शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

सिसकता बनाम चमकता भारत

आज भारत वस्तुतः दो भागों में अंट गया है। एक ओर तो चमकता भारत है, जहां ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं हैं। मंहगी गाड़ियां हैं। फाइव स्टार होटल में डिनर और लंच है। अनाप-शनाप बैंक बैलेंस है। दूसरी ओर सिसकता भारत है। जहां भूख है, गरीबी है, लाचारी है, शोष है। उसका एक मात्र सपना दो जून की रोटी है। वहां शिक्षा और चिकित्सा उनके लिए विलासिता है। निरंतर बढ़ती मंहगाई ने उसका जीना दूभर कर दिया है। अभी विगत दिनों हुई पेट्रोल , डीजल और एलपीजी की मूल्य वृद्धि ने उसकी कमर तोड़ दी है। अब प्रधानमंत्री का यह बयान भी महंगाई बढ़ाने वाला है कि डीजल को भी मुक्त बाजार पर छोड़ दिया जायेगा। डीजल की कीमत निर्धारण में सरकारी नियंत्रण समाप्त हो जायेगा। यानी गरीब और मध्यम वर्ग को बाजार के सहारे छोड़ दिया गया है। जहां तक बाजार का प्रश्न है, उसकी प्राथमिकता अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की रहती है। जन सरोकारों से उसका कोई मतलब नहीं। अतः सरकार के इस कदम से बेतहाशा महंगाई बढ़ेगी। गरीब की रोटी मुश्किल में पड़ेगी और हमारी कथित लोकप्रिय सरकार टुकुर-टुकुर देखती रहेगी। यह सरकार को ज्ञात होना चाहिए कि पेट्रो उत्पाद की कीमतों का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। भाड़ा महंगा होगा, रखरखाव महंगा होगा, लेकिन उस अनुपात में लोगों की आमदनी नहीं बढ़ेगी। क्या यही हमारा कल्याणकारी राज्य है? क्या इससे गरीबी-अमीरी की खाई और चौड़ी नहीं है। बाजार बेलगाम होता जा रहा है। मुनाफाखोरी का प्रतिशत बढ़ रहा है। अगर सरकार आम लोगों की उपेक्षा करेगी तो उसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं। उन्हें याद रख्ना चाहिए कि जब भूखा आदमी बगावत पर उतर आता है तो बड़े से बड़े साम्राज्य और सल्तनत धराशायी हो जाते हैं। इस सदंर्भ में कभी मैंने लिखा है -
अब सत्ता के द्वारे दस्तक नहीं बजेगी
कदम-कदम पर अब क्रांन्ति की तेग चलेगी
निर्धन के आंसू अगर अंगार बन गए
महलों की खुशियां भी उसके साथ जलेंगी।
वस्तुत चमकते भारत का अस्तित्व तभी रह सकता है जब सिसकते भारत में खुशहाली आए। सत्ताधीशों को इस ओर गंभीर चिंतन करना होगा।

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