रविवार, 22 अगस्त 2010

अन्नदाता पर गोलिया: किसानों पर अत्याचार क्यों

एक ओर तो हम किसान को अन्नदेवता कहते नहीं थकते। वहीं दूसरी ओर किसान को समाप्त करने का कुचक्र जारी है। विभिन्न सरकारी अथवा गैरसरकारी योजनाओं के लिए किसानों की भूमि का जबरन अधिग्रहण किया जा रहा है। जब किसान इस अधिग्रहण का विरोध अथवा उचित मुआवजे की मांग करता है तो उसे गोलियों से भून दिया जाता है। सरकार किसनों के लिए घड़ियाली आंसू बहाती है। कई योजनाएं भी चालू करती है। लेकिन उसे न तो राहत मिली है और न ही उसके जीवन में खुशहाली आई है। सारे देश में अघोषित रूप से षड़यंत्र जारी है कि किसान से उसकी जमीन छीन लो और उसे दर-दर का भिखारी बना दो। जब खेती नहीं रहेंगी तो किसान भी नहीं रहेगा। फिर बहुराष्टीय कंपनियां यहां मनमानी कीमतों पर खाद्यान्न बेचेंगी और देश भुखमरी की दिशा में अग्रसर होगा। आखिर सरकार 1894 में ब्रिटिश काल में बने भूमि अधिग्रहण अधिनियम में किसान व देश हित में उचित संशोधन क्यों नही करती ? विगत वर्ष जब सरकार की अधिग्रहण नीति के खिलाफ बंगाल के सिंगूर में किसान जब सड़क पर आ गया तो सरकार को झुकना पड़ा। किसानों को बंगाल के किसानों के संघर्ष से प्रेरणा लेनी चाहिए।

अधिग्रहण और बिक्री पर लगे रोक
जिस तेजी से देश में औद्योगीकरण बढ़ रहा है। यातायात के लिए सड़के बन रहीं है। इस तथाकथित विकास की बलिवेदी पर देश की बहुमूल्य सिंचित कृषि भूमि भेंट चढ़ रही है। आज तेजी से खेती का रकबा कम होता जा रहा है। इस ओर न किसान का ध्यान है और न सरकार का। उपजाऊ कृषि भूमि के अधिग्रहण और बिक्री पर रोक लगनी चाहिए। अगर इसी तरह कृषि भूमि का अधिग्रहण और बिक्रय जारी रहा तो देश अन्न के दाने-दाने के लिए तरस जायेगा।

खेतिहर मजदूरों की अनदेखी
सरकार जब किसी कृषि भूमि का अधिग्रहण करती है तो किसान को उसका मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देती है। लेकिन इस अधिनियम में खेती पर सदियों से आश्रित खेतिहर मजदूरों के पुर्नवास की कोई व्यवस्था नहीं है। खेती की जमीन का अधिग्रहण हो तो खेतिहर मजदूरों को भी पर्याप्त मुआवजा मिलना चाहिए। अधिग्रहण की सबसे भयानक मार तो खेतिहर मजदूर पर पड़ती है। उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। किसान को तो मुआवजा मिल जायेगा लेकिन खेतिहर मजदूर भुखमरी का शिकार होगा।

एलीट वर्ग के लिए किसानों पर कहर
किसानों की भूमि पर सरकारी जबरिया कब्जा न देश के विकास के लिए हो रहा है और न ही किसानों के परिवारों के लिए। देश के एलीट वर्ग के लिए किसानों पर कहर ढाया जा रहा है। देश के आम आदमी को न सिक्स लेन सड़क की जरूरत है और न ही हाईटेक सिटी की। यह चौड़ी सड़के अमीरों की कीमती कारों तथा टाउनशिप करोड़पतियों के लिए बनाये जा रहे हैं। सरकार के इस कदम से किसान दर दर का भिखारी हो जायेगा।

बंजर और अनुपजाऊ भूमि पर निर्माण
जब देश में लाखों एकड़ जमीन बंजर और अनुपजाऊ है। फिर सरकार की निगाहें सोना उगलती उपजाऊ कृषि भूमि पर क्यों है ? क्या बंजर जमीन पर सड़क और अन्य निर्माण कार्य नहीं हो सकते। वैसे भी देश में अन्न का संकट है। कम पैदावार के कारण गरीब आदमी कराह रहा है। किसी भी कीमत पर सिंचित कृषि भूमि का अधिग्रहण नहीं होना चाहिए। सरकार और निजी क्षेत्र को अपनी परियोजनाएं बंजर क्षेत्रों में आरंभ करनी चाहिए। इससे औद्योगीकरण की रफतार बढ़ेगी और कृषि भूमि सुरक्षित रहेगी।

किसानों की पीढ़िया बर्वाद होंगी
एक किसान अपनी विरासत में अगली पीढ़ियों को केवल खेती का टुकड़ा दे जाता है। यही खेती का टुकड़ा परिवार के भरण पोषण का माध्यम बनता है। अगर यही टुकड़ा उससे छिन जाये तो उसकी भावी पीढ़िया भूखमरी से रूबरू होंगी। ही किसान के जीवन का एकमात्र आसरा होता है। अगर वही उससे छिन जायेगा तो वह बिना आत्मा के शरीर जैसा प्रतीत होगा। हमें ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जिसमें खेती भी न उजड़े और देश का विकास हो।




1 टिप्पणी:

  1. यह एक क्रूर सत्य है। यह रचना किसानों की विभिन्न समस्याओं के विभिन्न पक्षों पर गंभीरती से विचार करते हुए कहीं न कहीं यह आभास भी कराती है कि स्थिति बद से बदतर हो रही है।

    उत्तर देंहटाएं