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सोमवार, 19 जुलाई 2010

पगला गया है आगरा



लगता है कि आगरा पगला गया हैहो सकता है कि यह पागलखाने का असर होपरन्तु यह नहीं हो सकता ? फिरयह क्या हैसमझ के बाहर हैइस समय आगरा में जोर शोर से एक ही कार्यक्रम चल रहा हैकलर्स चैनल के चकधूम धूम और सोनी चैनल के इंडियन आइडियल में जीतने वालों को धडाधड एस ऍम एस भेजने काअखवारों मेंइस बावत विज्ञापन छापे जा रहें हैंयहाँ होने वाले हर कार्यक्रम में मेसेज भेजने का अनुरोध किया जा रहा हैआगरा के कुछ छपास प्रेमी और प्रतियोगियों की जाति वाले इस मुहिम में विशेष रूप से लगे हुए हैआश्चर्य तो इसबात का है कि इस मुहिम में आगरा के प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल हो गए हैंयह मुहिम चैनल और मोबाईलकंपनी को मालामाल करने के लिए चलाई जा रही हैआगरा की साहित्य और संस्कृति व् कला में विशिष्ट पहचानरही हैइस तरह के उछल कूद वाले नाच की प्रतियोगिता के लिए हम क्यों पगला रहे हैंअगर कोई जीत भी गयातो क्या होगाअभी विगत माह आगरा के ही साहित्यकार डाक्टर लाल बहादुर सिंह चौहान को शिक्षा और साहित्यमें पद्मश्री की उपाधि से अलंकृत भारत की राष्ट्रपति महामहिम प्रतिभा पाटिल ने कियाशायद ही यहाँ के लोगों नेउनका जोरदार सम्मान किया होअफ़सोस इस बात का है कि चैनल्स के माल मारो अभियान में हमारे शहर केकथित समाजसेवी, राजनेता और प्रबुध्य भी लोग शामिल हो रहे हैइन लोगों का लक्ष्य लाखों एस एम एस करानेका हैयह भी प्रचार किया जा रहा है कि एक सिम से ९० मेसेज भेजे जा सकते हैंइस तरह चैनल्स और मोबाइलकंपनियों को करोड़ों का फायदा होगा और हम बेकार में ही उनके झांसे में रहे हैंलोगों को याद होगा कि पहले स्टार प्लस चैनल पर कौन बनेगा करोडपति शो आया था जिसमे चैनल और फ़ोन कंपनियों ने दसियों करोड़कमाएआखिर हम कब तक बाज़ार के शिकार बनते रहेंगे.

शनिवार, 17 जुलाई 2010

भविष्य जानने की उत्कंठा क्यों ?

अभी फुटबॉल विश्वकप ने ज्योतिष को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। स्पैन के विजेता बनने पर उसकी हर जगह जयजयकार हो रही है। लेकिन जर्मनी में उसके खिलाफ विरोध के स्वर भी गूंज रहे हैं। आखिर एक जलजीव ने ऐसा कर दिखाया जो हमारे बड़े से बड़े ज्योतिषी भी करने में संकोच करते हैं। अतः ज्योतिष की भारत के बाहर भी पुर्नस्थापना हो रही है। लेकिन वास्तव में ज्योतिष क्या है। ? इसकी भविष्यवाणियों का क्या पैमाना है। यह सिर्फ अटकलबाजी है अथवा कोई विज्ञान। इस संदर्भ में आम आदमी भी ज्योतिषियों से अपने भविष्य के बारे में जानना चाहता है। वस्तुतः हर आदमी अपने अतीत को भूल जाना चाहता है और भविष्य की ओर देखता है। इसी भविष्य निर्माण के लिए वह मेहनत, अध्ययन और कर्म करता है। परंतु सवाल पैदा होता है कि क्या उसे अपने कर्म पर विश्वास नहीं है जो अपने भविष्य के लिए चिंतित रहता है। हमारे विद्वानों ने लिखा भी है कि कर्म का लेख मिटे न रे भाई। फिर वह लेखे को मिटाने के लिए ज्योतिष की शरण में क्यों जाता है।
ज्योतिष हमेशा से ही कुछ लोगों के लिए कमाई का जबर्दस्त साधन रहा है। कुछ लोग बैल के माध्यम से भविष्य बताते हैं तो कुछ कुत्ते के माध्यम से। सड़कों पर तोतों के माध्यम से भी भविष्य की जानकारी दी जाती है। क्योंकिमनुष्य स्वभाव से जिज्ञासु होता है। वह अपने भावी जीवन के बारे में जानना चाहता है। इसीलिए वह इन कथित ज्योतिषियों के षरण में चला जाता है। वैसे कर्म का बीज कभी बंजर नहीं होता। हमारे कर्मों से ही भविष्य का निर्माण होता है। हमें अतीत को भूल जाना चाहिए। भविष्य की चिंता नहीं करनी चाहिए और वर्तमान को सुखद बनाने का प्रयास करना चाहिए। तभी भविष्य सुखद हो सकता है। भविष्यवाणी करने के लिए गहन अध्ययन और मनन की जरूरत पड़ती है। लेकिन यह पुरातन विद्या भी व्यापार का रूप धारण कर चुकी है। ऐसे परिवेश में सही निष्कर्ष निकलना असंभव सा लगता है। वस्तुतः ज्योतिष एक विज्ञान है और उसके लिए ग्रह, नक्षत्र आदि की सटीक गणना आवश्यक है। कुछ कथित भविष्यवक्ता का तीर में तुक्का लग जाता है और वह लोकप्रिय हो जाते हैं। वैसे भविष्य की चिंता कर्महीन लोग ही करते हैं। हो सकता है कि उनका वर्तमान दुखद हो जिससे वह भावी सुखद जीवन की कल्पना के वशीभूत होकर अपना भविष्य जानने की उत्कंठा रखते हों।
भविष्य के प्रति हर व्यक्ति का उत्कंठित रहना स्वाभाविक ही है। वह अपना, अपने परिवार, समाज व देश का भला चाहता है। इसी के वशीभूत होकर वह भविष्य के प्रति जानने की इच्छा के कारण ज्योतिषियों के पास जाता है। लेकिन ज्योतिष खगोलीय विज्ञान है। सूर्य और चद्र पर आधारित हमारा ज्योतिष पूर्णतः वैज्ञानिक है। लेकिन भविष्यवाणी करना असाध्य कार्य है। हां इतना अवश्य है कि कथित ज्योतिषियों ने कुछ फंडे ईजाद कर लिए है। जिनसे वह मरीज, वृद्ध, महिलाओं व व्यापारियों का दोहन करते हैं। हां कुछ लोग भविष्य की परवाह नहीं करते। लेकिन इससे उनके भविष्य पर कोई दुष्प्रभाव भी नहीं पड़ता। हर व्यक्ति के जीवन पर नक्षत्र और राशियों का प्रभाव पड़ता है। जब बच्चा मां के गर्भ से बाहर आता है तो उस पर खगोलीय किरणें पड़ती हैं। नक्षत्रों के आधार पर ही जन्मकुंडली बनाई जाती है। इसमें समय का बहुत महत्व है। लेकिन ज्योतिषीय गणना दुरूह और असाध्य साधना है। धंधेबाज लोगों के पास इतना समय ही नहीं होता कि वह कठोर साधना करें। इसीलिए ऐसे लोगों के ज्योतिषीय परिणाम असफल रहते हैं। यह वस्तुतः दैवीय विधा है जो निरंतर साधना और तपस्या मांगती है।
आज का हर आदमी सुख-साधन की कामना में रत रहता है। वह चाहता है कि सारी दुनियां के सुख साधन उसके पास हों। इसीलिए वह भविष्य के सपने देखता है। पहले आदमी संतोषी होता था। वह भाग्यवादी भी था। लेकिन बदलते परिवेष में उसका मन चलायमान हो गया है। अमीर देशों में लोगों को भविष्य को जानने की चिंता नहीं रहती क्योंकि उनके पास सब कुछ है। वह जब चाहे अपनी इच्छा पूरी कर सकता है। लेकिन गरीब और अभावग्रस्त लोग भविष्य की ओर टकटकी लगाये रहते हैं कि शायद उनके दिन पलट जायें। भविष्यवाणी का प्रतिफल 70 से 80 फीसदी होता है। किसी भी विषय पर अचूक भविष्यवाणी संभव नहीं है। लेकिन इन बातों को हमारे व्यापारी ज्योतिषी हवा दे रहे हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य लोगों से धन ऐंठना रह गया है। ज्योतिष में यह लोग व्यापारी जैसा हर हठकंडा अपनाते हैं। जबकि ज्योतिष विज्ञान है। इसके लिए गहन अध्ययन की आवष्यकता होती है। जब ज्योतिषियों के पास अपने क्लाइंटों से ही फुर्सत नहीं है तो वह सही गणना कैसे करते होंगे। मेरी समझ के बाहर है। भविष्य को बदलने की किसी के पास क्षमता नहीं होती। ईश्वर के विधान में कोई दखलंदाजी कर ही नहीं सकता। हां इतना अवश्य है कि अच्छा ज्योतिषी भावी जीवन के कुछ संकटों को उदार बना सकता है। वह भी डाक्टर की भांति केवल मार्गदर्शक है। भविष्य के लिए उत्कंठा होना स्वाभाविक ही है। आदमी चेतनशीलहोता है। वह चाहता है कि उसका भविष्य अतीत और वर्तमान से अच्छा हो। यही उत्कंठा उसे खींचकर ज्योतिषियों के पास ले आती है। ज्योतिष कि दुकानी इस तरह खुल गयी हैं कि हर शहर में बैल और कुत्ते को लेकर कुछ लोग भविष्य बताते हैं। जानवरों में सूंघने की क्षमता अधिक होती है। अतः वह जिस मुट्ठी में कुछ होता है। उस पर अपना मुंह अथवा पैर लगा देता है।

परिकल्पना ब्लॉगोत्सव 2010 के श्रेष्ठ लेखक व लेखिका


हिंदी ब्लॉगिंग अपने परवान पर है। इसने भी अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में अपनी पहचान बना ली है। ब्लॉग लेखन में अद्वितीय योगदान के लिए इस उत्सव में पुणे की श्रीमती सरस्वती प्रसाद को वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका तथा भोपाल के रवि रतलामी उर्फ रविशंकर श्रीवास्तव को श्रेष्ठ लेखक के रूप में पुरस्कृत किया गया। वस्तुतः हिंदी ब्लॉग की लोकप्रियता काफी बढ़ी है। कई रचनात्मक लेखकों और कवियों ने इसे समृद्ध बनाया है।
ब्लॉग ‘मैं और मेरी सोच‘ सरस्वती प्रसाद का है। इस ब्लॉग का परिचय इन पंक्तियों में समाहित है। ‘‘सुंदरता एक ऐसा चित्र है, जिसे तुम आंख बंद करने के बाद भी देख लेते हो और कान बंद करने के बाद भी सुन लेते हो.....ठीक उसी तरह कल्पनाओं की धरती अपनी हो जाती है, जब हमारे हाथ में कलम हो तो...............
सरस्वती प्रसाद के इस ब्लॉग में अधिकांश कविताएं ही हैं। लेकिन उन्हें संस्मरण पर पुरस्कार मिला है। ब्लॉग पर उनकी कविता-
दो निगाहों के लिए,
दो नयन भटके हर कहीं
पर न पाया ठौर
अपना भी बना कोई नहीं
अब ये क्या अपनाती
जब जा रही बरात है...........
क्या अनौखी बात है

उनकी पोस्ट संस्मरण-प्रश्नों के आइने में, मैं उन्होंने अपने जीवन के अछूते पहलुओं पर प्रकाश डाला है। इसमें उन्होंने सुमित्रानंदन पंत के पत्र का भी जिक्र किया है जो उन्हें लिखा गया। बचपन की सुखद अनुभूतियों से यह आलेख सराबोर है। ब्लॉगर की एक पुस्तक ‘नदी पुकारे सागर‘ प्रकाशित हो चुकी है।
श्रेष्ठ लेखक के रूप में पुरस्कृत रवि रतलामी चिट्ठा जगत का जाना-पहचाना नाम है। उनके दो ब्लॉग ‘‘रचनाकार तथा छींटें और बौछारें हैं। रचनाकार वस्तुतः ब्लॉग पत्रिका लगती है जिसमें विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं प्रकाशित होती हैं। इस प्रकार इसे रचनाकारों का साक्षा मंच भी कहा जा सकता है।
छींटें और बौछारें अपने आप में हिंदी का संपूर्ण ब्लॉग है। ब्लॅाग के परिचय में ‘‘टेड़ी दुनियां पर रवि की तिर्यक रेखाएं‘‘ अपने आप में बहुत कुछ कह जातीं हैं। ब्लॉग में कई लेबल यथा व्यंग्य, तकनीकी, विविध, हिंदी के तहत रचनाएं पोस्ट की गई हैं। जिस प्रकार चिट्ठाकार लेखन में सिद्धहस्त है उसी प्रकार उसके कैमरे की निगाहें भी काफी तीक्ष्ण हैं।
चित्रावली में उनके द्वारा पोस्ट फोटो बोलते प्रतीत होते हैं। उनका कैमरा वहां पहुंच जाता है जहां शब्द विवश हो जाता है। देश-दशा पर व्यंग्यात्मक दृष्टि ही उनक लेखन की विशेषता है। शिक्षा-रोजगार का जन्मसिद्ध अधिकार है, इसके अंतर्गत एक बच्चे को सिर पर टोकरी लिए मजदूरी करते दिखाया गया है। इसी प्रकार पार्किंग पर चलती जिंदगी, चटाई घड़ी, पुरातत्व इमारतों की जर्जर स्थिति आदि फोटो प्रभावित करने के साथ हमारी व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करते प्रतीत होते हैं। उनकी गजल की बानगी दृष्टव्य है-
देश तो साला जैसे सुबह का अखबार हो गया
वे तो एक नोवेल था कैसे अखबार हो गया

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

प्रदेश में अपराधियों का बोलवाला

प्रदेश में जब सुश्री मायावती कुर्सी पर आसीन हुईं थीं तो लोगों ने चैन की सांस ली थी कि अब गुंडागर्दी कम होगी और आम लोगों को शांति के साथ रहने का मौका मिलेगा। लोगों का सोचना भी सही था कि क्यों सुश्री मायावती ‘‘चढ़ गुंडों की छाती पर, बटन दबेगा हाथी पर‘‘ के नारे के साथ सपा शासन में व्याप्त गुंडागर्दी के खिलाफ जीतकर सत्ता में आईं थी। लेकिन अब लगता है कि हाथी ही गुंडों के चक्कर में फंस गया है। प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति निरंतर खराब होती जा रही है। अपराधियों के हौंसले बुलंद हैं। दिन दहाड़े हत्या, लूट और अपहरण का दौर जारी है। महिलाओं का घर से निकलना मुश्किल हो गया है। एक महिला के शासन में महिलाओं की इज्जत भी सुरक्षित नहीं है। क्या प्रदेश की स्थिति ऐसी रहेगा अथवा उसमें कोई सुधार आयेगा। फिलहाल इतना तो निश्चित है कि अपराधियों में सत्ता की हनक समाप्त हो गई है। शरीफ आदमी अपनी जान-माल की सुरक्षा के लिए विवश नजर आता है।
कभी राजनीति में तपे तपाये लोग आते थे। उनकी भावना समाज और देश की सेवा करने की होती थी। लेकिन अब तो राजनीति में अपराधी तत्वों की भरमार हो गई है। सफेदपोश अपराधी भारी संख्या में राजनीति में आ गये हैं। इनको अपने स्वार्थ के लिए सत्ताधारी दल का दामन थामना पड़ना है। यही कारण है कि प्रदेश में गुंडागर्दी और अपराध चरमसीमा पर है। अगर राजनीति में अपराधियों का प्रवेश बंद हो जाये तो अपराध स्वतः ही समाप्त हो जायेगा।
जिस पुलिस पर प्रदेष में कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी हैं वही अपने काम को सही तरीके से अंजाम नहीं दे रही है। पुलिस कर्मी और अधिकारी जनता की सेवा की अपेक्षा कमाई में लगे रहते हैं। जिससे अपराधियों के हौंसले बुलंद हैं। पुलिस में ईमानदार लोग भर्ती हों। तभी गुंडागर्दी पर रोक लग पायेगी। षासन किसी का हो लेकिन पुलिस वही रहेगी। अतः पुलिस व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन जरूरी है। सरकार को भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और ईमानदार पुलिस कम्रियों को प्रोत्साहन देना होगा।
पहले लोग संतोषी होते थे। लेकिन अब वह स्थिति नहीं है। हमारी दिशाभ्रमित युवा पीढ़ी अपराध में बढ़-चढ़कर योगदान दे रही है। उनको पीने के लिए बीयर या शराब चाहिए। पहनने के लिए ब्रांडेड कपड़े और जूते चाहिए। महंगे मोबाइल और बाइक चाहिए। इन सबके लिए अनाप-षनाप पैसा अपराध के जरिये ही आ सकता है। हर जगह ऐसे युवा मिल जायेंगे कि कुछ काम-धंधा किये बिना हजारों रुपये रोज खर्च करते हैं। ऐसे तत्वों पर निगरानी रखी जानी चाहिए।
एक तरफ तो आम आदमी महंगाई की वजह से परेशान है। दूसरे निरंतर बढ़ते अपराधों ने उसका जीना हराम कर दिया है। इस व्यवस्था में गरीब का ही मरना है। उसकी बिना पैसे न पुलिस में रिपोर्ट लिखी जाती है और न ही अपराधी उसपर रहम खाते हैं। किसी गरीब के घर चोरी से उसका पूरा घर भुखमरी का शिकार हो जाता है। गुंडागर्दी का शिकार गरीब ही अधिक होते हैं। सरकार को इस ओर कड़ाई से पेश आना चाहिए।
वस्तुत प्रान्त की कानून व्यवस्था लचर हो गई है। सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा है। आम आदमी की तो औकात ही क्या है। सरकार के मंत्री भी सुरक्षित नहीं है। गुंडों पर कोई लगाम नहीं है। क्योंकि वही पैसा खर्च करते और कमाते है। सभी राजनैतिक दलों में अपराधियों की भरमार हो गई है। पूरा प्रदेश मिलावटखोरी, भ्रष्टाचार, हत्या, लूट से त्राहि-त्राहि कर रहा है और बहनजी आराम से कुर्सी का मजा ले रहीं हैं। उन्हें याद रखना चाहिए कि लोगों ने उन्हें गुंडागर्दी के खिलाफ ही वोट दिया था।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

इलाज का मकड़जाल-मरीज़ बेहाल

पूर्ण समन्वित


हमारी चिकित्सा व्यवस्था मकड़जाल सी बन गई है। हर डाक्टर और अस्पताल के अपने तरीके हैं इलाज करने के। हर बीमारी का अलग-अलग रेट है। शायद इसीलिए बीमा कम्पनियों ने मेडिक्लेम पॉलिसी की कैशलैश व्यवस्था का कुछ दिन पहलने अलविदा कह दिया था। परंतु अस्पतालों के संचालकों से आपसी वार्तालाप में यह मामला सुलझ गया लगता है। अतः अब पुनः बीमाधारकों को इस तरह के इलाज की सुविधाएं उपलब्ध होंगी। वास्तव में देखा जाये तो चिकित्सा जैसा सेवा का पेशा विशुढ्य व्यापार में बदल गया है। हर बीमारी के लिए कई तरह के टेस्ट हैं। यह टेस्ट या तो अस्पतालों में मनमानी दरों पर होते हैं अथवा डाक्टरो को जहां से अच्छा खासा कमीशन मिलता है। वहां मरीज को कराने की सलाह दी जाती है। चिकित्सा के मकड़जाल से लोगों का निकलना मुश्किल लग रहा है। अभी खबर आयी थी कि एम्स में आपरेसन के लिए वेटिंग साल से अधिक है। इसका मतलब यह हुआ कि आम आदमी को चिकित्सा रूपी व्यापारियों की शरण में जाना पड़ेगा और उनकी मनमानी दरों पर इलाज करवाना होगा। संभवतः बीमा कंपनियों ने कैशलैश चिकित्सा की सुविधा इसीलिए वापस ली थी कि कुछ अस्पताल मनमाने तरीके से फीस वसूल रहे हैं। बीमारियों के इलाज के दरें इन अस्पतालों में अलग-अलग है। कुछ बेमतलब के टेस्ट भी किये जाते हैं। उनकी भरपाई भी बीमा कंपनियों को करनी पड़ती है। अब शायद अस्पताल संचालकों ने बीमा कंपनियों को चिकित्सा दरों की एकरूपता का आश्वासन दे दिया है। चिकित्सा बीमा धारकों के अतिरिक्त देश की सर्वाधिक आबादी सीधे डाक्टर अथवा अस्पताल में इलाज कराने जाती है। वहां उसकी किस तरह हजामत बनाई जाती है। किसी से छिपा नहीं है। उनके इलाज से मरीज अच्छा हो या न तो लेकिन उसके तीमारदारों की तबियत जरूर बिगड़ जाती है। नाना प्रकार के टेस्ट होते हैं। इनकी फीसें इतनी अधिक होती हैं कि आम आदमी देने में असमर्थ रहता है। लेकिन सवाल मरीज की जिंदगी का होता है। इसीलिए वह कर्ज लेकर, मकान अथवा खेत को गिरवीं रखकर डाक्टरों व अस्पतालों के मालिकों का मुंह बंद करता है। इस चिकित्सा से जुड़े लोगों में से कुछ लोग तो इतने क्रूर है कि मरीज के मरने से पहले ही सारा हिसाब-किताब बराबर कर लेते हैं। अपनी फीस के लिए मरे मरीज को वेंटीलेटर के सहारे जिंदा दिखाकर भरपूर कमाई करते हैं। इस ओर सरकार को स्पष्ट नीति बनानी होगी। हर बीमारी के इलाज तथा टेस्ट की दरें निर्धारित करनी होंगी। इसी प्रकार डाक्टरों की आपरेशन फीस, विजिट फीस व परामर्श फीस भी निर्धारित करनी होगी। उनकी फीसों का जिला स्तर पर पर्याप्त प्रचार-प्रसार होना चाहिए जिससे मरीज और उसके तीमारदार लुटने से बच सकें।

जातिवाद कहाँ समाप्त हुआ



हमारे बहुत से कलमघिस्सू और कथित राजनेता और समाजसेवी अक्सर चिल्लाते हैं कि देश से जातिवाद समाप्तहो गया है उन लोगों की आँखें उत्तर प्रदेश में मिड डे मील के मामले से खुल जानी चाहिए सरकारी आदेशानुसार जिस स्कूल में २५ से ५० तक बच्चे होंगे वहां खाना बनाने की जिम्मेदारी दलित महिला की होगी दलित के हाथ का बना हुआ खाना खाने के खिलाफ सवर्ण लोग खुलकर मैदान में गए हैं और तो और इस मुहिम में टीचर भी शामिल बताये जाते हैं जब हम अपने बच्चों को ही जातिवाद का पाठ सिखा रहे हैं तो जातिविहीन समाज की परिकल्पना कैसे की जा सकती है इस सत्य को मानना होगा की देश में जातिवाद की जड़ें काफी गहरी हैं और उसे केवल सरकारी आदेश से नहीं बदला जा सकता समाज भी बदलने को तैयार नहीं है जब हमारे खून में ही जातिवाद कूट कूटकर भरा हुआ है तो उसे कैसे दूर किया जा सकता है. क्या इस बवाल से दलितों में यह पीड़ा नहीं होगी कि आज़ादी के कई दशक के बाद भी हमसे नफरत की जा रही है इस मामले तो यदि जल्दी हल नहीं किया गया तो इसके गंभीर परिणाम निकल सकते हैं हमारा सामाजिक ढांचा लड़खड़ा सकता है