शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

आई.ए.एस परीक्षा परिणाम में गोपनीयता ?



देश के अधिकांश मेधावी छात्रों का यह सपना होता है कि वह कड़ी मेहनत और योग्यता के बल पर देश की सर्वोच्च सेवा आईएएस में चयनित हों। इसके लिए वह अपने शहरों सहित इलाहाबाद और दिल्ली में कोचिंग लेते हैं। दिन-रात मेहनत करते हैं। लेकिन जब रिजल्ट आता है तो उन्हें यह भी पता नहीं चलता कि उनकी स्थिति क्या है ? उनके कितने नम्बर है। यह यह भी नहीं जान पाता कि इस परीक्षा में कितने अंक प्राप्त करने वाले सफल हुए हैं। उसके लिए सूचनाधिकार-2005 भी निरर्थक साबित हुआ है। जबकि सूचनाधिकार को एक नयी क्रांति की शुरूआत माना गया। यूपीए सरकार ने इसे अपनी विशेष उपलब्धि मानते हुए इसे चुनावों में भुनाया भी। लेकिन इस अधिनियम की धज्जियां उड़ा रहा है संघ लोक सेवा आयोग। आप इस अधिकार के तहत मंत्री से लेकर राष्टपति भवन तक की जानकारी ले सकते हैं परंतु संघ लोक सेवा आयोग की नही। यह आयोग अपने को सूचनाधिकार से ऊपर मानता है। इसके विरोध में विगत सप्ताह जंतर मंतर दिल्ली पर संघ लोक सेवा आयोग की आईएएस की प्रारंभिक परीक्षा मे असफल रहे हजारों प्रतियोगियों ने प्रदर्शन किया। उनकी मांग की थी कि आयोग इस परीक्षा की उत्तर कुंजी और कट-ऑफ लिस्ट क्यों नहीं जारी करता। जबकि देश के सर्वोच्च शिक्षा संस्थान आईआईएम, आईआईटी, एम्स, परमाणु व अंतरिक्ष आदि परीक्षाओं में शामिल अभ्यर्थियों के लिए आन्सर की यानी उत्तर कुंजी अपनी वेबसाइट पर डालते हैं। अभ्यर्थियों की कट-ऑफ लिस्ट जारी की जाती है। परंतु संघ लोक सेवा आयोग अब भी ब्रिटिश शासन के दौरान जारी गोपनीयता का आवरण ओढ़े हुए है जिसका इन परीक्षाओं की पारदर्शिता और ईमानदारी पर प्रश्न लगना आरंभ हो गया है। इसके विरोध में गत रविवार को सिविल परीक्षा के प्रतियोगियों ने जंतर-मंतर पर केंडल मार्च किया। ट्रांसपेरेंसी सीकर फोर एकाउंटेबिलिटी के बैनर तले निकले इस कैंडल मार्च में परीक्षार्थियों के अंक घोंषित करने तथा प्रारंभिक परीक्षा में पास होने के फार्मूले को उजागर करने की मांग की। उनकी मांग थी प्रारंभिक परीक्षा में जी.एस अर्थात् सामान्य अध्ययन के आधार पर उत्तीर्ण किये गये हैं अथवा विषय विशेष के अंकों के या दोनों विषयों के प्राप्तांकों के आधार पर उत्तीर्ण किये गये हैं। सूचनाधिकार के तहत भी सूचना मांगने पर आयोग कहता है कि वह सूचनाधिकार के दायरे में नहीं है। इस स्थिति को सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए। जब देश की सर्वोच्च सेवा की चयन प्रक्रिया पर सवाल उठना शुरू हो गया तो इन सेवाओं की गरिमा और विश्वास का क्या होगा जिसे लम्बे अरसे से देशवासी स्वीकार करते रहे हैं। इस सचाई की अनदेखी नहीं की जा सकती कि कहीं आयोग के कार्यकलापों में कोई गड़बड़ घोटाला तो नहीं है। जब प्रदेशों के लोक सेवा आयोग भ्रष्ट साबित हो सकते हैं। उनकी नियुक्तियों व चयन को हाईकोर्टों सहित सुप्रीम कोर्ट ने अवैध ठहराया है तो संदेह पैदा होता है कि गोपनीयता की आड़ में कहीं कुछ हो तो नहीं रहा। छात्रों सहित सारे देश को इसका उत्तर मिलना चाहिए कि आखिर आयोग क्यों अपने को देश की सरकार और न्यायपालिका से ऊपर मान रहा है। अगर एक बार देश का इस आयोग से विश्वास हट गया तो उसे कायम करने में बरसों लग जायेंगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें