सावन का मस्त महीना, रिमझिम पड़ती फुहार मन को तरंगित और आल्हादित कर देता है! लेकिन यह बेदर्दी बरसात नायिका की विरह को नहीं समझ पाती! आइए पढि़ये मेरा सावन गीत-
धीरे धीरे बरसियों बदरवा रे।
भीगे भीगे रे मोरों अचरवा रे।।
संग सखिन बागन में जाऊं
तौऊ मन में मै अकुलाऊं
फूल गुलाब देखि इतरावै
संग भंवरन वो रास रचावै
मेरे प्यासे से रहि गये अधरवा रे
धीरे धीरे बरसियों बदरवा रे।
रैन दिना मोहे चैन न आवै
जियरा मेरौ पिउ पिउ गावै
छोटौ दिवरा ऊ इठलावै
रंग रास मोहे कछु न भावै
मेरौ धक धक करत करेजवा रे
धीरे धीरे बरसियो बदरवा रे
चूनर धानी पहिरै माटी
करी रतियां जांय न काटी
बैरिन कोयलिया बौरावै
और पानी में अगन लगावै
आज बेदर्दी है गयौ जमनवा रे
धीरे धीरे बरसियो बदरवा रे
ननद जिठानी बोली मारै
पिया तेरौ कहूं नैन लड़ावै
मोहे यापै सांच न आवै
प्यारे बलमा चौ तडफावै
मेरौ काबू में नाहें जोवना रे
धीरे धीरे बरसियो बदरवा रे
वर्तमान समय मूल्यों के पतन का है। ऐसे समय में रचनाकारों का दायित्व बन जाता है कि वे अपने युगधर्म का निर्वाह करें। यह ब्लॉग रचनाधर्मिता को समर्पित है। मेरा मानना है- युग बदलेगा आज युवा ही भारत देश महान का। कालचक्र की इस यात्रा में आज समय बलिदान का।
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रविवार, 7 अगस्त 2011
रविवार, 5 जून 2011
मंगलवार, 6 जुलाई 2010
डा.महाराज सिंह परिहार के दो गीत

मेरा भारत सिसक रहा है
मौन निमंत्रण की बातें मत आज करो
अंधकार में मेरा भारत सिसक रहा है
सदियों से जो सतपथ का अनुगामी था
सत्य अहिंसा प्रेम सरलता का स्वामी था
आज हुआ क्यों शोर देश के चप्पे चप्पे
वनवासी का धैर्य आज क्यों दहक रहा है
प्रख्यात साहित्यकार काशीनाथ सिंह के साथ महाराजसिंह परिहार
होता सपनों का खून यहां लज्जा लुटती चौराहे पर
द्रोणाचार्य की कुटिल सीख से खड़ा एकलब्य दोराहे पर
महलों की जलती आंखों से कुटियाएं जल राख हुईं
और सुरा के साथ देश का यौवन चहक रहा है
यहां सूर्य की किरणें बंद हैं अलमारी में
यहां नित्य मिटतीं हैं कलिया बीमारी में
ज्हां वृक्ष भी तन पर अगणित घाव लिए हों
उसी धरा में शूल मस्त हो महक रहा है
नेह निमंत्रण की बातें स्वीकार मुझे
मस्ती राग फाग की भी अंगीकार मुझे
पर कैसे झुठलादूं मैं गीता की वाणी को
कुरुक्षेत्र में आज पार्थ भी धधक रहा है
मेरे भारत का पार्थ
कौन हमारे नंदनवन में बीज जहर के बोता है
अफसोस मेरे भारत का पार्थ अभी तक सोता है
आज चंद्र की शीतलता आक्रांत हुई है।
किरणें रवि की भी अब शांत हुई है
मौन हवाएं भी मृत्यु को आमंत्रण देती
पाषाणी दीवारे भी अब नहीं नियंत्रण करती
शब्दकार भी आज अर्थ में खोता है
अफसोस मेरे भारत का पार्थ अभी तक सोता है
हम भूल गये सांगा के अस्सी घावों को
भुला दिया हमने अपने पौरुष भावों को
दिनकर की हुंकार विलुप्त हुई अम्बर में
सीता लज्जित आज खड़ी है स्वयंवर में
राम-कृष्ण की कर्मभूमि में क्रन्दन होता है
अफसोस मेरे भारत का पार्थ अभी तक सोता है
बौनी हो गई परम्परायें आज धरा की
लुप्त हो गयीं मर्यादाएं आज धरा की
मौन हो गयी जहां प्रेम की भी शहनाई
बेवशता को देख वेदना भी मुस्काई
रोटी को मोहताज वही जिसने खेतों को जोता है
अफसोस मेरे भारत का पार्थ अभी तक सोता है
अब सत्ता के द्वारे दस्तक नहीं बजेगी
कदम-कदम पर अब क्रांति की तेग चलेगी
निर्धन के आंसू अगर अंगार बन गये
महलों की खुशियां भी उसके साथ जलेगी
देख दशा त्रिपुरारी का नृत्य तांडव होता है
अफसोस मेरे भारत का पार्थ अभी तक सोता है
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