रविवार, 5 दिसंबर 2010

भारतीय अमीरों में सेवा भावना का अभाव

बहुचर्चित उपन्यास ‘सिटी ऑफ जॉय‘ के फ्रांसीसी लेखक डोमिनिक लेपियर ने भारतीय अमीरों को सही आइना दिखाया है कि उनमें गरीबों के प्रति मानवीय संवेदना का अभाव है। वह उनके मददगार नहीं होते। उनके इस कथन को एकदम खारिज नहीं किया जा सकता। देश में अरब और खरबपतियों की संख्या बढ़ रही है लेकिन उनका सामाजिक सरोकारों से कोई रिश्ता नहीं है। वह गरीब और मरीजों के प्रति सहिष्णु नहीं है। यह भारतीय परम्परा और संस्कृति के विरुद्ध है। देश में हजारों धर्मशालाएं, बावड़ी, कुंए, स्कूल और कालेज हमारे देश के अमीरों ने ही बनाये हैं। देश का शायद ही कोई ऐसा शहर होगा। जहां उन्होंने अपने समाजोपयोगी कार्यों को अंजाम नहीं दिया हो। पहले बड़ा आदमी बड़े काम करने वाले को ही माना जाता था। लेकिन आज सब कुछ बदल गया है। यही कारण है कि अधिकांश धनकुबेर अपनी पत्नी को उसके जन्मदिवस पर जेट विमान भेंट करते है तो कोई बहुमंजिला आलीशान इमारत। वस्तुतः भौतिक जीवन में आकंठ डूबे अमीरों का नजरिया ही बदल गया है। उनका धन उनके ऐशो-आराम में या अपने ओद्यौगिक साम्राज्य को विस्तार करने में अधिक खर्च होता है। देश में टाटा और इन्फोसिस के नारायणमूर्ति जैसे कुछ ही धनकुबेर हैं जो अपने सामाजिक दायित्वों को अपने अस्पतालों व अन्य प्रतिष्ठानों के माध्यम से पूरा कर रहे हैं।

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