शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

दूसरी आजादी की जंग की ज़रुरत

कभी वो दिन भी आएगा कि आजाद हम लोंगे
ये अपनी ही जमीं होगी, यह अपना आस्मां होगा
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा

शहीद कवि ओम प्रकाश की यह पंिक्तयां हमसे प्रश्न करती हैं कि हमने अपनी कुर्बानी देकर भारत को आजाद तो करा लिया लेकिन क्या बाकई में आजादी आई है या वह कुछ लोगों के घर की दासी बन गई है। आजादी के छह दशक बाद भी न तो देश से गरीबी मिटी और न ही बेकारी। धन का वितरण इस प्रकार हुआ कि मुट्ठी भर लोगों के हाथ में देश की अधिकांश सम्पदा है। आजादी से क्या हर चेहरे पर मुस्कान आई ? क्या गरीबों को जीने का हक मिला ? क्या आजाद भारत में कानून का शासन है ? क्या देश के कर्णधारों सामाजिक और आर्थिक विषमता मिटाने के लिए कुछ किया ?
लगता है कि हम आजादी के महत्व को भूल गये हैं। जिस स्वाधीनता के लिए हजारों लोगों ने कुर्बानी दी। लाखों लोग ब्रिटिश हूकूमत की जेलों में गये। यातना और उत्पीड़न के दौर से रूबरू रहकर जिन लोगों ने देश को आजादी दिलाई। उनकी आत्मा निश्चित रूप से चीत्कार कर रही होगी। शहीदों ने क्या ऐसे भारत की परिकल्पना की होगी। जहां अनाज गोदामों में सड़ता हो और जनता भूखी मरती हो। अपने हकों के लिए आवाज बुलंद करने पर उनके सीने पर गोलियां बरसती हों। सादगी और सात्विकता के मिसाल हमारे नेता वस्तुतः आज विलासिता में डूबे हुए हैं। उन्हें न तो देश की आजादी से मतलब है और न ही उस कोटि-कोटि जनता से जिन्होंने आजादी के बाद अपने भाग्य पलटने की कल्पना की होगी। आजादी के बाद भौतिक विकास हुआ लेकिन इस दौर में हमने अपनी परम्परागत संपदा राष्टीय चरित्र को मिटा दिया। ईमानदारी और नैतिकता केवल किताबों और भाषणों तक ही सीमित रह गई है। भ्रष्टाचार का अजगर हमारी समूची अर्थव्यवस्था को पंगु बनाये हुए है। जातीय सामंत पहले से अधिक खूंखार होकर विचरण कर रहे हैं। शिक्षा और चिकित्सा को इतना महंगा कर दिया गया कि आम आदमी के सामने मरने और अशिक्षित रहने के कोई चारा नहीं हैं। जीवन के हर क्षेत्र में गिरावट आई है। विचारधारा औेर सिद्धांतों की राजनीति के स्थान पर अब धन-पशु और माफिया हावी है। जाति और धर्म के नाम पर वोटों की फसल बेखौफ काटी जा रही है। जनता का विश्वास आज की भ्रष्ट राजनीति से उठता जा रहा है। बेसहारा और बेजुबान लोगों का आक्रोश विविध रूपों में सामने आ रहा है। रोम जल रहा है लेकिन नीरो को बंशी बजाने से ही फुर्सत नहीं है।
प्रथम स्वाधीनता समर के दौरान जफर ने सही कहा था -
हिन्दियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की
तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।
आज आवश्यकता दूसरी आजादी के संग्राम की हो। जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ा जाना चाहिए। सामाजिक और आर्थिक असमानता के खिलाफ लड़ा जाना चाहिए। मुनाफाखोरी और मिटावटखोरी के खिलाफ लड़ा जाना चाहिए। स्वाधीनता दिवस पर केवल तिरंगा फहराने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। हमने बहुत बड़ी कुर्बानी देकर यह आजादी पाई है। हमारी आजादी को बाहरी शक्ति से नहीं अपितु देश में छिपे जयचंदो-मीरजाफरों से खतरा है। आओ हम उनकी शिनाख्त करें और ऐसे तत्वों के खिलाफ युद्ध छेड़े जो भारत माता को पुनः गुलामी की जंगीरों में जकड़ने का प्रयास कर रहे हैं। आओ! हम स्वाधीनता दिवस पर शपथ लें कि देश को वास्तविक आजादी दिलाने के लिए संघर्ष करेंगे। यह संघर्ष कलम, तूलिका से लेकर विचारधारा के हथियार के साथ लड़ा जायेगा।

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