गुरुवार, 12 अगस्त 2010

चिट्ठों में छिनालवाद और ज्योतिष

हिंदी चिट्ठाजगत अपनी ऊंचाइयों पर है। साहित्य तो समूचे ब्लॉग जगत में सिर पर चढ़कर बोल रहा है। शौकीन अथवा मात्र ब्लाग लेखन से अलग कुछ ऐसे भी व्यक्तित्व हैं जिनके कारण हिंदी चिट्ठाजगत स्वयं गोरवांवित हो रहा है। ऐसे ही ब्लॉगर हैं गिरीश पंकज। पंकज का ब्लॉग वैचारिक पैनापन लिए हुए है। मौलिक और विषय के सूक्ष्मविश्लेषण के साथ प्रस्तुत उनकी पोस्ट सहज ही अपनी ओर खींचती हैं। वह साहित्य जगत का चर्चित नाम है। वह विगत पैतीस सालों से साहित्य एवं पत्रकारिता में समान रूप से सक्रिय हैं। विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी पंकज की बत्तीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका काव्य, व्यंग्य, कहानी, उपन्यास चिंतन सहित प्रत्येक विधा पर समान अधिकार है। मन दर्पण नाम से उनका ब्लॉग इस समय चर्चा में बना हुआ है क्योंकि उन्होंने नया ज्ञानोदय में प्रकाशित महात्मा गांधी हिंदी अन्तर्राष्टीय विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा लेखिकाओं के लिए प्रयुक्त ‘छिनाल‘ शब्द को अपने तरीके से व्यक्त किया है। देखें-

’’साहित्य में इन दिनों ‘छिनालवाद’ का सहसा नव-उदय हुआ है. इसके आविष्कर्ता है वर्धा के अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय. यह ‘छिनालवाद’ इस वक्त सुर्खियों में है और लम्बे समय तक रहेगा. साहित्य में चर्चित बने रहने के लिये कुछ हथकंडे अपनाये जाते हैं, नवछिनालवाद इसी हथकंडे की उपज है. नया ज्ञानोदय को दिए गए अपने साक्षात्कार में स्त्री लेखिकाओं के लिये जिस भाषा का प्रयोग किया है, उसके लिये अब उन्होंने माफी माँग ली है, लेकिन इसके बावजूद उनका अपराध अक्षम्य है. कुलपति पद पर बैठ कर भाषागत संयम जो शख्स न बरत सके, उसे पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है. लेकिन नैतिकता अब बहिष्कृत शब्द है. जिसके बारे में चर्चा करना ही बेमानी है. और वैसे भी यह देखा गया है, कि बहुत से लोग कुलपति बनाने के बाद नैतिक नहीं रहा पाते. पता नहीं यह पद के कारण है, या कोई और बात है. कुलपति होने का दंभ भी व्यक्ति को अनर्गल प्रलाप के लिये विवश कर देता है।

डनकी कविता भी सहज और संप्रेषणीय है-

सचमुच सबकी माता धरती
अपनी भाग्यविधाता धरती

लूट रहा है किसकी अस्मत
मानव समझ न पाता धरती

काश कहीं तुम मिल जाती तो
अपना दर्द सुनाता धरती

तुझ में ही तो खो जाना है
तुझसे ऐसा नाता धरती

संगीता पुरी का नाम भी ब्लॉग जगत में जाना पहचाना है। उनके ब्लॉग अपनी विशिष्ट पहचान लिए हुए हैं। इस कारण वह सबसे अलग दिखाई देते हैं। गत्यात्मक चिंतन, गत्यात्मक ज्योतिष आदि उनके ब्लॉग इन विषयों पर गंभीर, शोधित तथा नवीनतम जानकारी प्रस्तुत करते हैं। ज्योतिष व प्राचीन आख्यानों की समसामयिक संदर्भों में व्याख्या करने में संगीता जी सिद्धहस्त हैं। वह अपने ब्लॉग परिचय में लिखती हैं ‘‘ईश्वर न सही प्रकृति है............ कहीं तो नतमस्तक होना ही होगा हमें।‘‘
वैदिक साहित्य के आख्यानों और पौराणिक मिथकों को विज्ञान की गल्प कथाएं कहा जा सकता है‘‘ में वह लिखती हैं।
’’इस प्रकार के तथ्य के अन्वेषण का कारण यह है कि प्रायः देखा जाता है कि विज्ञान का कोई नया आविष्कार सामने आते ही उससे मिलती जुलती पौराणिक कथाएं या शास्त्राख्यानों की तरु सहज ही ध्यान आकर्षित होता है और भारतीय मनीषी यह सोंचने लगते हैं कि उदाहरण के लिए डी एन ए के सिद्धांत के विकास के साथ जैसे ही विज्ञान ने इच्छित व्यक्ति के क्लोन बनाने की ओर कदम बढाए , तारकासुर के वध के लिए शिव के वीर्य से उद्भुत पुत्र की कथा सामने आ गयी। हृदय , किडनी , लीवर जैसे अंगों के प्रत्यारोपण की वैज्ञानिक क्षमता की तुलना में अज शिर के प्रत्यारोपण , जैसी अनेक कथाएं से पौराणिक मिथक भंडार परिपूर्ण है , जहां तक विज्ञान को जाना शेष है। पार्वती द्वारा गणेश का निर्माण और देवताओं द्वारा अत्रि के आंसु से चंद्रमा के निर्माण की कथाएं मानव के लिए चुनौती हैं। वायुशिल्प की जिन ऊंचाइयों को रामायण और महाभारत के वर्णन छूते हैं , वहां तक पहुंच पाना हमें दुर्गम लगता है। वायुपुत्र हनुमान की परिकल्पना, उसकी समसत गतिविधियों में विज्ञान के बढते चरणों के लक्ष्य को नापने लगती है। मानव का पक्षी की तरह आकाश में उड पाने का सपना ही हनुमान का चरित्र है।‘‘

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