शरीफ और ईमानदार आदमी नहीं हो सकता। राजनीति दलों की इस नीति के कारण अच्छे लोग राजनीति से दूर हो गये और अपराधी तत्वों का बोलवाला हो गया। इन लोगों से जनता कोकोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

जनता भी बराबर की दोषी

अगर राजनीति में अमित शाह जैसे लोग हैं। तो इसके लिए तो भाजपा दोषी है और ही
अमित शाह। आखिर उन्हें जनता ने ही तो चुनकर विधानसभा भेजा था। वोट देते समय जब
जनता जातिवाद, क्षेत्रवाद और धर्मवाद का ख्याल रखती है तो इसी प्रकार कानून की धज्जियां उड़ती रहेगी।अगर जनता फैसला कर ले कि किसी गलत आदमी को जीतने नहीं
दिया जायेगा तो कोई भी अवांछनीय तत्व राजनीति में चमक नहीं सकता।

जनता के पास सीमित विकल्प

हर मतदाता चाहता है कि उसका प्रतिनिधि ईमानदार और संघर्षशील हो। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि उसके पास विकल्प नहीं हैं। हर दल ऐसे ही लोगों को टिकिट देता है जो बेईमान और भ्रष्ट हो। आखिर इन्हीं के पास तो पैसा और ताकत होती है चुनाव लड़ने की। जब सभी दलों के प्रत्याशी एक तरहके हैं तो जनता क्या करें। इन्हीं लोगों में से उसे चुनना होता है अपना प्रतिनिधि। विकल्पहीनता केअभाव में जनता कैसे दोषी हो सकती है। इसके लिए चुनाव आयोग को पहल करनी होगी।

भ्रष्ट नौकरशाही का प्रभाव

हमारी नौकरशाही वस्तुतः भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है। उसकी जबावदेही भारतीय संविधान और जनता के प्रति है। लेकिन वह राजनेताओं के हाथ की कठपुतली बनी हुई है। इसका कारण यह है कि वह ईमानदार नहीं रही। हमारी पुलिस और जांच एजेन्सियां निष्पक्ष और निर्भीक नहीं है। इसीलिए अमित शाह जैसे राजनेताओं की हिम्मत हो जाती है कि वह कानून के साथ खिलवाड़ करें। सत्तान्मुखी नौकरशाही देश के लोकतंत्र के लिए खतरा है। वस्तुतः नौकरशाही की संरचना औरकार्यकलापों में आमूलचूल परिवर्तन होना चाहिए।

जनता की जागरूकता अपरिहार्य

जनता में जागरूकता का अभाव है। जब तक स्वच्छ राजनीति नहीं होगी। भ्रष्ट नौकरशाही हावी रहेगी और जनता शोषण और यातना का शिकार होती रहेगी। वस्तुतः पूरे देश में राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ जनांदोलन होना चाहए। जनता को भी प्रत्याशी चयन में योग्यता को प्राथमिकता देनी होगी। जब हमारा समाज ही दिशाभ्रमित हो गया है तो राजनीति तो
बेलगाम होगी ही। जनजागरण से इस तस्वीर को बदला जा सकता है। इसके लिए समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों को आगेआना होगा।

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