
हिंदी साहित्य की लोकप्रिय विधा गीत ने हमेशा से ही लोगों को आल्हादित और प्रफुल्लित किया है। इसके माध्यम से मानवीय संवेदनाएं अधिक प्रभावी ढंग से मुखर हुई हैं। गीत ही वस्तुतः साहित्य की आत्मा है। डा. राजकुंमार रंजन देश के ऐसे गीतकार हैं जो मंच और प्रकाशन के क्षेत्र में अग्रणी हैं। यहां प्रस्तुत कर रहे हैं उनके दो लोकप्रिय गीत।
हम सुमन सर्जना वाले हैं
हम सुमन सर्जना वाले हैं श्रम के कांटे रखवाले हैं।
गंधायित होते वन-उपवन हम जीवन देने वाले हैं।।
हम जब तक जीते, तीते हैं सारी पीड़ाएं पीते हैं
हम कुंठाओं से दूर-दूर हम भ्रमजालों से रीते हैं
हमने समता के बीज दिए हमने हंसने का दिया मंत्र
हम शाश्वत मूल्यों के वाहक हमने खिलने का दिया तंत्र
हम खिलते धूप-चांदनी में हम नित संघर्षों वाले हैं।
गंधायित होते वन-उपवन हम जीवन देने वाले हैं।।
हमसे वन की शोभा होती शोभा होती उपवन-उपवन
हम खिलते खेत-खेत क्या हम खिलते हैं घर-घर आंगन
हमसे पूजा के थाल सजे हम शरण रहे हैं प्रभुवर की
सीता माता के हाथ बढ़े जयमाल बने हम रघुवर की
हम प्रेम-डोर में बंधे हुए पावन प्रेमी मतवाले हैं।
गंधायित होते वन-उपवन हम जीवन देने वाले हैं।।
हम खिलते तो खिल जाय धरा हम पर न्यौछावर रहा गगन
हम कोमलता के र्प्यायी दृढ़ता से आपूरित जीवन
हम प्रेरक हैं उस जीवन के जिसमें भरपूर जवानी हो
हम प्रेरक हैं उस जीवन की जिसकी मधुमयी कहानी हो
हम हैं बंसत के आकर्षण कवि के उपमान निराले हैं।
गंधायित होते वन-उपवन हम जीवन देने वाले हैं।।
हम जो भी देते देते हैं जग से ेन कभी कुछ लेते हैं
लेना-देना जग का क्रम है हम प्रकृति-पुरुष के बेेटे हैं
हम हैं उस के महासिंधु हमज न-जन की अभिलाषा हैं
हम चिरगंधों के सागन हैं हम रंगों की परिभाषा है
रस, रूप, रंग हमसे ले लो हम दिव्य सुदर्शन वाले हैं।
गंधायित होते वन-उपवन हम जीवन देने वाले हैं।।
गीत गाने से ....................
गीत गाने से नहीं अब काम चलता।
जी चुराने से नहीं अब काम चलता।।
बहुत गाये गीत कुछ अन्तर नहीं है
हार पाये जीत कुछ गुरुतर नहीं है
अब गुजरना ही पड़ेगा सूर्य-पथ से
अब सम्हलना ही पड़ेगा कर खड्ग ले
शर पुराने से नहीं अब काम चलता।
गीत गाने से नहीं अब काम चलता।।
कुछ लगा कर आग कोसों दूर भागे
ऐंठ अपना भाग मद में चूर भागे
श्रोक देना ही पड़ेगा स्वार्थ-रथ को
धर जकड़ना ही पड़ेगा रक्त-ध्वज को
अश्रु ढाने से नहीं अब काम चलता।
गीत गाने से नहीं अब काम चलता।।
मौन कब तक जी सकोगे यह बता दो ?
रैन कब तक पी सकोगे यह सुना दो ?
अब प्रलय की रश्मि को लाना पड़ेगा
क्रूरतम वीभत्स को जाना पड़ेगा
तिलमिलाने से नहीं अब काम चलता।
गीत गाने से नहीं अब काम चलता।।
लोग सपनों की नई दुनिया बसाते
पर सृजन के नाम कोसों दूर जाते
सत्य है यह व्याल घर में ही पले हैं
मुख कुचल दो ऐंठ कर लगते भले हैं
पय पिलाने से नहीं अब काम चलता।
गीत गाने से नहीं अब काम चलता।।
अरे परिहार साहब बहुत बहुत धन्यवाद। डॉक्टर साहब की कविताओं को पहली बार आपके सौजन्य से पढ़ रहा हूं। बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति। वाह क्या कहने। उम्मीद है आगे भी इस ब्लॉग पर डॉक्टर साहब और अन्य लोगों की रचनाएं पढऩे को मिलती रहेंगी। एक बार फिर शुक्रिया।
जवाब देंहटाएंhttp://udbhavna.blogspot.com/
nice
जवाब देंहटाएंदोनों ही रचनाएँ बहुत बढ़िया लगीं.
जवाब देंहटाएं