शनिवार, 18 दिसंबर 2010

राज्यसभा की प्रासंगिकता

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्यसभा को समाप्त करने की मांग करके एक नई बहस छेड़ दी है। इससे पहले भी इस सदन की प्रासंगिकता पर अक्सर सवाल उठाये जाते रहे हैं। इस मांग से हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के औचित्य और उपादेयता पर प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। हमारी संसदीय प्रणाली दो सदनीय है। ब्रिटेन में भी हाउस ऑफ कॉमंस तथा हाउस ऑफ लार्डस तथा अमेरिका में भी कांग्रेस तथा सीनेट आदि दो सदनीय व्यवस्था है। राज्यसभा अर्थात् उच्च सदन का सभापतित्व उपराष्ट्रपति करते हैं। इस सदन का बनाने का उद्देश्य हमारे संविधान निर्माताओं के अनुसार संसद की बहस की तार्किकता और सूक्ष्म विश्लेषण के लिए था जिससे विधेयकों पर सारगर्भित बहस हो। लेकिन अमेरिकी सीनेट की ताकत राज्यसभा से अधिक है। उसके सदस्यों का चुनाव सीधे जनता द्वारा किया जाता है जबकि राज्यसभा में 238 सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। 12 उन सदस्यों को राष्ट्रपति मनोनीत करता है जो विज्ञान, साहित्य, कला और सामाजिक क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभाते हैं। यह स्थायी सदन है जो कभी विघटित नहीं होता और इसके एक तिहाई सदस्य हर दो वर्ष बाद पद से निवृत होते हैं। ब्रिटेन के हाउस ऑफ लार्डस की सदस्यता जीवनपर्यन्त होती है जबकि राज्यसभा में सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। और वह देश का सर्वोच्च न्यायालय भी होता है। वस्तुतः राज्यसभा को कोई विशेषाधिकार नहीं होते। इस सदन में अगर सरकार अल्पमत में आ जाये तो भी उसकी सेहत पर फर्क नहीं पड़ता। वित्त विधेयक के बारे में इसकी स्थिति अत्यंत कमजोर है। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह राजनीति के पिटे हुए मोहरों का केन्द्र बन गया है। लगभग हर दल लोकसभा चुनाव में हारे हुए अपने बड़े नेताओं को राज्यसभा में एडजस्ट करता है। वर्तमान राज्यसभा में ऐसे अधिकांश सदस्य हैं जिन्हें लोकसभा के चुनाव में मुुंह की खानी पड़ी थी। इसके अतिरिक्त बहुंत से राजनेता ऐसे भी हैं जो अपनी जुगाड़ और जोड़तोड़ करके इस सदन में प्रवेश कर जाते हैं। कला, समाजसेवा, साहित्य और विज्ञान के नाम पर सरकार राष्ट्रपति से उन्हीं को मनोनीत कराती है जो उसकी विचारधारा के हों। अब समय आ गया है कि इस मुद्दे पर गहन मंथन हो तथा वर्तमान परिवेश में इसकी आवश्यकता क्यों हैं, पर सार्थक देशव्यापी बहस छेड़ी जानी चाहिए।

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