बुधवार, 15 दिसंबर 2010

सरकारी और निजी सम्पत्ति की तोड़फोड पर अंकुश

हमारी राजनीति इतने छिछले स्तर पर उतर आई कि अपनी मांगों के समर्थन में धरना, प्रदर्शन के दौरान सरकारी और निजी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने में अपने को गौरवान्वित महसूस करती है। वास्तविकता यह है कि जबसे हमारे हमारे राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का खात्मा हुआ है। राजनैतिक दर्शन और विचारधारा को तिलांजलि दे दी गई है। यही कारण है कि उनके विरोध का तरीका भी बदल गया है। सरकारी वाहनों को जलाना आम बात हो गई है। अपने धरने या प्रदर्शन के दौरान राजनैतिक दलों के कार्यकर्ता उद्दंड हमलावरों में बदल जाते हैं और वहशियों की भांति अपनी हरकतों पर उतर आते हैं। वह उसी धरने और प्रदर्शन को सफल मानते हैं जिसमें निजी और सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया हो। अब इलाहाबाद हाईकोर्ट उत्तर प्रदेश के गृह सचिव को दिये अपने निर्देश में स्पष्ट कर दिया है कि तोड़फोड़ करने वालों को चिन्हित कर उनसे प्रदर्शन और धरने के दौरान हुए नुकसान की भरपाई की जायेगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल ने अपने निर्देश में प्रदेश सरकार को कहा है कि वह राजनैतिक दलों के धरने व प्रदर्शन के दौरान हुए नुकसान की भरपाई नेताओं और उनके समर्थकों से करे। इस ऐतिहासिक निर्देश से प्रदेश की जनता ने राहत की सांस ली है जो आये दिन राजनैतिक दलों के प्रदर्शनों से नुकसान का शिकार होती है। इस निर्देश से राजनैतिक नेता और कार्यकर्ता लक्ष्मण रेखा का उल्लघंन करने से कतरायेंगे क्योंकि उन्हें पता है कि हर नुकसान की भरपाई उनसे की जायेगी। न्यायमूर्ति का यह निर्देश तो सही है लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि हमारा पुलिस प्रशासन ईमानदारी से अपने कार्य को अंजाम देगा। आम नागरिक इस सच्चाई से वाफिक है कि हमारी पुलिस और प्रशासन आये दिन न्यायपालिका के निर्देशों की अनदेखी करता है। कोर्ट के इस निर्देश की आड़ में निरपराध लोगों का सताना शुरू हो जायेगा। वस्तुतः इस निर्देश से पुलिस प्रशासन निरंकुश हो जायेगा। तोड़फोड़ के आरोप में वह ऐसे लोगों को भी चिन्हित कर सकता है जिनका इन घटनाओं से दूर-दूर का वास्ता नहीं होगा।
उच्च न्यायालय के इस निर्देश से निश्चित रूप से उन राजनेताओं के तेवर ढीले होंगे जो अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए तोड़फोड़ का सहारा लेते हैं। अब राजनेताओं को कोई भी धरना अथवा प्रदर्शन करने से पहले सोचना होगा कि उनके समर्थकों में कोई अराजक तत्व तो नहीं है। इससे राजनीतिक दलों में शांति और सद्भाव में आस्था रखने वाले कार्यकर्ताओं की पूछ बढ़ेगी। हो सकता है कि हाईकोर्ट के इस निर्देश से हमारी दिशाविहीन राजनीति पर लगाम लगेगी।
इस निर्देश के आलोक में सवाल यह उठता है कि आखिर धरने और प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़ की प्रेरणा आखिर राजनैतिक कार्यकर्ताओं को किससे मिलती है ? उत्तर साफ है कि यह प्रेरणा उन्हें सांसदों और विधायकों से मिलती है जो सदन में माइक आदि तोड़ते हैं। सरकारी कागजातों की चिंदी-चिंदी करके उन्हें पतंग की तरह सदन में उड़ाते हैं। हमारी माननीय सांसदों और विधायकों को अपने आचरण में परिवर्तन करना होगा। बड़े नेताओं से ही कार्यकर्ता सीखते हैं। अतः उन्हें सयंम का परिचय देना चाहिए।
न्यायालय के इस निर्देश के परिप्रेक्ष्य में मीडिया की जिम्मेदारी निश्चित रूप से बढ़ेंगी। प्रदर्शन और धरना के दौरान सरकारी और निजी सम्पत्तियों को जो तत्व नुकसान पहुुचाते हैं। उन्हें चिन्हित करने में प्रशासनिक अधिकारी बिना मीडिया के सहयोग के अंजाम तक नहीं पहुुंच सकते। अतः मीडिया विशेषकर इलैक्टॉनिक मीडिया की जिम्मेदारी अधिक बढ़ेगी। इस जिम्मेदारी को मीडिया को बखूबी निभाना चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती में उसकी सक्रिय सहभागिता से इंकार नहीं किया जा सकता।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें