शुक्रवार, 28 मई 2010

आम आदमी से दूर मनमोहन

केन्द्र की यूपीए सरकार ने अपना एक वर्ष पूरा कर लिया है। लेकिन जिस आम आदमी का नारा देकर यह सरकार आई थी। वह आम आदमी कहां है ? कहां है उसके सपने ? कौन सोच रहा है उसकी बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए ? वैसे मनमोहन सिंह ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल के छह वर्ष पूरे कर लिये हैं। स्वच्छ छवि का होने के बावजूद उनकी सरकार की छवि जनता में अच्छी नहीं है यानी कैप्टन तो बढ़िया है लेकिन खिलाड़ी घटिया हैं। इस सरकार मंहगाई रोकने के लिए अभी तक कोई भी कारगर कदम नहीं उठाया। मंहगाई बढ़ाने में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई संकेतात्मक कार्रवाई भी नहीं की। महिला आरक्षण कानून जो इस सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता सूची में शामिल था। उसे भी वह लोकसभा में पेश करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। नक्सलवाद सीना ताने सरकार के अस्तित्व को चुनौती दे रहा है। पाक भी अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। प्रशासन में भ्रष्टाचार का बोलवाला है। सरकार की महत्वपूर्ण योजना मनरेगा भी जमीन पर कम कागजों पर अधिक दिखाई दे रही है। अगर सरकार की यही कार्यदिशा रही तो क्या वह भविष्य में स्पष्ट बहुमत वाली सरकार बना सकेगी। राजनीति में स्वच्छता का नारा भी बेमानी लगता है। खेल भी अब भ्रष्टाचार में गरदन तक धस चुके हैं। अब क्या उम्मीदें हैं सरकार से।

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