शनिवार, 15 मई 2010

जाति आधारित जनगणना-क्या होंगे परिणाम

भारत की सामाजिक संरचना ऐसी है कि इसमें बिना जाति के रहना असंभव सा है। आदमी की पहचान ही जाति से होती है। पानी पिलाने से पहले अमुक व्यक्ति की जाति पूछी जाती है। हमारे गांव व शहर भी जातियों में बंटे हुए हैं। हर गांव में जाति विशेष की प्रचुरता होती है। कुछ गांव जाति विशेष के होते हैं। इसी प्रकार शहरों की पुरानी बस्तियां व मोहल्ले जाति आधारित हैं। अतः सरकार ने विपक्ष विशेष रूप से मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव तथा शरद यादव के कड़े प्रतिरोध के कारण जाति-आधारित जनगणना करने के आदेश जारी किए हैं। इससे पहले 1931 में जाति के आधार पर जनगणना हुई थी। उसी को आधार बनाकर हर जाति राजनीति व आरक्षण में अपनी दावेदारी प्रस्तुत करती रहीं है। अब सवाल यह है कि जनगणना प्रपत्र में ओबीसी का कॉलम बढ़ने से क्या जातिवाद मजबूत होगा अथवा इस संदर्भ में धारणाएं निराधार साबित होंगी।
जब जाति एक सच्चाई है तो फिर जाति के आधार पर जनगणना करने में बुराई क्या है ? अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों की गणना तो पहले से होती आ रही है। इस बार जनगणना में केवल अन्य पिछड़े वर्ग यानी ओबीसी की भी जनगणना होगी।
जब दो वर्ष पूर्व उच्च शिक्षा में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण वैध ठहराते हुए भी सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी के अधिकृत डाटा पर जोर दिया था। अभी सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण को वैध ठहराते हुए इनकी सही संख्या पता लगाने को रेखांकित किया है। यह काम जनगणना से ही संभव है। वस्तुतः ओबीसी जाति आधारित जनगणना से सुप्रीम कोर्ट की मंशा भी पूरी होगी। इस वर्ग का सही आंकड़ा सामने आयेगा।
हमेशा से जाति आधारित जनगणना होती आई है। 1931 तक देश में ओबीसी के आरक्षण का मसला ही नहीं था। केवल दलितों को ही आरक्षण की व्यवस्था थी। उसी परम्परा के अनुसार जनगणना का काम चल रहा था। अब तक सामान्य और अनुसूचित, अनुसूचित जनजाति के आधार पर जनगणना होती थी। अब इसमें ओबीसी की भी पृथक जनगणना होगी। इससे कहां जातिवाद फैलेगा ? हम भले ही कहें कि देश में शिक्षा के प्रसार के साथ जातिवाद समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। ऐसे लोग दिवास्वप्नों में जी रहे हैं। वास्तव में जातिवाद आजादी के बाद बड़ी तेजी से बढ़ा है। सारे देश में जाति-आधारित संगठनों की बाढ़ आ गई है। वैसे भी आज के आधुनिक भारत में व्यक्ति की पहचान जाति से होती है। ओबीसी के आधार पर जनगणना से कोई जातिवाद नहीं फैलेगा। यह तो पहले ही फैला हुआ है।

1 टिप्पणी:

  1. आपके इस तर्क को काटा ही नहीं जा सकता कि भारत में व्यक्ति की पहचान जाति से ही होती है । मान लीजिए आप उच्च जाति से आते हैं तो भी क्या आपको यह जान कर हर्ष नहीं होगा कि हम भी इस देश में इतने तो हैं हीं । अब तक एक अपराध बोध-सा होता था कि हम उच्च जाति से क्यों हैं... ठीक है अब आप लालू-मुलायम के खेमे में रहिये और जितना हो सके आरक्षण ले लीजिए । हमें नहीं चाहिए सरकारी चाकरी का तोहफा । संसद में भी जाति के आधार पर सीटें हो जाएं तो और भी अच्छा । वोट केवल अपनी जाति के प्रत्याशी को ही देना होगा । जाति मिटाने के नाम पर सवर्णों को कोसने वाले अब जब जातियाँ टूटने लगीं तो इतने घबरा गए हैं देख कर अच्छा लगता है । मनु को कोसने वाले अब मनु स्मृति को इस देश का आधार मूलाधार बता रहे हैं......वाह रे प्रजातंत्र....और हाँ स्त्री की तो कोई जातो होती ही नहीं.....उस कॉलम को हटवा ही दीजिए ....

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