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शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

आगरा में संपन्न ब्लोगर्स मीट के फोटोग्राफ्स






हिंदी जगत के प्रमुख ब्लोगर दिल्‍ली निवासी अविनाश वाचस्पति के सम्मान में आगरा में २५ अगस्त को ब्लोगर्स मीट श्याम होटल स्थित अनु शर्मा के संसथान पर संपन्न हुई। इस गोष्ठी में बात-बेबात के ब्लोगर डाक्टर सुभाष राय, व्यंगम शरणम्.......के डाक्टर राकेश शरद, विचार-विगुल के डाक्टर महाराज सिंह परिहार, गहराइयाँ के डाक्टर त्रिमोहन तरल, महामिलन के डाक्टर राजेंद्र मिलन, मदन मोहन शर्मा (अरविन्द), संजीव गौतम, कमल आशिक, अनु शर्मा, अरविन्द समीर,डाक्टर केशव शर्मा आदि मौजूद थे। इस अवसर पर ब्लॉग चर्चा सहित काव्य पाठ हुआ।
इसी गोष्ठी की चित्रावली का अवलोकन करें।

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

छत की टीन पुरानी उसको तड् तड् नहीं बजाओ................. आगरा में हुआ ब्‍लॉगर्स मिलन




बरसात का मौसम और ब्‍लॉगरों की म‍हफिल। अजीब संयोग था। इस पर भी कविता की भीनी-भीनी फुहार। मन मयूरा नाच उठा। एक घंटे का कार्यक्रम कब तीन घंटे तक चलता रह़ा पता ही नहीं चला। दरअसल बात यह थी कि हमारे दिल के ब्लोगर भाई अविनाश वाचस्‍पति अपनी आगरा स्थित ससुराल सनूने यानी रक्षाबंधन पर बूरा खाने आये। इसी दिन डीएलए कार्यालय में उनसे मुलाकात हो गई। उसी दौरान डा। सुभाष राय से सलाह-मशविरे के दौरान यह राय बनी कि पच्चीस अगस्‍त को कहीं ब्लॉगरों की बैठक हो। स्थान लगभग तय हुआ सेंट जौंस क्रासिंग से आगे, लोहामंडी रोड पर श्याम होटल के भूतल स्थिति अनु शर्मा की अंग्रेजी सीखने संस्‍थान पर।


जैसे ही मैं कार्यक्रम स्थल पर पहुंचा। वहां डा; सुभाष राय, अविनाश वाचस्पति, मदन मोहन शर्मा *अरविंद* सहित शहर के चर्चित साहित्यकार डा. राजेन्द्र मिलन पहले से ही मौजूद थे। उसके बाद में ब्‍लॉगर व कवियों का आना आरंभ हुआ। व्यंग्याचार्य डा. राकेश शरद की कुछ ब्लॉग सम्बंधी जिज्ञासाओं के निवारण के लिए अविनाश जी ने कुछ टिप्स दिए। फिर इसके बाद शुरू हुआ कविताओं का दौर। इस अनौपचारिक व अध्यक्ष विहीन कवि गोष्ठी का शुभारंभ मदन मोहन अरविंद के भीगे आंचल में सिमटी सी बदली घर-घर घूम रही है, इकलौते चिराग की टिमटिम मौसम का रूख भांप रही थी, प्रस्तुत किया। गीत से हुआ। संजीव गौतम ने 'सोने चांदी सी कभी तांबे जैसी धूप........ तथा अविनाश जी ने लौकी पुराण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी। पुष्पेन्द्र शर्मा ने जीवन को परिभाषित किया-जिंदगी तलाश है किसी गुमशुदा की....। डा. केशव शर्मा ने ब्रज का लोकगीत तथा अनु शर्मा ने अपने मन की बात कही। डा. राजेन्द्र मिलन ने संचार क्रांति पर प्रहार करते कहा-मेरे भारत देश का अजब हुआ है हाल॥बातें तो सस्‍ती हुईं महंगी रोटी दाल तथा कमल आशिक 'करवटें बदलता रहा मैं रात भर - जाने क्‍यूं तड्फता रहा रात भर एवं डा. महाराज सिंह परिहार ने 'मौन निमंत्रण की बातें मत आज करो......व अरविंद समीर ने 'बुझादो शौक से मुझको...पेश किया। गोष्ठी को शिखर पर पहुंचाया अपने तीखे तेवरों से डा। त्रिमोहन तरल ने - छत पर टीन पुरानी उसको तड. तड. नहीं बजाओ, बरखा हौले हौले आओ.... तथा डा. सुभाष राय ने ' लोग जीने की रिहर्सल कर रहे हैं, एक नाटक है जहां मुर्दे भी चल रहे हैं प्रस्तुत किया।