शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

भ्रष्टाचार की जय बोलता भारत


शीघ्र सेवानिवृत हो रहे केन्द्रीय सर्तकता आयुक्त का यह बयान कि देश में 30 फीसदी लोग भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं। केवल 20 फीसदी लोग ही ईमानदारी से अपना जीवन निर्वाह कर रहे हैं। यह उन्होंने कुछ नया नहीं कहा। रातों-रात जो लोग अमीर हो रहे हैं। देश में अरब-खरबपतियों की जो संख्या बढ़ रही है। वह केवल भ्रष्टाचार के कारण है। अफसोस इस बात का है कि केन्द्रीय सर्तकता आयुक्त का यह बयान कल ही बेमानी हो जाएगा। जब देश की सत्ता, प्रशासन, शिक्षा, चिकित्सा, उद्योग तथा व्यवसाय सभी इस रास्ते पर हैं तो भगवान ही जाने अंजाम क्या होगा।
भ्रष्टाचार केवल रिश्वत ही नहीं है अपितु कालाबाजारी, मुनाफाखोरी, ठगी, दलाली इसके दायरे में आते हैं। नैतिकता और शुचिता के प्रतीक हमारे कथित धार्मिक गुरु भी भ्रष्टाचार करने में पीछे नहीं हैं। कोई दवा बेच रहा है तो कोई बाल काले करने का लोशन। कोई अपनी विद्या के नाम पर सभी बीमारियों को ठीक करने का दावा कर रहा है तो कोई मंच से ही गाली-गलौच कर रहा है। लेकिन इन लोगों में यह समानता है कि सभी अरबपति हैं और विलासी जीवन जीते हैं।
वस्तुतः हमने बच्चों ईमानदार बनाने का प्रयास नहीं किया। उसे इस बात की शिक्षा नहीं दी कि सादा जीवन उच्च विचार ही जीवन का आधार होना चाहिए। वह बच्चों को इंसान नहीं बल्कि धन कमाने की मशीन बना रहे हैं। जब किसी के जीवन का लक्ष्य ही धन कमाना है तो इसमें अच्छा और बुरा कोई मायने नहीं रखता। साफ है हम चाहते तो है भगत सिंह पैदा हो लेकिन पड़ोसी के घर। हमारे घर तो ऐसा कुलदीपक होना चाहिए जो दुनिया भर की दौलत येन-केन-प्रकारेन अपने घर में भर सके। एक सवाल मुझे बराबर कौंधता है कि हमारे जितने भी धर्मस्थल व गुरू हैं। वह भी इस प्रश्न पर मौन साधे हुए है। आखिर मौन क्यों न साधे। लोगों की काली कमाई का एक हिस्सा उनकी तिजोरियों में जो जा रहा है। मुझे आजतक किसी भी धर्म का परमपुरूष ऐसा नहीं मिला जो सीना ठोंक कर कहे कि हमारे पूजा-गृह में केवल ईमानदार लोग ही आएं। यहां दान-पात्र में रिश्वत अथवा कालाबाजारी की कमाई नहीं डालें। सब लोग देख रहे है कि गलत क्या है और सही क्या है लेकिन फिर भी धृतराष्ट् की भांति अपना आचरण कर रहे हैं। यह वास्तविकता है कि समाज में भ्रष्ट ही सम्मानीय और पूज्यनीय है। क्योंकि वही चंदा देता है। अपने भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए मीठा बोलता है। उसकी कोशिश होती है कि वह हर कार्यक्रम में जाये और अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन करें। अखबारों में रोज छपने वाले समाजसेवियों की जन्मप़त्री खंगाली जाये तो कोई गबन में जेल काट चुका होगा तो कोई फर्जी कारखानों के नाम पर सरकारी कोयले को ब्लैक में बेचकर करोड़पति बना हुआ होगा। हां अपवाद के रूप में कुछ लोग हो सकते हैं जो ईमानदारी से समाजसेवा कर रहे हैं लेकिन अखबारों में फोटों और टीवी में चेहरे भ्रष्ट लोगों के ही आयेंगे क्योंकि उनके पास खरीदने की क्षमता है। भ्रष्टाचार की गंगोत्री बहाने में राजनीति का अनन्यतम योगदान है। किसी भी दल का छुटभैये से लेकर बड़ा नेता लाखों-करोड़ों में खेल रहा होगा। एक जमाना था कि आपको लोकसभा सदस्य और विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्रों में पैदल या रिक्शा-तांगों में मिल जाते थे। परंतु धन्य है भ्रष्टाचार की माया कि मामूली पार्षद और ग्राम प्रधान भी चौपहिया वाहनों में चलते हैं।
आज लोगों के ‘रोल मॉडल’ महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, भामाशाह जैसे महामानव नहीं हैं अपितु उनका स्थान बेतहाशा धन कमाने वालों ने ले लिया है। हम स्टील किंगों, मेगास्टारों व पूंजीपतियों, महंगे नाचने-गाने वालों को अपना रोल मॉडल मानते हैं। कोई न तो कुष्ठ रोगियों की सेवा करने वाला बाबा आमटे बनना चाहता है और न ही मदर टेरेसा न ही जलपुरुष राजेन्द्र सिंह और न ही स्वामी अग्निवेश और सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडे ? अतः जब हमारा पैसा कमाना ही जीवन का एकमात्र ध्येय रह गया है तो भ्रष्टाचार के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है जिससे रातों-रात धनी बना जा सके। इसीलिए किसी घर में इस बात पर विवाद नही होता कि इस घर में हराम की कमाई यानी रिश्वत नही आनी चाहिए। हम काली कमाई खाने की अपेक्षा भूखा मर जाना पंसद करेंगे। याद रखिए कि हमारा वर्तमान ही हमारे भविष्य का निर्माण करता है। जो हमने बोया हैं उसे उसे ही काट रहे हैं।

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