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बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

आगरा की रामलीला में किराये का रावण


रामलीला की 147 वर्ष की शानदार परम्परा टूटी दशहरा पर किराये का रावण मरेगा लोकनाट्य रामलीला से लोकजन गायब रामलीला कमेटी का जातिवादी चेहरा बेनकाब
आगरा। उत्तर भारत की प्रमुख रामलीला के लिए आज का दिन शर्मनाक होगा जब रामलीला कमेटी की विवेकशून्यता और जातिवादी मानसिकता के कारण दशहरा पर किराये का रावण मर्यादा पुरुषोत्तम राम के बाणों से धराशायी होगा। 147 साल से लगातार आगरा का कुशवाहा परिवार जो रामलीला में रावण परिवार का अभिनय करता था। वह नदारद रहेगा।
कभी इस शहर में रामलीला की धूम रहती थी। इसे एक लोकपर्व के रूप में नगर ही नहीं अपितु जिले के लोग मनाते थे। रामलीला के तहत राम बरात को देखने के लिए शहर में आस-पास के जिलों के लोग भी मेहमान के रूप में आते थे और पूरी रात राम बरात का आनंद लेते थे। लेकिन बदलते परिवेश ने रामलीला के परम्परागत स्वरूप को नष्ट
कर दिया है। कभी इस लोकनाट्य में लोक की भागीदारी होती थी लेकिन वह अब समाप्त हो गई है। अब यह विशुद्ध राजनैतिक अखाड़े में तबदील हो गई है।
वह जमाना याद आता है कि जब आगरा के बच्चे ही रामलीला के विभिन्न पा़त्रों के रूप में अभिनय करते थे। जिस मोहल्ले के बच्चे राम, लक्ष्मण, सीता, भरत या श़त्रुघ्न बनते थे। वहां के लोगों में उत्साह का समंदर ठाठ मारता था। एक गर्व और स्वाभिमान की अनुभूति होती थी। पूरा मोहल्ला बिना किसी धर्म जाति के भेदभाव के रामलीला देखने जाता था और अपने आप-पास के बच्चों को जब वह अभिनय और मंचन करते देखता तो यकायक ही उनके मुंह से निकल जाता था ‘‘सियावर रामचंद्र की जय‘।
लेकिन अब नजारा बदल गया है। विगत 147 वर्षों से रामलीला में रावण दल का अभिनय करने वाले लोग मंच से नदारद हो गये हैं। पूरे शहर की रामलीला मुट्ठी भर लोगों की गिरफ़त में आ गई है। अब रामलीला में मा़त्र औपचारिकताएं ही पूरी हो रहीं हैं। उसे देखने वालो जनसैलाब गायब हो गया है। मंच के आस-पास रामलीला कमेटी से जुड़े लोग व उनके परिजन ही मंडराते दिखाई देते हैं। उसमें शहर की आम जनता की भागीदारी समाप्त हो गई है।
यह आगरा का दुर्भाग्य रहा कि यहां की लगभग सभी लोककलाएं व्यापारियों ने अपने कब्जे में कर लीं। यहां की जीवंत कला भगत के साथ भी यह हुआ। वह दूसरी बात है कि रंगलीला के माध्यम से इसे पुनर्जीवित करने का प्रयास जारी है। यह कलाकारों की नगरी आगरा के लिए दुर्भाग्य और शर्म की बात है कि इसमें मंचन करने वाले कलाकार पेशेवर हैं और उन्हें लगभग छह लाख रुपये देकर बुलाया गया है। रावण की भूमिका अदा करने वाले वीरेन्द्र कुमार उर्फ राजू को रामलीला कमेटी की हठधर्मिता और जातिवादी मनोवृत्ति के कारण अलग होना पड़ा। इस आलेख का लेखक इस बात का साक्षी है कि विगत कई वर्षों से रावण दल का अपमान रामलीला कमेटी कर रही है। वह नजारा कितना शर्मनाक लगता था जब दिग्विजयी रावण जल संस्थान के टेंकर से अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी पीते थे और उधर किराये के कलाकारों को ससम्मान मिनरल वाटर की बोतलें उपलब्ध करायीं जाती हैं।
वर्तमान संदर्भ में रामलीला और जनकपुरी कमेटी के टकराव को देखते हुए लगता है कि इस लोकनाट्य पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। वैसे एक बात की तारीफ की जानी चाहिए कि पहली बार जनकपुरी कमेटी ने रामलीला कमेटी के वर्चस्व को चुनौती दी है। रावण दल द्वारा इस रामलीला से अपने को अलग कर लेने से इसका लोकस्वरूप एवं लोकव्यापकता समाप्त हो गई है।
देखने से पता चलता है कि रामलीला कमेटी में जाति विशेष के तथा दल विशेष के लोगों का ही वर्चस्व है। इस कमेटी में अधिकांश लोग व्यापारी हैं और जैसी कि इस वर्ग की मानसिकता केवल मुनाफा कमाने में होती है। वहां के हर फैसले इसी तथ्य को ध्यान में रखकर किये जाते हैं। इस कमेटी में शहर की बहुसंख्यक आबादी दलित व पिछड़ों को दूर रखा जाता है। हां अपने स्वार्थों के लिए अथवा प्रशासन पर दबाव डालने के लिए प्रभावशाली दल के राजनेताओं अवश्य अध्यक्ष पद पर सुशोभित कर दिया जाता है। राम के नाम पर जनकपुरी के लिए खुलेआम बोली लगती है। जो मर्यादा पुरुषोत्तम राम मर्यादा और पिता के वचन का पालन करने के लिए वनवास गये। वहां उन्हें समाज के शोषित वर्गों का समर्थन और सहायता मिली। यह स्पष्ट है कि उन्‍होंने भीलनी के जूठे बेर खाये। वानर आदिवासियों ने उनकी रावण युद्ध में पूरी सहायता की। केवट ने उनकी जलयात्रा में पर्याप्त मदद की। भगवान राम के इन्हीं विशिष्ट सहयोगियों के वंशजों को रामलीला कमेटी कमतर आंकती आ रही है और इनका अपमान और उपेक्षा करने से भी पीछे नहीं रहती।
जब सभी क्षेत्रों में पुरानी परम्पराओं के स्थान पर मानववादी दृष्टिकोण हावी है। जब सभी लोग समान है तो फिर रामलीला कमेटी से दलित और पिछड़े गायब क्यों हैं ? आगरा के कलाकारों को इस महत्वपूर्ण लोकनाट्य में अभिनय और मंचन करने का अवसर क्यों नहीं मिलता ? रामलीला के नाम पर वर्ष भर जो चंदा होता है, क्या उसका लेखा परीक्षण हुआ ? क्या रामलीला कमेटी ने यह साहस किया कि वह अपने आय-व्यय को सार्वजनिक करे ? इन सब सवालों का जबाव यही है कि वर्चस्ववादी लोग किसी भी कीमत पर इस महत्वपूर्ण लोकनाट्य में आम जनता की भागीदारी नहीं चाहते ? इसके लिए शहर के बुद्धिजीवियों, कलाकारों, साहित्‍यकारों, स्वतंत्र चिंतकों और समाजसेवियों को आगे आना होगा और इस महत्वूपर्ण लोकनाट्य रामलीला के भविष्य का नये सिरे से ताना बाना बुनना होगा। बिना लोक के लोकनाट्य कैसा ?



गुरुवार, 25 अगस्त 2011

अन्ना की हठ और उसके दुष्परिणाम लेखक डॉ. चन्द्रभान


अन्ना की हठ और उसके दुष्परिणाम
लेखक डॉ. चन्द्रभान

अन्ना का जनलोकपाल बिल, जो पाँच व्यक्तियों ने तैयार किया है, 30 अगस्त तक संसद पास हो जाना चाहिए अन्यथा अन्नाजी रामलीला मैदान नही छोड़ेगे और अपना आमरण अनशन जारी रखेंगे। यह जिद सरकार के लिये बहुत बड़ी धमकी और देश के प्रजातन्त्रीय प्रणाली के लिये बड़ा खतरा।
हमारे संविधान जिसके रचियता श्री अम्बेदकर सहित डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जवाहर लाल नेहरू, अच्युत पटवर्धन, हरिविष्णु कामथ, हृदयनाथ कुंजरू जैसे कई विद्वान थे, ने केवल जनता के चुने हुये सदस्यों को ही यह अधिकार दिया है कि वे संसद में जनता के मुद्दो पर चर्चा करें और कानून बनायें। जिन लोगों ने अन्ना का बिल तैयार किया है। उनमें से एक भी जनता का नुमायन्दा नहीं फिर भी वे चाहते है कि उनका बिल संसद पास करे और वह भी उनके फरमान के अनुसार 30 अगस्‍त तक। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अन्नाजी जनता के द्वारा चुने गये सांसदों पर्याप्त समय देने को भी तैयार नहीं ताकि उस बिल पर गहराई से विचार विमर्श या चर्चा कर सकें। सीधे-सीधे अन्नाजी संसद को धमकी दे रहे है कि या तो मेरा बिल पास करो नहीं तो मैं खाना पीना त्यागकर आत्महत्या कर लूँगा और मेरे समर्थक देश में अराजकता का ताण्डव फैला देंगे। अन्ना जी की इस जिद्द का सीधा तात्पर्य यह है कि सिविल सोसायटी के पाँच सदस्य संसद से भी ऊपर हैं। पाँच सदस्यों की अन्ना की यह चौकड़ी देश की निर्वाचित संसद से ज्यादा शक्तिशाली है। उनकी निगाह में असली संसद बौनी और पंगु है।
इस समय कुछ भ्रष्‍ट मंत्रियों की काली करतूतों के कारण सरकार सहमी हुई है। उसने इन्हें जेल का रास्ता दिखाकर प्रशंसनीय कार्य किया है। लोकपाल बिल सदन में पेश कर भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अपनी कटिबद्धता का परिचय दिया है। लेकिन कॉमनवैल्थ और 2जी के घोटालों ने सरकार का मनोबल तोड़कर रख दिया है। ऐसी परिस्थितियों में सरकार अन्ना से निपटने के लिये कोई साहसिक कदम उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रही है।
विपक्ष मौके का फायदा उठाने के लिये तैयार बैठा है। जो लोग वोटों से सत्ता हासिल नहीं कर पायें, वे अब अन्ना को मुखौटा बनाकर देश की कुर्सी हथियाना चाहते है। लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम है कि दबाब में आकर अन्ना ने अपना बिल अगर पास करा लिया तो वह विरोधी पार्टियों के लिये भी उतना ही घातक सिद्ध होगा, जितना कि सत्ताधारी पार्टी के लिये। संसद कमजोर पडेगी और देश कमजोर होगा। सरकार और संसद अपना बिल पास करने की अधिकार खो बैठेगी। अन्ना स्वयं कहते है कि यह केवल एक बिल की बात नही है। अभी बहुत से मुद्दे है जिसपर लड़ाई लड़नी है। इससे स्पष्ट है अन्ना दूसरे बिलों का मसौदा भी अपने चन्द लोगों से ही तैयार करायेंगे और संसद को ढेंगा दिखाते हुये पास भी करायेंगे। ऐसी कठपुतली और लाचार संसद देश का और समाज का कितना भला कर सकेगी। यह विचारणीय विषय है।
संसद कमजोर तो देश कमजोर। बाहरी शक्तियाँ तो यह चाहती हैं कि प्रगति की ओर बढ़ते हुये इस देश को कैसे रोका जाय। ये लोग तो ऐसे अवसरों की ताक में बैठे रहते हैं। यही कारण है कि हमारी प्रगति से जलने वाले देश अपने अखबारों के माध्यम से अन्ना का समर्थन कर रहे हैं। अफसोस है कि हमारा भ्रमित युवक विदेशी शत्रुओं की चाल को समझ नही पा रहे है कि अन्ना जी की मुहिम के पीछे बहुत से ऐसे लोग है जो स्वयं भ्रष्‍टाचार के आरोपों से घिरे हुये हैं। कर्नाटक में भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री आज अन्ना के समर्थन में भूख हड़ताल करने जा रहे हैं। क्या ऐसे लोगों के समर्थन से भ्रष्‍टाचार समाप्त होगा?
बात केवल भ्रष्‍टाचा के मुद्दे की नहीं है। बात संसद एवं संसद की गरिमा की है। संसद के संवैधानिक अधिकारों की है। आज एक अन्ना है और उसकी हठ है। कल कोई दूसरा अन्ना होगा। एक अरब 25 करोड़ की आबादी वाले देश में दूसरा अन्ना तैयार करने में कितना समय लगेगा ? पूंजीपतियों के लिये तो यह काम बहुत आसान है। बस कुछ करोड़ रुपये खर्च कीजिये बहुत से तथाकथित समाज सेवियों की सेना तैयार हो जायेगी। उनमें से कोई भी कुछ करोड़ों के लालच में आकरअनशन करने को तत्पर हो जायेगा। पड़ोसी देश में आतंकवादी संगठन इसी प्रकार से लोगों को आत्मघाती बना रहे हैं। कसाब इसका जीता-जागता उदाहरण है। उसके परिवार को कुछ करोड़ रुपये दे दिये गये थे। और कसाब मुम्बई पर हमला कर, स्वयं मौत के मुँह में जाने को तैयार हो गया।
यदि कुछ अति-संपन्न लोग चाहते हैं कि कोई बिल ऐसा बने जिसमें उनके ही हितों की रक्षा हो तो वे किसी भी व्यक्ति को लालच देकर राजी कर लेंगे और जंतर-मंतर पर जाकर कुछ किराये के टट्टुओं की मदद से भूख हड़ताल पर बैठा देंगे। कुछ टीवी चैनल्स को पटा लेंगे और अपने मनमाफिक बिल पास करा लेंगे। वर्तमान परिस्थितियों में देश के समक्ष अनेक ज्वलंत विषय हैं। इनमें से बहुत से विषय ऐसे है जिनसे कुछ लोग वर्षों से दुखी हैं। उदाहरणार्थ उच्च वर्ग के अधिकांश लोग आरक्षण के बहुत खिलाफ हैं। वे चाहते हैं कि सरकारी नौकरियों में एससी, एसटी और ओबीसी का आरक्षण समाप्त होना चाहिए। अन्ना प्रकरण से उनकी राह बहुत आसान हो जायेगी। बस किसी नामी गिरामी आदमी को अनशन करने के लिए इस शर्त पर राजी करलें कि वह अपना अनशन तब तक नहीं तोड़ेंगे जब तक संसद आरक्षण समाप्त करने का बिल पास न कर दे। अन्ना जी का बिल पास हो जाने पर शायद नक्सलवादी भी प्रेरणा लेंगे और अपने हजारों, लाखों युवक-युवतियों को अनशन पर बैठा देंगे और शर्त रखेंगे कि उनका अनशन तब तक जारी रहेगा जब तक लाल कॉरीडोर को एक स्वतंत्र राष्ट्र नहीं बन जायेगा। माओवादी संगठन में तो हजारों युवक-युवतियां इस मुद्दे पर बलिदान देने को भी सहर्ष तत्पर हो जायेंगे। किसी भी सरकार की यह कहने की हिम्मत नहीं होगी कि यह अनशन असंवैधानिक है।
मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्‍तम्‍भ माना जाता है। जनता तक सही बात पहुंचाने की उनकी जिम्मेदारी के साथ पुनीत कर्तव्य भी है। अन्ना के आंदोलन में हमारे पत्रकार एवं टीवी चैनल्स का जोश देखते ही बनता है। इनकी रिपोर्टिंग में निष्पक्षता की कमी है। सावंत कमीशन की रिपोर्ट में अन्ना के खिलाफ लगाये सभी आरोप सिद्ध पाये गये लेकिन किसी भी समाचार पत्र ने इसे छापने का साहस नहीं किया। क्या भारत की जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि अन्ना और उनके साथियों के ट्रस्ट अथवा एनजीओ के बारे में सुप्रीम कोर्ट जज की क्या राय है। अन्ना साहब के खिलाफ लगे चार्जों की छानबीन करने में जस्टिस सावन्त को तीन वर्षों का समय लगा। क्या ये चार्ज मामूली हो सकते हैं ? टी0वी0 चैनल ने देश के जाने माने व्याक्तियों से राय मांगी और जनता के सामने रखा। पत्रकारिता के इन धुरन्धरों ने यह क्यों नहीं उचित समझा कि जस्टिस सावन्त का टीवी पर साक्षात्‍कार लिया जाय और उनकी राय को उतना ही कवरेज दिया जाये जितना अन्ना और उसके सहयोगियों को दिया जा रहा है। क्या यह पत्रकारिता की गरिमा और मर्यादा के लिए उचित है कि एक ही पक्ष जनता के सामने परोसा जाय।
इस आंदोलन के बारे में हमारे समाचार पत्रों और टी0वी0 चैनल्स ही भ्रम फैला रहे हैं। हर शहर का स्थानीय अखबार कह रहा है कि पूरा शहर अन्ना के साथ है। इसी प्रकार सभी अखबार और चैनल्स दावा कर रहे हैं कि पूरा देश अन्ना के साथ है। यह तो मीडिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को खतरे में डालकर इनके मालिकान टीआरपी अथवा अखबारों का प्रसार बढ़ा रहे हैं। अन्नाजी रिहाई पर तिहाड़ जेल के सामने केवल 4-5 हजार समर्थक मौजूद थे। मशाल मार्च में 15 हजार दर्शक तथा समर्थक थे। रामलीला मैदान में भी इतने ही लोग मौजूद हैं। जबकि दिल्ली एनसीआर की आबादी लगभग एक करोड़ से अधिक है। इस प्रकार एक करोड़ में से केवल 10-15 हजार अन्ना जी के समर्थन में सड़कों पर आये। क्या इसे जनता का सैलाब कहना उचित है। यह तो दिल्ली की कुल जनसंख्या का आधा प्रतिशत भी नहीं बैठता। एक चर्चित टीवी चैनल ने 16 नगरों में एक सर्वेक्षण किया जिसमें केवल 8 हजार व्यक्ति से अन्ना के आंदोलन सम्बंधी प्रश्न पूछे गये। प्रश्नों के आधार पर निष्कर्ष निकाल लिया गया कि देश की 70 फीसदी जनता अन्ना का समर्थन करती है। क्या 8 हजार लोगों को सम्पूर्ण देश की जनता की राय का प्रतीक माना जा सकता है ? क्या इस प्रकार के आंकड़े देश की सही तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं ? वस्तुत: सैटेलाइट चैनल्स द्वारा देश की जनता को गुमराह किया जा रहा है। इस प्रकार से दुष्प्रचार से प्रजातंत्र तथा समाज दोनों को क्षति पहुंचत रही है। अत: देश के युवकों को सावधान रहना चाहिए और सही दिशा में कदम उठाना चाहिए।
प्रत्येक नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझे तथा भ्रष्‍टाचार को मिटाने में सहयोग करे। भ्रष्‍टाचार एक जटिल मसला है। इसकी जड़े बहुत गहरी हैं। अनशन के दवाब में एक बिल के पास हो जाने यह मिटने वाला नहीं है। जो लोग भ्रष्‍टाचार के वृक्ष को वर्षों से सींच रहे हैं, वे लोग बहुत शक्तिशाली एवं शातिर हैं। अन्ना के सहारे वे अपनी पकड़ सरकार और समाज पर मजबूत करते जा रहे हैं । विचारणीय विषय है कि इस आंदोलन पर करोड़ों रुपया फूंका जा चुका है और कितने ही करोड़ रुपये और स्वाहा होने जा रहे हैं। कुछ खास कारपोरेट घराने इसमें महत्वूपर्ण योगदान दे रहे हैं। यह प्रश्न ही विचलित करता है कि केवल मुनाफे पर निगाह रखने वाला पूंजीपति इस आंदोलन पर अपना धन क्यों लुटा रहा है ? अपने चहेते लोगों के हाथों देश की सत्ता सौंपकर यह लोग भोली-भाली जनता से वसूल करेंगे जो आज भ्रष्‍टाचार से मुक्ति पाना चाहती है। सपने दिखाना बहुत आसान है परंतु साकार करना बहुत ही दुश्कर है7 ऐसा न हो कि हमारी संवैधानिक व्यवस्था की भी बलि चढ़ जाये और भ्रष्‍टाचार का भूत और अधिक भयावह हो जाये।
वस्तुत: संसद पर अपना फैसला थोपना और अनशन की धमकी से बिल पारित कराना देश के संवैधानिक ढांचे को तहस-नहस कर देगा।

लेखक चिंतक व विचारक एवं आरबीएस महाविद्यालय आगरा के पूर्व भूगोलविभागाध्‍यक्ष हैं ।
मोबाइल - 9411400657

रविवार, 7 अगस्त 2011

अन्‍ना मौन क्‍यों हैं निजी क्षेत्र में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार पर

अन्ना हजारे व उनकी कथित सिविल सोसायटी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान किया और उनकी इस मुहिम में सक्रिय भागीदारी की तथाकथित नवधनाढ्य और प्रोफेशनल्स ने। इस दौरान सरकारी भ्रष्टाचार की तो खुलकर बातें की गई, विदेशों में जमा काले धन पर सरकार को कोसा गया लेकिन निजी क्षेत्र में अजगर की भांति फैल गये भ्रष्टाचार पर किसी ने चर्चा करना भी उचित नहीं समझा। क्या कारण है कि कल के मामूली व्यापारी आज करोड़ो और अरबों में खेल रहे हैं। शिक्षा के निजीकरण के नाम पर भ्रष्टाचाररूपी अवैध कमाई को मुनाफे का नाम दिया जा रहा है। इसी तरह चिकित्सा को व्यापारियों के हाथों सौंपने से आम आदमी बिना इलाज के मर रहा है। सरकारी अस्पताल में तो मरीज को केवल बाहर से दवा लाने पर विवश किया जाता है लेकिन निजी अस्पताल तो मरीजों का घर और खेत सहित जेबर भी बिकवा रहे हैं। किसान का आलू जब खेत में होता है तो दो रुपये किलो बिकता है लेकिन जब वह धन्ना सेठ के गोदामों में पहुंच जाता है तो वह 15-20 रुपये किलो क्यों हो जाता है ?
किसानों से कौडि़यों के भाव जमीन खरीदकर कौन कुबेरपति बन जाता है ? अन्ना हजारे टीम के प्रिय वकील क्या गरीब, शोषित और ईमानदार लोगों का मुकदमा ल़ड़कर सम्पन्नतम हुए हैं। इस आंदोलन के दौरान आरक्षण हटाओ-भ्रष्टाचार मिटाओ का नारा भी दिया गया लेकिन सवाल यह है कि निजी क्षेत्र में तो आरक्षण नहीं है फिर वहां भ्रष्टाचार का नंगा नाच क्यों हो रहा है ? अन्ना की इस सिविल सोसायटी में कोई गरीब, मजदूर, किसान, दलित, पिछड़ा या अल्पसंख्यक क्यों नहीं है ? चंद सफेद कॉलर वाले व पूर्व नौकरशाह इस देश के अघोषित नियंता नहीं बन सकते। निजी क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव क्यौं चुप हैं ? क्या निजी क्षेत्र जनलोकपाल के दायरे में नहीं आना चाहिए ?
वस्तुतः निजी क्षेत्र को भी सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत लाना चाहिए, तभी देश से भ्रष्टाचार की खात्मे की शुरूआत होगी। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि भ्रष्टाचार की ज़डे काफी गहरी हैं। केवल लोकपाल विधेयक पास होने से देश में भ्रष्टाचार समाप्त होने की बात सोचने वाले लोग कल्पनालोक में विचरण कर रहे हैं। जब कोई बुराई कार्यालय और दुकान अथवा कार्यस्थल तक सीमित हो तो उसे रोका जा सकता है लेकिन अब भ्रष्टाचार ने घरों में प्रवेश कर लिया है। किसी भी माता-पिता ने अपनी संतान से इस कारण रिश्ता नहीं तोड़ा कि उसका पुत्र अथवा पुत्री भ्रष्ट है और रिश्वत अथवा कालाबाजारी में लिप्त हैं। किसी पत्नी ने इस बात पर अपने पति को तलाक नहीं दिया है कि उसका पति भ्रष्ट तरीके से पैसे बना रहा है। घर में घुसे भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए न कानून काम आयेगा और न ही अन्ना हजारे का अनशन।
जरूरत इस बात की है भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन शुरू हो। इसकी शुरूआत हमें अपने घर, गली, मोहल्ले व शहर से करनी होगी। अपने मित्रों और रिश्तेदारों से करनी होगी। मेरा अभिमत है कि भ्रष्टाचार को केवल सरकारी प्रयासों से समाप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि लोकतांत्रिक पद्धति में चुनाव होते हैं और चुनाव बेहद खर्चीले होते है। अतः केवल राजनेताओं और सरकारी मशीनतरी से भ्रष्टाचार समाप्ति की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं है। वैध स्त्रोतों से अधिक अर्जित संपत्ति को अगर जब्त किया जाये। भ्रष्ट और कालाबाजारियों के साथ उनके परिजनों को भी आरोपी माना जाना चाहिए क्योंकि आदमी अपनी पत्नी, बच्चों और परिवार के लिए ही भ्रष्ट तरीके से कमाई करता है। जब उसका परिवार हराम की कमाई से गुलछर्रे उड़ा सकता है तो इस अपराध से उसे वंचित क्यों किया जाना चाहिए। अगर ऐसा होता है कि हर पत्नी और बच्चों की निगाह अपने बाप पर होगी कि उनकी गलत कमाई से उन्हें भी जेल की हवा खाना पड़ सकती है। इस तरह का कानून बनना चाहिए कि जिसके अंतर्गतं हर व्यक्ति के आय-व्यय का हिसाब रखा जाये तो सहज ही भ्रष्टाचार दिखाई देने लगेगा। वैसे भ्रष्टाचार का मतलब केवल सरकारी रिश्वत नहीं है। अपितु जनता का दोहन करने वाली हर इकाई दोषी है। भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अन्ना के अनशन से काम नहीं चलेगा और न ही पूंजीवादी मीडिया के अर्नगल प्रलाप से। हमें समाज के हर क्षे़त्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना होगा। वह क्षे़त्र चाहे मीडिया का हो, एनजीओ का हो अथवा व्यापार का। अन्ना हजारे का यह जान लेना चाहिए कि जो संपन्न और सक्रिय वर्ग उनके साथ है, वह दिल से कभी नहीं चाहेगा कि भ्रष्टाचार समाप्त हो। जिस भ्रष्टाचार की बुनियाद पर वह शीर्ष पर हैं। सत्ता और धन के शिखर पर बैठे व्यक्ति कभी नहीं चाहेंगे कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आर-पार की ल़ड़ाई हो।




मंगलवार, 31 मई 2011

काहे री नलिनी उपन्यास पर उषा यादव को मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार


काहे री नलिनी उपन्यास पर उषा यादव को
मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार

आगरा। बहुमुखी लेखन की अप्रितम साहित्यकार डॉ. उषा यादव को मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी ने उनके उपन्यास काहे री नलिनी को अखिल भारतीय वीरसिंह देव पुरस्कार देने का फैसला लिया है। साहित्य अकादमी के इस निर्णय से शहर के साहित्यकर्मियों में उत्साह और हर्ष की लहर दौड़ गई। केन्द्रीय हिंदी संस्थान आगरा एवं डॉ. भीमराव अम्‍बेडकर विश्वविद्यालय के संस्थान कन्हैयालाल, माणिकलाल मुंशी हिंदी एवं भाषा विज्ञान विद्यापीठ के पूर्व प्रोफेसर डॉ. यादव को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ से बाल साहित्य का सर्वोच्च सम्मान बालसाहित्य भारती तथा विश्वविद्यालय स्तरीय सम्मान प्राप्त हो चुका है। सूचना प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा उन्हें भारतेन्‍द्रु हरिश्चंद्र पुरस्कार मिला है। उनका बाल उपन्यास पारस पत्थर चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट से पुरस्कृत हुआ है।
देश के वरिष्ठ बाल-साहित्यकार कानपुर निवासी चन्द्रपाल सिंह यादव मयंक की सुपुत्री एवं केआर महाविद्यालय मथुरा के पूर्व प्राचार्य तथा उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा आयोग के सदस्य डॉ. राजकिशोर सिंह की धर्मपत्नी डॉ. उषा यादव टुकड़े टुकड़े सुख, सपनों का इन्द्रधनुष, जाने कितने कैक्टस, चुनी हुई कहानियां, सुनो जयंती, चांदी की हंसली आदि कहानी संग्रह तथा प्रकाश की ओर, एक ओर अहल्या, धूप का टुकड़ा, आंखों का आकाश, कितने नीलकंठ, कथान्तर, अमावस की रात, काहे री नलिनी आदि उपन्यास एवं सपने सच हुए, हिंदी साहित्य के इतिहास की कहानी, राजा मुन्ना, अनोखा उपहार, कांटा निकल गया, लाख टके की बात, जन्म दिन का उपहार, दूसरी तस्वीर, दोस्ती का हाथ, मेवे की खीर, खुशबू का रहस्य, पारस पत्थर, नन्हा दधीचि, लाखों में एक, राधा का सपना, भारी बस्ता, तस्वीर के रंग सांगर मंथन आदि बाल साहित्य की पुस्तकें देश के लब्ध प्रतिष्ठित प्रकाशनों से प्रकाशित हुई हैं।
आपकी तर्पण कहानी का अंग्रेजी, सपनों का इन्द्रधनुष का उड़िया, मरीचिका कहानी का तेलगू, सुनो कहानी नानक बानी का पंजाबी भाषा में अनुवाद हुआ है। राजस्थान शिक्षा परिषद की कक्षा 6 की पाठ्य पुस्तक में उनकी कहानी दीप से दीप जले, महाराष्ट्र हायर सैकेंड्री बोर्ड की नवीं कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में ऊंचे लोग कहानी संकलित है।
डॉ. उषा यादव साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था इन्द्रधनुष की अध्यक्ष एवं प्राच्य शोध संस्थान की सचिव भी हैं। शहर की इस बहुआयामी लेखन की धनी लेखिका को मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने पर पदमश्री डा. लालबहादुर सिंह चौहान, चौ. सुखराम सिंह, डा. त्रिमोहन शाक्य तरल, डॉ. सुषमा सिंह, शिव सागर, डॉ. राजकुमार रंजन, डॉ. चन्द्रशेखर राठौड, कैलाश चौहान मायावी, डॉ. महाराज सिंह परिहार, डॉ. शशि तिवारी, जितेन्द्र रघुवंशी आदि ने हर्ष व्यक्त किया है।

गुरुवार, 5 मई 2011

निजी क्षेत्र में भ्रष्‍टाचार की पराकाष्‍ठा - चुप क्‍यों हैं हजारे और रामदेव

निजी क्षेत्र में भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा - चुप क्यों हैं हजारे और रामदेव
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अभी दिल्‍ली में जंतर मंतर पर अन्‍ना हजारे व उनके कथित सिविल सोसायटी के लोगों ने भ्रष्‍टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान किया और उनकी इस मुहिम में भागीदारी की तथाकथित नवधनाढय और प्रोफेशनल्‍स ने। इस दौरान सरकारी भ्रष्‍टाचार की तो खुलकर बातें की गईं, विदेशों में काले धन पर सरकार को कोसा गया लेकिन निजी क्षेत्र में अजगर की भांति फैल गये भ्रष्‍टाचार की किसी ने चर्चा करना भी उचित नहीं समझा। क्‍या कारण है कि कल के मामूली व्‍यापारी आज करोडो और अरबों में खेल रहे हैं। शिक्षा के निजीकरण के नाम पर भ्रष्‍टाचाररूपी अवैध कमाई को मुनाफे का नाम दिया जा रहा है। इसी तरह चिकित्‍सा को व्‍यापारियों के हाथों सौंपने से आम आदमी बिना इलाज के मर रहा है। सरकारी अस्‍पताल में तो मरीज को केवल बाहर से दवा लाने पर विवश किया जाता है लेकिन निजी अस्‍पताल तो मरीजों के घर और खेत बिकवा रहे हैं। किसान का आलू जब खेत में होता है तो दो रुपये किलो बिकता है लेकिन जब वह धन्‍ना सेठ के गोदामों में पहुंच जाता है तो वह 10 रुपये किलों क्‍यों हो जाता है। किसानों से कौडियों के भाव जमीन खरीदकर कौन कुबेरपति बन रहा है। अन्‍ना हजारे के प्रिय वकील क्‍या गरीब, शोषितों, मेहनतकश और ईमानदार लोगों का मुकदमा लडकर सम्‍पन्‍नतम हुए हैं। इस आंदोलन के दौरान आरक्षण हटाओ-भ्रष्‍टाचार मिटाओं का नारा भी दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि निजी क्षेत्र में तो आरक्षण नहीं है फिर वहां भ्रष्‍टाचार का नंगा नाच क्‍यों हो रहा है। अन्‍ना की इस सिविल सोसायटी में कोई गरीब, मजदूर, किसान, दलित, पिछडा या अल्‍पसंख्‍यक क्‍यों नहीं है। चंद सफेद कालर वाले व पूर्व नौकरशाह इस देश के अघोषित नियंता नहीं बन सकते। निजी क्षेत्र में फैले भ्रष्‍टाचार पर अन्‍ना हजारे और बाबा रामदेव क्‍यों चुप हैं, क्‍या निजी क्षेत्र जनलोकपाल के दायरे में नहीं आना चाहिए। वस्‍तुत निजी क्षेत्र को भी सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत लाना चाहिए तभी देश से भ्रष्‍टाचार के खात्‍मे की शुरूआत होगी।

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

पूरा समाज ही भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त

अन्‍ना हजारे के अनशन से ऐसा लगा कि अब तो भ्रष्‍टाचार का नाश करके ही चेन मिलेगा। सारे देश में भ्रष्‍टाचार के खिलाफ वातावरण बनने लगा। जगह जगह अनशन और गोष्ठियां हुई कि देश से भ्रष्‍टाचार समाप्‍त होना चाहिए। अखबारी समाचारों में अधिकांश भ्रष्‍ट लोग ही थे जो अन्‍ना हजारे जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। इन कार्यक्रमों के लिए चंदा दिया मुनाफाखोरों, कालाबाजारियों और घटतौली करने वालों ने। वैसे भी अगर लोकपाल विधेयक पास हो जाता है तो क्‍या भ्रष्‍टाचार पर रोक लगेगी। लेकिन सच्‍चाई कुछ और ही है। सब हीरों बनने के नाटक और सस्‍ती लोकप्रियता हासिल करने के फंडे हैं। आप विचार करिये कि देश में हत्‍या के खिलाफ कानून है लेकिन क्‍या कानून से हत्‍यारों का दौर समाप्‍त हो गया है। दहेज उन्‍मूलन कानून है लेकिन दहेज दानव कितनी वहुओं को निगल रहा है। सच तो यह है कि हमारा पूरा समाज भ्रष्‍टाचार में आकंठ डूबा हुआ है। जहां तक राजनेताओं की बात है कि वह भी तो समाज के ही लोग हैं और लोग उन्‍हें चुन कर भेजते हैं। सवाल यह भी है कि क्‍या मुनाफाखोरी, कालाबाजारी, घटतौली भ्रष्‍टाचार की श्रेणी में नहीं आते। समाज में संपन्‍न आदमी को सम्‍मान मिलता है लेकिन संपन्‍नता बिना भ्रष्‍टाचार के नहीं आती। कालाबाजारी करके, श्रमिकों को शोषण करके, सरकारी टैक्‍सों की चोरी करके ही अनाप शनाप मुनाफा कमाया जाता है। जब तक समाज में संपन्‍न लोगों यानी धनकुबेरों की पूजा होती रहेगी, भ्रष्‍टाचार को कोई माई का लाल नहीं मिटा सकता।

शनिवार, 1 जनवरी 2011

नया वर्ष-नयी चुनौतियां

हर बार 365 दिनों के बाद नया साल आता है। इस दिन इंडिया में नये सपने संजोये जाते है। नया संकल्प किया जाता है। खूब मौज मस्ती होती है। होटलों में अनेकानेक कार्यक्रम होते है। पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। लेकिन इसके विपरीत असली भारत अपनी बेबसी पर आंसू बहाता रहता है। वह सोचता है शायद नये साल में कुछ राहत मिले। पर कहां उन अभागों के नसीब, जो उन्हें दो जून की रोटी मुहैया करा सके। एक बात साफ है कि देश में गरीबों को जिंदा रहने का अधिकार लगभग अलिखित विधान के तहत छीना जा रहा है। कथित बुद्धिजीवियों से लेकर उद्योगपतियों तक, सबकी निगाहें सेंसेक्स पर टिकी रहती है। अब कहां गई शस्य शयामला देवभूमि, जिसमें कंक्रीट के जंगल रोपने की तैयारी जोरों पर है। कृषि भूमि पर खेती और गरीब की झोंपड़िया नहीें अपितु मॉल व रईसों के फार्म हाउस बन रहे हैं। लगता नहीं कि नये साल में कोई आमूलचूल परिवर्तन होगा। इस व्यक्तिवादी देश में न किसी को समाज की चिंता है और न ही देश की। जब व्यक्ति का उद्देश्य स्वार्थ में विलुप्त हो जाता है तो उससे अपेक्षा करता मूर्खता के अतिरिक्त कुछ नहीं है। इस देश में चाहे गांधीवादी हो चाहे श्रीरामवादी, समाजवादी हो या साम्यवादी। सभी बुनियादी मुद्दों से आंखें मूंदे नजर आते हैं। सत्ता के गलियारों में घुसने के लिए यह वाद उनके लिए सीढ़ी है न कि जीवन में आत्मसात करने की विचारधारा। लोगो ने बड़े धूमधाम से नया साल बनाया। देश के कर्णधारों ने नव वर्ष की शुभकामनाएं प्रेषित की। लेकिन अफसोस, कहीं भी उनका वह संकल्प दिखाई नहीं दिया जिससे लोगों के जीवन में भोर की किरण प्रवेश करे। वैसे भी नया साल रईसों के लिए सभी तरीके से कमाए पैसे फूंकने का त्यौहार बन चुका है। अच्छा होता कि नये वर्ष पर राजनेता और नौकरशाह यह कहते कि वह ईमानदार रहेगा। अपने परिवार से परे देश व समाज हित में संघर्ष करेगा। उस जनता के प्रति समर्पित रहेगा जिसने उसे पद, सम्मान व वैभव दिया है। काश! हम नये साल में सकंल्प ले पाते कि अब दहेज दानव की भेंट कोई बहिन नहीं चढ़ेगी। डा. लोहिया के ‘जाति तोड़ो’ आन्दोलन को हम जीवित करेंगे। भ्रष्टाचार के खिलाफ आर-पार की मुहिम चलाएंगे। गरीबों की अस्मत से खेलने वालों को हम नेस्तनाबूद करेंगे। किसी की मुस्कान रूपी दीप्ति छीनकर अपने आशियाने में हम उजाला नहीं करेंगे।

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

सांसद निधि पर ज्वलंत सवाल

बिहार में नीतीश कुमार ने विधायक निधि समाप्त कर यह मांग पुरजोर तरीके से उठाई है कि सांसद निधि भी समाप्त की जाये। इस तरह की मांगे विगत कई वर्षो से उठाई जा रही हैं कि इस निधि का दुरुपयोग हो रहा है और सांसद अपनी मनमानी करके इसका उपयोग कर रहे हैं। वैसे जब 1993 में अल्पमत में आई पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव ने इसे संभवतः इस उद्देश्य से आरंभ किया था कि इससे सांसदों को विकास के लिए प्रोत्साहन राशि मिल जाये। योजना के आरंभ में सांसद निधि की धनराशि पहले पचास लाख और फिर एक करोड़ रुपये थी जिसे राजग सरकार ने बढ़ाकर दो करोड़ रुपये कर दिया था। इस मन्तव्य भले ही विकास का रहा हो लेकिन इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि अपनी अल्पमत सरकार को बचाने का शायद यह लॉलीपॉप भी था। इस निधि में प्रतिवर्ष 1600 करोड़ सांसदों को आवंटित की जाती है। अब तक इस मद में 17000 करोड़ रुपये आवंटित हो चुके हैं। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस जनहित का मामला बताकर इस योजना को हरी झंडी दिखा दी। जबकि द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग तथा नेशनल कमीशन फॉर रिव्यू ऑफ द वर्किंग ऑफ कांस्टीट्यूशन अर्थात् एनसीआरडब्ल्यूसी और 2005 में सोनिया गांधी की अध्यक्षता में गठित नेशनल एडवायजरी कमेटी भी सांसद निधि खत्म करने की सिफारिश कर चुकी है। सांसदों की मांग थी कि सांसद निधि बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये सालाना की जाये। इस पर केन्द्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के इस प्रस्ताव को योजना आयोग के उपाध्यक्ष डा. मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने ठुकरा दिया है। इस निधि के दुरुपयोग की शिकायतें आम हैं। यह वास्तविकता भी है कि सांसद-नौकरशाही और ठेकेदारों का गठजोड़ इस निधि का बंदरबांट करने से पीछे नहीं है। अधिकांश सांसदों ने इस राशि का उपयोग अपने निजी स्कूल व कॉलेज आदि में अधिक किया है। दुरुपयोग के संबंध में केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जायसवाल ने कहा कि हाल ही में उनके मंत्रालय ने एक रपट जारी करते हुए उन कार्यों का खुलासा किया था जो सांसद निधि के तहत चिन्हित नहीं हैं। ऐसे सांसदों से उनके द्वारा कराये गए गैर चिन्हित कामों की रकम वसूली के लिए सम्बंधित जिले के डीएम को कार्रवाई शुरू करने का कहा गया है।

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

वाराणसी विस्फोटःआस्था पर हमला

विगत दिनों वाराणसी में गंगा आरती के समय हुए आतंकी हमले ने समूचे देशवासियों को झकझोर कर रख दिया है। जिस समय लोग आस्था और श्रद्धा के साथ सायंकाल गंगा की आरती उतार रहे थे। उन्हें सपने में भी ख्याल नहीं था। आखिर यह ख्याल उन्हें आता क्यों ? आखि रवह इस आरती को सदियों से परम्परागत रूप से करते आ रहे हैं। वाराणसी में सभी धर्मों के लोग आपसी सद्भाव और भाईचारे से रहते हैं। फिर इस तरह की कुत्सित और अमानवीय विस्फोट का क्या मतलब है। समझ में नहीं आता कि आखिर आतंकवादी चाहते क्या हैं ? क्या वह देश की साझी संस्कृति को ध्वस्त करना चाहते हैं अथवा यहां के आपसी सद्भाव को चोट पहुंचाकर अपने मंसूबे पूरा करना चाहते हैं। इस हमले से इतना तो स्पष्ट है कि देश में आतंकवादियों ने जबर्दस्त घुसपैंठ बना ली है। यह हमले भले ही विदेशी शत्रुओं द्वारा प्रायोजित हों लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि उन्हें इसी देश के लोगों से संरक्षण और मदद मिलती है। जब तक हम अपने बीच के विभीषणों और जयचंदों को नेस्तनाबूद नहीं करेंगे। उनके मुख से नकाब नहीं उठायेंगे। तब तक आतंकी अपने काले कारनामों को अंजाम देते रहेंगे। इस विस्फोट के संदर्भ में हमें आतंकी मानसिकता और विचारधारा पर भी मंथन और चिंतन करना होगा कि आतंकी हमारी गंगा-जमुनी विरासत के अलमस्त शहर वाराणसी को क्यों बार-बार अपना निशाना बना रहे हैं। यह मामला हमारी आस्था और श्रद्धा से जुड़ा हुआ है। इस घटना ने हमारे अंतर्मन को घायल ही नहीं किया बल्कि हमारी आस्था और विश्वास को ललकारा भी है। इस घटना के तार प्रतिबंधित सिमी से जोड़ा जा रहा है जिसने प्रतिबंध के बाद अपना नाम बदल लिया है। आतंकी सोचते थे कि इस हमले से हिंदू भड़क उठेंगे और अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए अनहोनी करेंगे। परंतु आतंकियों के इस मंसूबे को धराशायी किया है वाराणसी के निवासियों ने। उन्होंने इस घटना के बाद भी भय और आतंक से अपने को परे रखकर आतंकी संगठनों को करारा जवाब दिया है। सिमी और संघ को एक जैसा संगठन बताने वालों की आंख खुल जानी चाहिए कि किस प्रकार कट्टरवादी इस्लामी ताकतें देश की एकता और अखंडता को विखंडित करने में जुटी हुई हैं। अब किंतु-परंतु से काम नहीं चलेगा अपितु अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति से आतंकियों को समूल नष्ट करना होगा। आखिर कब तक आतंकी देश की आस्था और श्रद्धा को लहूलुहान करते रहेंगे।

रविवार, 5 दिसंबर 2010

भारतीय अमीरों में सेवा भावना का अभाव

बहुचर्चित उपन्यास ‘सिटी ऑफ जॉय‘ के फ्रांसीसी लेखक डोमिनिक लेपियर ने भारतीय अमीरों को सही आइना दिखाया है कि उनमें गरीबों के प्रति मानवीय संवेदना का अभाव है। वह उनके मददगार नहीं होते। उनके इस कथन को एकदम खारिज नहीं किया जा सकता। देश में अरब और खरबपतियों की संख्या बढ़ रही है लेकिन उनका सामाजिक सरोकारों से कोई रिश्ता नहीं है। वह गरीब और मरीजों के प्रति सहिष्णु नहीं है। यह भारतीय परम्परा और संस्कृति के विरुद्ध है। देश में हजारों धर्मशालाएं, बावड़ी, कुंए, स्कूल और कालेज हमारे देश के अमीरों ने ही बनाये हैं। देश का शायद ही कोई ऐसा शहर होगा। जहां उन्होंने अपने समाजोपयोगी कार्यों को अंजाम नहीं दिया हो। पहले बड़ा आदमी बड़े काम करने वाले को ही माना जाता था। लेकिन आज सब कुछ बदल गया है। यही कारण है कि अधिकांश धनकुबेर अपनी पत्नी को उसके जन्मदिवस पर जेट विमान भेंट करते है तो कोई बहुमंजिला आलीशान इमारत। वस्तुतः भौतिक जीवन में आकंठ डूबे अमीरों का नजरिया ही बदल गया है। उनका धन उनके ऐशो-आराम में या अपने ओद्यौगिक साम्राज्य को विस्तार करने में अधिक खर्च होता है। देश में टाटा और इन्फोसिस के नारायणमूर्ति जैसे कुछ ही धनकुबेर हैं जो अपने सामाजिक दायित्वों को अपने अस्पतालों व अन्य प्रतिष्ठानों के माध्यम से पूरा कर रहे हैं।

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

चिकित्सक क्यों नहीं जाते गांव

जाने क्यों सरकारी अधिकारी और कर्मचारी गांव जाने से घबराते हैं। नौकरी पाने के बाद वे येन-केन-प्रकारेन शहर में ही अक्सर पदस्थ रहते हैं। हांलांकि उनको गांव में भी स्थानांतरित या नियुक्ति दी जाती है लेकिन भ्रष्टाचार के कारण उपस्थिति पंजिका में उनकी फर्जी उपस्थिति दर्ज होती है। वह इसकी बाजिव कीमत भी चुकाते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्रामीणों के हित में साहसिक कदम उठाते हुए 1 दिसम्बर 2010 से नियुक्त चिकित्साधिकारियों की सेवा शर्तों में संशोधन करके उन्हें परामर्शदाता बनने के लिए चार साल गांवों में अनिवार्य रूप से अपनी सेवाएं देनी होंगी। पहले वरिष्ठ चिकित्साधिकारी वरीयताक्रम से परामर्शदाता यानी कंसल्टेंट बन जाते थे। अब उन्हें अपनी प्रोन्नति के लिए ग्रामीणों के बीच चार साल का समय गुजारना होगा। डाक्टरों को सरकार के इस आदेश से निराशा होगी क्योंकि वह शहरी जीवन-शैली के गुलाम हो गये हैं। वह अपना पवित्र दायित्व चिकित्सा सेवा को विस्मृत कर चुके हैं और शहर में धड़ल्ले से प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं। अब सवाल यह पैदा होता है कि कहीं सरकार का यह कदम कागजों में दब कर न रह जाये अथवा डाक्टर फर्जी तरीके से गांव में डयूटी करते रहें। सरकार सहित जनप्रतिनिधियों को भी इस ओर जागरूक रहना होगा कि कहीं इस आदेश का उल्लंघन तो नहीं हो रहा है।

सांस्कृतिक क्षरण करते टीवी सीरियल्स

राखी का इंसाफ तथा बिग बॉस अपने शो के माध्यम से अश्लीलता के साथ अनैतिक मूल्यों को प्रतिस्थापित करने में लगे हैं। इनके संवाद, अभिनय तथा हाव-भाव दिशाहीनता से ओत-प्रोत हैं। सभी चैनल्स में इस बात ही होड़ लगी है कि कौन अत्यधिक अश्लीलता, नग्नता और भोंड़ापन दिखा सकता है। इन्होंने यह मान लिया है कि दर्शकों को घटिया स्तर के सीरियल्स और रीयल्टी शो ही पसंद हैं। इस समय देश में असंख्य टीवी चैनल्स हो गये हैं। हर भाषा में इनकी बाढ़ आई हुई है। लगातार चौबीस घंटे चलने वाले इन चैनल्स में मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता और देश के परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण जारी है। पाश्चात्य जगत की देखा-देखी रीयल्टी शो दिखाये जाने लगे हैं। हास्य के नाम पर भोंड़ा हास्य सेक्स के साथ परोसा जा रहा है। सीरियल्स में नैतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। समाचारों के बारे में तो कहना ही क्या ? एक्सक्लूसिव के नाम पर एक ही समाचार सभी चैनल्स बेशर्मी दिखा रहे हैं। मालूम ही नहीं पड़ता कि यह समाचार कैसे एक्सक्लूसिव हो गया। भूत-प्रेतों के अजीब हंगामों से हमारे चैनल्स भरे पड़े हैं। मालूम ही नहीं पड़ता कि वे दर्शकों को कैसा मनोरंजन और जानकारी देना चाहते हैं। इन चैनल्स में भी भीषण प्रतिस्पर्धा है जिसके कारण एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का षड़यंत्र जारी रहता है। जब दूरदर्शन आरंभ हुआ तो उसने लोगों के स्वस्थ मनोरंजन के लिए बुनियाद, हमलोग, नुक्कड़, उड़ान, चन्द्रकांता, नीम का पेड़ आदि समाजोपयोगी तथा सकारात्मक धारावाहिक प्रसारित किये। रामायण और महाभारत ने अपार लोकप्रियता हासिल की। लेकिन जैसे ही चैनल्स की बाढ़ आई। उसमें धारावाहिकों के कथानक ही बदल दिये। सास भी कभी बहू थी तथा घर घर की कहानी में जिस प्रकार नैतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाई गई। उससे हमारे सांस्कृतिक मूल्य क्षरित हुए। अफसोस इस बात का है कि चैनल्स की मनमानी तथा उच्छंखलता के खिलाफ न तो सरकार ने नकेल कसी और न ही जनता ने इसका प्रतिरोध किया। यह दौर जारी रहा तो निश्चित रूप से हमारे नैतिक मूल्य और सांस्कृतिक विरासत को कोई विलुप्त होने से नहीं बचा पायेगा।

रविवार, 21 नवंबर 2010

हिंदी की उपेक्षा के दुष्परिणाम

यह कितना विरोधाभाष है कि एक ओर तो हम हिंदी को संयुक्त राष्ट्रसंघ में मान्यता दिलाना चाहते है दूसरी ओर हमारे देश में ही उसकी दुर्गति हो रही है। अभी उत्तर प्रदेश पीसीएस मुख्य परीक्षा का परिणाम आया है। इसमें शर्मनाक बात यह है कि 450 प्रतिभागी हिंदी विषय में फेल हैं। यह स्थिति अत्यंत निराशाजनक ही नहीं अपितु हमारी शिक्षा प्रणाली को भी सवालों के घेरे में खड़ा करती है। जिस प्रदेश ने हिंदी को समूचे विश्व को परिचित कराया। प्रदेश की सरकारी काम-काज की भाषा हिंदी है फिर इसी विषय में कुल प्रतिभागियों में से 10 फीसदी का अनुत्तीर्ण होना हमारी दिशाहीनता को इंगित करता है। इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि मुख्य परीक्षा में अधिकांश सफल प्रतियोगियों के हिंदी में नम्बर भी केवल पास लायक ही होंगे। युवाओं को इस वास्तविकता से परिचित होना चाहिए कि प्रशासन में आने के लिए हिंदी का ज्ञान आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य है। केवल अंग्रेजी रटने से वह प्रशासनिक सेवाओं में कभी नहीं आ सकते। यहां के लोगों की मातृभाषा भी हिंदी है। अतः इस भाषा में फिसड्डी रहना शिक्षा जगत के गाल पर तमाचा है। इस स्थिति के लिए कौेन जिम्मेदार है ? जिस भाषा को हमने मां की घुट्टी के रूप में प्राप्त किया है! उसमें हमारी कमजोरी दर्शाती हैे कि शिक्षा जगत अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन नहींे कर पा रहा है। जब प्रतियोगी हिंदी में ही फेल हैं तो उनके इतिहास, गणित, विज्ञान आदि अन्य विषयों में योग्य होने की उम्मीद करना बेकार है। इस स्थिति के लिए सरकार के साथ अभिभावक भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। उन पर अंग्रेजी का ऐसा भूत सवार हुआ है कि वह अपने बच्चों को कुकुरमुत्तों की तरह उगे कथित इंग्लिश मीडियम स्कूलों में प्रवेश कराकर गर्व का अनुभव करता है। बच्चा स्कूल में अधकचरे शिक्षकों से अंग्रेजी पढ़ता है और घर आकर हिंदी के वातावरण में चहलकदमी करने लगता है। इस विरोधाभास का दुष्परिणाम यह होता है कि बच्चा न तो अंग्रेजी भाषा में प्रवीणता प्राप्त कर पाता है और अंग्रेजी के चक्कर में अपनी मातृभाषा को भी भूल जाता है। इसका खामियाजा उसे आगे चलकर भोगना पड़ता है। हम वर्तमान परिप्रेक्ष्य की अनदेखी नहीं कर सकते कि अंग्रेजी विश्वभाषा का रूप धारण करती जा रही है। लेकिन हिंदी की कीमत पर विदेशी भाषा को आत्मसात करना न तो ज्ञान के लिए उचित है और न ही विज्ञान के लिए। हर व्यक्ति में विचार का प्रादुर्भाव उसकी अपनी भाषा में होता है। उसकी मेधा और ऊर्जा भाषा से ही प्रेरित और प्रभावित होती है। हिंदी की यह उपेक्षा केवल शिक्षा जगत में ही नहीं अपितु सभी जगह अपने पांव पसार चुकी है। मातृभाषा के अभाव में हमारा चिंतन मौलिक नहीं होता। जब चिंतन मौलिक नहीं होगा तो हम किस प्रकार नये अनुसंधान और शोध कर पायेंगे।

दिशाहीनता के शिकार भारतवासी



‘‘भारत ने अपना लगभग सब कुछ खो दिया-उसने अपनी आत्मा तक खो दी है। लेकिन हमें फिर भी चिंतित नहीं होना चाहिए और आशा नहीं छोड़नी चाहिए। किसी कवि ने कहा है, तुमको अपना पौरुष फिर से प्राप्त करना है। हां, अवश्य ही फिर से मनुष्य बनना है। इस सुन्दर भारत देश में इस समय ऐसे लोग विचर रहे हैं जारे निर्जीव अतीत की प्रेतात्माओं के समान हैं। चारों ओर निराशा है, मौत है, आरामतलबी है, बीमारी है, अटूट दुख है-भारत के सम्पूर्ण क्षितिज पर दुर्भाग्य के बादल छा गये हैं। ....लेकिन इस सम्पूर्ण निराशा,ज ड़ता, निर्धनता और भुखमरी के होते हुए भी तथा एक ओर भूख से पीड़ित लोगों की चीख-पुकार को डुबोते हुए, और दूसरी ओर विलासिता के दलदल में फंसे लोगों की पाखंडपूर्ण खिलखिलाहट को अनसुनी करते हुए, हमें दुबारा भारत का राष्ट्रीय संगीत छेड़ना है और वह है..........उत्तिष्ठ, जाग्रत।...उठो, जागो।’’

लगता है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा 27 दिसम्बर 1915 को अपने मित्र हेमंत कुमार सरकार को लिखे पत्र के यह अंश आज के भारत सी सच्ची तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हों। लगभग एक शतक होने के बाद भी भारत माता की वेदना में कोई अंतर नहीं आया है। हमने आजादी भले ही प्राप्त कर ली लेकिन अपनी आत्मा को खो दिया है। हमें पता ही नहीं कि हम किसके लिए और क्यों जी रहे हैं। न हमारे कोई सपने हैं और न ही राष्ट्रीय सरोकारों से हमें कोई मतलब रह गया है। हमारा राष्ट्रीय चरित्र खो चुका है। सिर्फ स्वार्थ-साधना ही हमारे जीवन का एकमात्र लक्ष्य बनता जा रहा है। देश दो भागों में बंट चुका है। एक और वह भारत है, जहां संपन्नता है, खुशी है। मस्ती है। संवेदनशून्यता है। अहंकार है। वहीं दूसरी ओर असली भारत है। जहां गरीबी है। बेरोजगारी है। शोषण और अत्याचार है। निराशा और चीत्कार है। अफसोस इस बात का है कि किसी भी देश की असली ताकत उसकी युवा शक्ति होती है। लेकिन लगता है कि उनके भी सपने मरते जा रहे हैं। शिक्षाध्ययन के बाद उनका एकमात्र लक्ष्य रोजगार पाना ही रह गया है। रोजगार पाने के बाद वह भी इसी सड़ी-गली व्यवस्था का अंग हो जाता है। लेकिन इसके लिए युवाओं को दोेषी नहींे ठहराया जा सकता। हम आजादी के बाद अपने लोगों को सपने तो आसमान से ऊंचे दिखाते रहे लेकिन उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं से महरूम रखा। यही कारण है कि युवाओं के सामने पहली प्राथमिकता अपने जीने के अस्तित्व की है। इसीलिए छात्र जीवन में कभी मार्क्स और कभी लोहिया दर्शन की बात करते नहीं अघाता युवा कालांतर में यथास्थितिवादी हो जाता है। ऐसे हालात में नहीं लगता कि हम देश को आगे ले जाने का साहस रखते हैं। केवल भौतिक विकास ही मनुष्य का वास्तविक विकास नहीं है। अगर लोगों में मानवीयता ही मर जाये तो ऐसे लोगों और पशुओं में अंतर ही कहां रह जाता है। यह देश का सामने बहुत बड़ा खतरा है। जिस आजादी के लिए कुर्बानियां दी गईं । उन शहीदों का नाम लेने वाला भी कोई नहीं है। सिर्फ स्वतंत्रता दिवस के दिन हम उन्हें रस्मी तौर पर याद कर लेते हैं। जब हमारे जीवन के आयाम ही बदल चुके हैं तो फिर कैसे जागेगा भारत। भूखा भारत कब तक इंतजार करता रहेगा विकास की भोर का। जीवन के हर क्षे़त्र में निराशा का वातावरण है। नैतिक मूल्यों की होली जलाई जा रही है। समाजसेवा का प्रतीक राजनीति अपने पथ से च्युत हो गई है। शिक्षा और चिकित्सा बाजारू हों गईं हैं। पहले लोग दूसरे के लिए जीने में विश्वास रखते थे लेकिन बदलते परिवेश मे वह दूसरों की जान की कीमत पर जी रहे हैं। आखिर हमारे इस स्वार्थपूर्ण आचरण का क्या परिणाम होगा। इस पर हमने विचार नहीं किया है। इसी प्रकार अगर लोगों में हताशा और निराशा बढ़ती गई तो निसंदेह शांति नहीं रहेगी। इसका खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ सकता है जो विलासिता में आकंठ डूबे हैं और जिनके कान में भूखों की चीत्कार नहीं पहुंच पा रही है। हमें अपने विकास मॉडल पर पुनर्विचार करना होगा। कुछ लोगों के विकास के लिए असंख्य लोगों को उजाड़ना बंद करना होगा। सामाजिक संरचना की अनदेखी के बिना विकास अधूरा है। क्या यह हमारे निजाम और कथित सभ्य समाज के गाल पर तमाचा नहीं है कि जहां मिड डे मील खाने से बच्चे इस लिए मना कर देते हैं कि उसे किसी दलित ने बनाया है। जाति और धर्म में जकड़ा भारत सुभाष के सपनों का कैसे भारत बनायेगा और कैसे अपने अस्तित्व के लिए हुंकारेगा....उठो, आगे बढ़ो।

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

दीपावली पर सिसकते दीये

दीपों के पर्व दीपावली की चारों ओर धूम मची हुई है। शेयर बाजार आसमान पर चढ़कर हमारी आर्थिक समृद्धि का उद्घोष कर रहा है! सरकारी आंकड़ों की बाजीगAरी से देश की विकास दर बढ़ रही है लेकिन जमीन पर गरीबी अपना तांडव नृत्य कर रही है। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया व अखबार विलासिता के उत्पादों के विज्ञापनों से भरे हुए हैं। कहीं सोने की गिन्नी बिक रही है तो कहीं जड़ाऊ आभूषण। एलसीडी टीवी के साथ ही मंहगे परिधानों की एक से एक बढ़कर दिलकश रेंज है। महंगी कारों की बिक्री के रिकार्ड टूट रहे हैं। अतः दीपावली को देखकर लगता नहीं कि यहां कोई गरीबी है। चारों ओर देखकर मन भ्रमित हो जाता है कि किस प्रकार लक्ष्मी पैसों की मुक्त हस्त से बरसात कर रहीं हैं। इस जगमग और चकाचौंध से परे हटकर हम उन मलिन बस्तियों व गांवों को देखें जहां आज भी दो जून की रोटी के लाले पड़े हैं। गर्मियों में वह प्यासा मरता है क्योंकि उसके पास पानी खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। अब वह ठंड में वस्त्रों के अभाव में जान देगा। दवा-दारू के बिना तो वह हर समय मरता ही रहता है। वैसे भी गरीब की यही नियति है कि वह चाहे अकाल से मरे, बाढ़ अथवा भूकंप से मरे। भूखा मरे या प्यासा मरे। हमारे निजाम को इसकी कोई चिंता नहीं है। अखिर दीवाली का क्या यही संदेश है कि हमस ब घरों की रोशनी को छीनकर अपने घरों में कैद कर लें और इतना पुखता इंतजाम कर लें कि समृद्धि और शांति की एक भी किरण उन मजलूमों के घर नहीं पहुंचे ? आखिर कौन सुनेगा इनकी फरियाद ? अब त्रेता तो है नहीं कि श्रीराम बालि और रावण की भांति गरीबी और भ्रष्टाचार का वध कर दें। द्वापर भी नहीं है कि कृष्ण-कन्हैंया अपनी मुरली की तान से हमारे सारे कष्टों को हर लें। अब जमाना न किसी भगवान का है और न किसी राजा का। प्रजा ही राजा का चुनाव करती है। इतनी शक्तिशाली होने के बाद भी वह आज भूख और लाचारी से क्यों चीत्कार कर ही है। इस प्रश्न पर चिंतन करना होगा कि आखिर गलती कहां हो रही है ? उसके हितों पर डाका कौन डाल रहा है। लगता है कि हमारे नेताओं और समाजसेवियों की प्राथमिकता सूची से गरीब गायब है। तभी तो सारी योजनाओं का लाभ उस वर्ग को मिल रहा है जिसके पास पहले से ही सब कुछ है। ऐसा नहीं है कि हमारी सरकारें इन गरीबों की खुशी के लिए कुछ नहीं कर रहीं लेकिन उस विकास के दीपक को दलालों और भ्रष्ट नौकरशाही ने अपना गुलाम बना लिया है। परंतु अफसोस इस बात का है कि आम लोगों की दीवाली छीनने वाले निर्मम और क्रूरता की पराकाष्ठा पार कर रहे हैं। मिलावट ने इस पर्व को बेरौनक और अपावन बना दिया है। आज लोग देशी घी के दीपक के स्थान पर चर्बी का दीपक जलाने का विवश हैं। सिंथेटिक मिठाइयों से लक्ष्मी-गणेश का भोग लगाने को अभिषप्त हैं। जब तक ऐसे तत्व दीपावली के पर्व को कलंकित करते रहेंगे तो कहां मिटेगा अंधकार। एक बात हम बड़े गर्व से कहते हैं कि वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा के हमीं सर्जक है। अगर है तो वह यथार्थ में क्यों नहीं दिखाई देता। आखिर गरीब कब तक इंतजार करता रहेगा सच्ची दीपावली का। जब उसके यहां ज्ञान, धन और सम्मान की किरणें जगमग होंगी। उसके बच्चे किसी अमीर के बच्चों को पटाखें या फुलझड़ी चलाते बेवसी से नहीं निहारेंगे। वह भी फटे चिथड़ों के स्थान पर नये वस्त्र पहनकर लक्ष्मीजी की पूजा अर्चना करेंगे। वास्तव में सच्ची दीपावली तभी होगी जब हर व्यक्ति खुशहाल होगा। सत्य, अहिंसा, दया, करुणा और मैत्री की धारा बहेगी। हर अंधेरे में दीपक जलेगा और अज्ञान रूपी अंधकार को चीरेगा। मिलावटखोरी का अंत होगा। भ्रष्टाचार का खात्मा होगा। दरिद्र पर नारायण की कृपा होगी। अपमान, सम्मान में बदलेगा। अभाव का सिसकता चेहरा खुशी से दमकेगा। समाज में असमानता के स्थान पर समरसता अपना परचम लहरायेगी।

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

क्या बदलेगी पंचायतों कि तस्वीर

उत्तर प्रदेश के पंचायती चुनावों का पहला चरण आरंभ हो चुका है। जिस ग्राम्य स्वराज्य की परिकल्पना महात्मा गांधी ने की थी। उसी के अनुरूप देश में पंचायती व्यवस्था है। इन चुनावों में काफी जोर-जोर से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाये जा रहे है। धनबल, बाहुबल का खुलकर प्रयोग हो रहा है। इन चुनावों को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का चुनाव माना जाता है। यही कारण है कि गांवों में आपसी रंजिश चरमसीमा पर है। हर गांव में दो-तीन गुट बन गये हैं। लोग मरने-मारने पर उतारू हैं। वह किसी भी तरह पंचायती चुनावों मे ंविजय पताका फहराना चाहते हैं। लेकिन यह लोग इन चुनावों के माध्यम से गांव की दशा और दिशा बदलने के लिए नहीं अपितु अपनी प्रतिष्ठा और सरकार से मिलने वाली भारी-भरकम धनराशि को हड़पने के लिए किया जा रहा है। पहले जब प्रधान का चुनाव सेवाभावना का होता था तो कोई भी सहज प्रधान या पंच बनने को तैयार नहीं होता था। उस समय प्रधान का मतलब फालतू खर्चा यानी बाहर से कोई हाकिम-हुक्काम आये तो उसकी आवभगत, गांव के सुख-दुख में सरोकारी होती थी। बड़ी मुश्ेिकल से किसी सम्मानित और ईमानदार व्यक्ति को ग्रामीण बिना चुनाव के ही अपना मुखिया चुन लेते थे। अब समूचा परिदृश्य बदल गया है। भ्रष्टाचार की गंगोत्री इतनी प्रबल और तेजस्वी ही गई है कि हर कोई इसमें गोता लगाना चाहता है। यही कारण है कि इन चुनावों में प्रधान पद के लिए लाखों रुपये बहाये जा रहे हैं। जिला पंचायतों व क्षेत्र पंचायत सदस्यों को भी जीतने के लिए भारी‘-भरकम धनराशि खर्च करनी पड़ रही है। यह सत्य को सभी जानते हैं कि ब्लाक प्रमुख अथवा जिला पंचायत अध्यक्ष में वही प्रत्याशी सफल होगा जो सदस्यों का बहुमत जुटा लेगा यानी उन्हें मैनेज कर लेगा। ऐसी स्थिति में कल्पना नहीं की जा सकती कि ग्रामों का विकास होगा या उनके प्रतिनिधियों का। काश! गांधी आज जिंदा होते तो ग्रामीण स्वराज्य पर सर धुनते। आखिर पंचायतों ने क्या बदला है गांवों का। जातीय व्यवस्था वहां कट्टरता के साथ हावी है। दबंग व्यक्ति के खिलाफ बोलने की कोई हिम्मत नहीं करता। मिड डे मील से लेकर मनरेगा तक में भारी-भरकम घोटाला हो रहा है। निर्माण के नाम पर कागजों पर काम हो रहे हैं। हां इतना अवश्य है कि चुने हुए प्रतिनिधि कुछ दिनों में अकूत सम्पदा के स्वामी हो जाते हैं। ग्रामीण परिवेश में समाई जातिवाद की खाई और आपसी नफरत के कारण ही डा. अम्बेडकर को दलितों को आह्वान करना पड़ा था कि यदि वे अपना विकास और सम्मान चाहते हैं तो उन्हें गांव छोड़कर शहर आना होगा। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन दलितों ने गांवों से शहरों की ओर पलायन किया। वह पढ़े-लिखे और उन्होंने उच्च पद प्राप्त किये। गांवों की तुलना में उन्हें शहरों में जातिवाद का जहर अधिक नहीं पीना पड़ा। किसी की बेगार और शोषण के शिकार नहीं हुए। अतः पंचायती चुनावों को कोई भी जीते या हारे लेकिन गांवों का कायाकल्प नहीं होगा। इस संदर्भ में हमारे नीति-नियंताओं और बुद्धिजीवियों को चिंतन और मनन करना चाहिए कि आखिर क्या खामी है हमारे पंचायती राज्य की संरचना में जिसमें धनबल और बाहुबल आजादी के बाद आज भी हावी है।

कॉमनवैल्थ खेल - सोने की लंका की लूट

कॉमनवैल्थ खेलों के नाम पर नेताओं और अधिकारियों ने अपना खेल कर लिया। दिल्ली में इस खेल का जश्न इस तरह हुआ कि जैसे भारत विश्व का सबसे अमीर देश है। यहां की जनता खुशहाली का जीवन जी रही है। तभी तो हमने इस खेल पर 70 हजार करोड़ रुपये बेरहमी से खर्च किये। हालांकि इस घपले की गूंज तो इसकी तैयारी के समय से उठी थी। लेकिन राष्टीय सम्मान और स्वाभिमान के नाम पर सबका मुंह बंद कर दिया गया। अब खेल के बाद सरकार के इस मामले की गंभीरता को समझते हुए इसकी जांच पूर्व मुख्य सर्तकता आयुक्त को सौंप दी तो लगा कि सरकार वास्तव में इस घपले के प्रति गंभीर है। अभी जब आयकर विभाग ने भाजपा के दिग्गज नेता के निवास और कारोबार स्थलों पर छापा मारा और 700 करोड़ के घपले की जांच शुरू कर दी है। इस महाघोटाले की छींटे शीला दीक्षित, जयपाल रेड्डी व खेलमंत्री गिल पर भी पड़ रही हैं। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि कांग्रेस के विचारशील नेता मणिशंकर अय्यर ने इन खेलों से पहले ही इसमें हो रहे अनाप-शनाप खर्च की आलोचना की थी। परंतु सरकार के काम पर जूं नहीं रेंगी। अब तब जो कार्रवाइयां चल रहीं है। उससे यह साफ हो गया है कि देश का माल लूटने में सभी दलों के नेता एकजुट हैं। जब खेल में से भी खेल होना इस देश की नियति बन गया है तो क्या होगा इस देश में खेलों का भविष्य ? अब तक के घपले, घोटालों को देखकर देश की जनता को विश्वास नहीं है कि कॉमवैल्थ खेल रूपी सोने की लंका को लूटने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

प्राथमिक शिक्षकों की होगी पात्रता परीक्षा

प्रदेश के शिक्षा माफियाओं की नींद उड् गई है कि अब उनका मुनाफाखोरी और नकल का धंधा मंदा पड् जायेगा क्‍योंकि बी.एड. और बीटीसी स्‍कूल के मालिकों ने इस धंधे में अकूत सम्‍पत्ति अर्जित कर ली है। अगर यह मामला उत्‍तर पद्रेश से सम्‍बंधित होता तो शिक्षा माफिया अपने मकसद में कामयाब हो जाता लेकिन यह मसला केन्‍द्रीय सरकार के मानव संसाधान मंत्रालय के अंतर्गत है।
नेशनल काउंसिल फॉर टीचिंग एजूकेशन यानी rashtriy अध्यापक शिक्षा परिषद ने प्राइमरी शिक्षा के विकास और गुणवत्ता के लिए प्राइमरी तथा उच्च प्राइमरी शिक्षकों की भर्ती के लिए राष्टीय पात्रता परीक्षा (टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट) को पास करना अनिवार्य कर दिया है। इस परीक्षा को पास किये बिना देश के किसी सरकारी प्राइमरी स्कूलों में आगामी सत्र से कोई शिक्षक भर्ती नहीं होंगे। परिषद इस बारे में इस परीक्षा के लिए आवश्यक तैयारी कर रहा है। देर से ही सही सरकार की निगाह में यह बात तो आई कि देश विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की प्राइमरी शिक्षा में निरंतर गिरावट हो रही है। इस सच्चाई से सभी परिचित हैं कि जबसे सरकार ने बी.एड. उपाधिधारकों को विशिष्ट बीटीसी प्रशिक्षण देकर प्राइमरी टीचर्स के रूप में नियुक्ति की प्रक्रिया अपनाई है। तभी से प्राइमरी शिक्षा में गिरावट आरंभ हो गई। मेरिट के नाम पर इनका चयन होता है। इसी कारण प्रदेश में हाईस्कूल और इंटर परीक्षाओं में नकल माफिया का प्रादुर्भाव हुआ। निजी कालेज और विश्वविद्यालयों में इजाफा हुआ। कारण स्पष्ट है कि आप पैसे देकर जितने चाहों उतने नम्बर प्राप्त कर सकते हो। सरकारी बी.एड. कालेजों में मुश्किल से मेधावी छात्रों को प्रथम श्रेणी मिलती है जबकि निजी कालेजों में 80-90 फीसदी नम्बर मिलना सामान्य बात है। इसीलिए रातोंरात निजी हाईस्कूल, इंटर तथा निजी डिग्री कालेज करोड़पति हो गये। कई सरकारी औेर गैर-सरकारी सर्वेक्षण में यह तथ्य उभर कर आया कि अधिकांश प्राइमरी शिक्षकों को अपने विषय की जानकारी ही नहीं है। वह बच्चों को किस तरीके से पढ़ायें। इससे वह अनभिज्ञ हैं। इसी प्रकार कान्वेंट और पब्लिक स्कूलों से पढ़े लोग अपने अधिकतम प्राप्तांकों के कारण प्राइमरी शिक्षक बन गये जबकि बेसिक शिक्षा की अवधारणा व शिक्षा-शिल्प से ही वह परिचित नहीं हैं। छठवें वेतन आयोग की सिफारिशों से प्राइमरी शिक्षकों के वेतन में कई गुना बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन उसके कई गुना बेसिक शिक्षा में गिरावट आई है। प्राइमरी शिक्षकों के लिए आवश्यक अर्हता प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों को अब राष्टीय पाात्रता परीक्षा देनी होगी। विदित रहे कि इन पदो ंके लिए आवश्यक योग्यता बीटीसी है। यही कारण है कि प्रदेश में जिन लोगों ने बी.एड. की मान्यता ली थी। अब वह शिक्षा माफिया बीटीसी की मान्यता भी ले आये हैं। बी.एड. की तरह यहां भी लाखों रुपये में दाखिले हो रहे हैं। टीईटी होने से उन्हें भी बीटीसी की शिक्षा की गुणवत्ता पर अधिक ध्यान देना होगा क्योंकि परीक्षाएं राष्टीय अध्यापक शिक्षक परिषद के दिशानिर्देशें के अनुसार होंगी। उसमें पास होने पर ही उन्हें बेसिक स्कूलों में शिक्षक की नौक्री मिलेगी। सरकार के इस कदम से प्राइमरी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा तथा नकल व शिक्षा माफियाओं के हौंसले नेस्तनाबूद होंगे। अब इस क्षेत्र में योग्य ही लोग शिक्षक बन पायेंगे। अगर उन्होंने जोड़-तोड़ या नकल माफिया के माध्यम से उच्चतम अंक प्राप्त करके प्राइमरी शिक्षक बनने की गारंटी ले ली है, उन्हें हताशा का सामना करना पड़ेगा। सरकार के इस कदम से देश में प्राइमरी की शिक्षा में गुणात्मक व सकारात्मक परिवर्तन आयेगा तथा जब हमारी प्राथमिक शिक्षा की बुनियाद मजबूत होगी। इससे इन स्कूलों में पढ़े मेधावी छात्र उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसर होंगे।

शनिवार, 18 सितंबर 2010

भाजपा पर संघ की लगाम

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा को चेताया है कि उसकी ताकत केवल राम मंदिर आंदोलन से ही बढ़ी है। उसके अनदेखी उसके लिए महंगी पड़ सकती है। यह बयान देकर संघ प्रमुख ने स्पष्ट कर दिया कि अगर भाजपा चलेगी तो उस पर संघ की लगाम होगी। अब वह दिन हवा हो गये जबकि अटल और आडवानी संघ के इशारों और निर्देशों की अनदेखी कर देते थे। शायद इसीलिए संघ के इशारे पर नितिन गड़करी जैसे स्थानीय नेता को भाजपा की कमान सौंपी जिससे वह अपनी औकात में रहकर संघ के निर्देशों का अक्षरक्षः पालन कर सकें। संघ प्रमुख की बात से यह तो स्पष्ट हो गया कि भाजपा संघ की राजनीतिक विंग है। वह अपने एजेंडे को भाजपा के माध्यम से लागू करना चाहता है। अतः उन लोगों की आंखें खुल जानी चाहिए जो यह कहते हैं कि संघ और भाजपा अलग अलग हैं। जब हम संघ को साम्प्रदायिक मानते हैं तो भाजपा को साम्प्रदायिक मानने में कोई बुराई नहीं है। आखिर भाजपा को स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है। उसके अधिकांश संगठन मंत्री संघ के प्रचारक हैं। इसके अतिरिक्त अपवादों को छोड़कर अधिकांश नेता नेकरघारी हैं। कितने अफसोस की बात है कि भाजपा अपने जन्म से आजतक स्वतंत्र दल नहीं बन पायी तथा उसपर संघ का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। वैसे भी भाजपा की न तो कोई नीति है और न ही सिद्धांत। उसका न तो कोई स्वतंत्र दर्शन है और न ही नीति। संघ के इशारे पर ही उसकी नीति और सिद्धांत तय होते हैं। उसकी नियति एक स्वतंत्र दल की न होकर संघ की चेरी की बन गई है। गाहे बगाहे संघ नेता फरमान जारी करते रहते हैं कि भाजपा को यह करना चाहिए और यह नहीं। ऐसी स्थिति में इस लोकतांत्रिक देश में भाजपा कैसे अपने स्वतंत्र स्वरूप को बनाए रख सकती है। वैसे भी भाजपा ने अपनी अलग पहचान के लिए चाल, चरित्र और चेहरे का नारा दिया था। वह अब खोखला साबित हो चुका है। न तो उसकी चाल स्पष्ट है और न ही चेहरा। जहां तक चरित्र की बात है तो उसका चरित्र सत्तान्मुखी हो गया है। किसी भी मुद्दे पर जनांदोलन करने का उसका बूता नहीं है। पहले लोग भाजपा को केन्द्र में विकल्प के रूप में देखते थे। परंतु उसके क्रियाकलापों से जाहिर हो गया कि वह अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है। अगर भाजपा पर संघ की छाया नहीं हटी। संघ नेताओं की भाजपा की दैनंदिनी राजनीति में इसी प्रकार दखलंदाजी चलती रही तो निश्चित है कि भाजपा अपना राजनैतिक दल का स्वरूप खो सकती है। युवा पीढ़ी भाजपा में आने से कतरा रही है। पुरानी पीढ़ी या तो थक गई है या उसका भाजपा से मोहभंग हो गया है। भाजपा का कश्मीर में धारा 370, समान नागरिक संहिता आदि मूल विचारधारा सत्ता की धारा में प्रवाहित हो चुकी है। राम मंदिर भी उसके लिए साध्य न होकर साधन मात्र रह गया है। देश की अर्थ, कृषि, खेल व युवा नीति के बारे में उसके विचार स्पष्ट नहीं है। आरक्षण के मुद्दे पर उसकी स्थिति शुतुरमुर्ग की है। जब उसकी नीतियां और नीयत ही स्पष्ट नहीं है तो भविष्य में भाजपा की क्या दुर्दशा होगी। यह इतिहास के गर्भ में है। भाजपा को देश की मजबूत और केन्द्र की विकल्प पार्टी बनने के लिए संघ की छाया से मुक्त होना पड़ेगा। अपनी नीति और अपने सिद्धांत तय करने होंगे। नागपुर की अपेक्षा दिल्ली के फरमानों को प्राथमिकता दी जायेगी तथी भाजपा बच पायेगी।