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रविवार, 8 अगस्त 2010

मानवाधिकार प्रहरी डा- मुन्ना लाल भारतीय



डा- मुन्ना लाल भारतीय जी महासचिव आगरा

मानव अधिकारों के प्रति समर्पित करके आप जो सराहनीय कार्य कर रहे हैं, इसके लिए अंतर्राष्ट्रीयमानवाधिकार सुरक्षा परिषद् दिल से आपका शुक्रगुजार है और मानवता इसके लिए आपकी ऋणीरहेगी। आज भी हमारा एक वर्ग समाज की मुख्य धरा से कटा हुआ निस्सहाय प्रशासनिक व्यवस्था सेकोसों दूर अपने आप को भगवन भरोसे छोड़ कर जीवन यापन कर रहा है। ऐसे लोगों के लिए आपका यहलगाव और प्यार अति सराहनीय है। इसके लिए संगठन आपको नमन करता है और उम्मीद करता है कीआप इसी तरह से अपना कार्य जिम्मेदारी और निस्स्वार्थ भाव से करते रहेंगे।

धन्यवाद

कमरुद्दीन सिद्दीकी
राष्ट्रीय अध्यक्ष
अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार सुरक्षा परिषद्
संपर्क- नगला अजीता, सेक्टर-४ रोड आगरा
मो- ९८३७१४००७३

शनिवार, 7 अगस्त 2010

क्यों हुआ संसद में महंगाई पर हंगामा



लगता है कि धूमिल ने सही ही कहा था-

संसद तेल की वह घानी है
जहां आधा तेल और आधा पानी है

संसद के हर सत्र प्रायः हंगामें से शुरू होते हैं। हंगामे के कारण कई दिनों तक संसद की कार्यवाही ठपरहती है। क्या हमारे संविधान निर्माताओं ने इसी संसद की कल्पना की थी जिसमें गंभीर बहस के स्थान
नारेबाजी और शोर-शराबा होता रहे। संसदीय मर्यादा की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जायें। सत्ता और विपक्ष अपने-अपने पाले में तलवार भांजते रहें और बेचारी जनता मूक दर्शक की भांति इनका नाटक-नौटंकी देखती रहे। कभी हमारे देश की संसद में महान व्यक्तित्व थे जो अपनी योग्यता ईमानदारी, त्याग और जनसरोकारों से परिपूर्ण थे। सत्ताधारी दल भी योग्य विपक्षी नेताओं का सम्मान करता था और विपक्ष भी सरकार के लोकोपयोगी कार्यों की दलगत भावना से ऊपर उठकर समर्थन करता था। लगता है कि मतैक्य की भावना हमारी संसद से विदा हो चुकी है। सत्ता पार्टी का विपक्ष की बात मानना और विपक्ष का सत्ताधारी दल की हर बात का विरोध करना चलन बन गया है। महंगाई के मुद्दे पर हमारी संसद हंगामे की शिकार हो रही है। एक ओर विपक्ष काम रोको प्रस्ताव पर अड़ा है। वहीं दूसरी ओर सरकार किसी अन्य तरीके से इस बहस को कराना चाहती है जिससे बहस के बाद मतदान की नौबत आये।
मजाक बना दिया है
लगता है कि विपक्ष ने संसदीय कार्यवाही को मजाक के रूप में परिणित कर दिया है। विपक्षी हर मामले
में काम रोको प्रस्ताव के तहत बहस की मांग कर रहे हैं। वह चाहते हैं कि इसके माध्यम से सरकार को मतदान के संकट का सामना करना पड़े। संसद गंभीर बहस के लिए है। इस तरह की शोर-शराबे से जनता में गलत संदेश जा रहा है और संसद की मर्यादा का हनन हो रहा है। विपक्ष को हठधर्मी नहीं अपनानी चाहिए। वस्तुतः महंगाई से सारा देश पीड़ित है। इस पर संसद में किसी किसी रूप में बहस होनी चाहिए।
जनता को बेवकूफ बनाते हैं
संसद जनभावनाओं को मुखरित करने का संवैघानिक मंच है। लेकिन हमें इस बात को
कि समझना होगा कि संसद में वोटों की राजनीति के तहत कैसे लोग पहुंच रहे हैं।सभी महंगाई का रोना
रो रहे हैं। लेकिन कोई भी महंगाई को दूर करना नहीं चाहता। अब हमारी संसद में करोड़पतियों की भरमार है। महंगाई पर चर्चा महज उनके लिए बुद्धि-विलास है। हकीकत तो यह है कि विपक्षी दलों की जहां राज्य सरकारें हैं वह भी कालाबाजारियों तथा मुनाफाखोरों पर सख्ती करने में असमर्थ रहीं हैं।

सरकार क्यों घबराती है
जब केन्द्र में यूपीए सरकार का बहुमत है तो वह काम रोको प्रस्ताव के तहत महंगाई
पर चर्चा क्यों नहीं कराती ? आज महंगाई देश का ज्वलंत मुद्दा है। विपक्षी दल अपने
भी अपने दायित्वों का सही तरीके से निर्वहन कर रहे हैं। वैसे भी यह विपक्ष दलों का फर्ज होता है कि वह जनता की आवाज को संसद में बुलंद करें। सरकार को आखिर काम रोको प्रस्ताव पर आपत्ति क्यों
है ? आखिर वह आम जनता के नाम पर ही सत्ता में आई है।
स्पीकर निर्दलीय हो
अगर हमें लोकसभा की मर्यादा बनाये रखनी है तो स्पीकर को निर्दलीय होना चाहिए।
हालांकि स्पीकर सत्ताधारी दल का होता है लेकिन उससे यह अपेक्षा की जाती है की वह विपक्ष
की भावनाओं को भी सम्मान दे। अगर स्पीकर निर्दलीय होगा तो निश्चित रूप से अपने विवेक से
न्यायसंगत फैसला ले सकता है। स्पीकर की भी मजबूरी है कि आगे भी उसे सत्ताधारी दल से चुनाव लड़ना है। इसलिए वह सरकार के खिलाफ जाने की अधिक हिम्मत नहीं जुटा पाते।
जनता सब जानती है
ऐसा नहीं है कि भारतीय जनता बेवकूफ है जो राजनेताओं के घड़ियाली आंसुओं की सच्चाई को नहीं पहचानती। अगर हमारे सांसद वास्तव में ईमानदार है तो उन्हें संसद में हंगामें और कार्य सम्पादित होने के कारण अपने वेतन-भत्ते का त्याग करना चाहिए। संसद में हंगामा करने से महंगाई कम नहीं होगी। अगर हमारे सांसदों को महंगाई का अहसास होता तो वह संसद के स्थान पर
मुनाफाखोरों और कालाबाजारियों के खिलाफ मोर्चा खोलते। कोई कुर्सी पर बने रहने तो कोई कुर्सी पाने के लिए हंगामा कर रहे हैं।

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

सुप्रीम कोर्ट की बेबसी


शर्मनाक बात है कि देश की सर्वोच्च न्यायालय को यह कहने के लिए विवश होना पड़ा है कि अगर उसकेआदेश का पालन हो तो अपनी किस्मत पर रोइए। सुप्रीम कोर्ट के पास तो पुलिस है और ही ऐसाकोई अधिकार जिसके तहत वह किसी व्यक्ति को गिरफतार कर सके। यह पीढ़ा न्यायमूर्ति मार्कंडेयकाटजू और न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर की नहीं अपितु हमारी समूची न्याय व्यवस्था की है। जोन्यायपालिका देश के संविधान की रक्षक और व्याख्याकार है। कार्यपालिका और विधायिका से निराशऔर हताश नागरिक के लिए न्यायालय ही एकमात्र मंच रह जाता है जहां वह न्याय के लिए गुहार लगासकता है। परंतु जब न्यायपालिका ही बेवश हो तो जनता आखिर किसके पास जायेगी। किससेगुजारिश और मनुहार करेगी अपने न्याय के लिए। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बिडम्बना है किलोकतंत्र का प्रमुख स्तम्भ न्यायपालिका आज अपने को निर्बल और असहाय महसूस कर रही है। इससेअधिक दुर्भाग्यपूर्ण और क्या होगा कि उसके आधीनस्थ उच्च न्यायालय भी उसके आदेश तथा निर्देशोंकी धज्जियां उड़ा रही है। अब तक तो संसद और न्यापालिका तथा न्यायपालिका बनाम कार्यपालिकाटकराव की स्थितियां पैदा हुईं लेकिन जब न्यायपालिका का अपना तंत्र ही बेलगाम हो जाये तो स्थितिविस्फोटक हो सकती है। पूर्व सांसद पप्पू यादव की जमानत के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की चिंता जायज हैकि उसके स्पष्ट निर्देश के बाद पटना हाईकोट्र ने पप्पू यादव को जमानत दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देशमें अभियुक्त की जमानत याचिका खारिज करते समय दिया था कि अभियुक्त को कोई भी अदालतजमानत दे। इसके बावजूद अभियुक्त को जमानत दिया जाना न्यायिक अराजकता के सिवाय औरक्या है। सवाल यह भी उठता है कि जब सुप्रीम कोर्ट के आधीनस्थ कोर्ट ही उसके दिशा निर्देशों का पालननहीं करेंगे तो क्या न्यायपालिका की सर्वोच्चता और गरिमा अक्षुण्ण रह पायेगी। इस मामले में जस्टिसद्वय द्वारा जाहिर की गई बेवसी से कुछ नहीं होगा। लगता है कि सुशासन बाबू के बिहार में सब कुछ ठीकनहीं चल रहा। जब सुप्रीम कोर्ट ने 3 मई को पप्पू यादव को पटना हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत रद्द करदी तो अब तक बिहार पुलिस ने उसे गिरफतार क्यों नहीं किया ? क्या बिहार सरकार की जिम्मेदारी नहींहै कि वह माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन कराना सुनिश्चित करती। लगता है कि नीतीश कुमारभी कानून पालन के मामले में राजनीति कर रहे हैं ? हो सकता है कि
2007 वह इस बाहुबलि नेता को अपनीपार्टी में लेना चाहते हों। इसीलिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी की। बात कुछ भी लेकिनइस बारे में समूचा देश एकमत है कि न्यायपालिका की गरिमा और मर्यादा कायम रहनी चाहिए। उसमर्यादा का अतिक्रमण करने वाली किसी भी संस्था को बख्शा नहीं जाना चाहिए।

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

रिटायरमेंट में आयु वृद्धि क्यों

केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नवी आजाद उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर चिकित्सा शिक्षकों कीसेवा निवृत्ति की आयु 62 से बढ़ाकर 65 करने को कहा है। प्रदेश सरकार एसजीपीजीआई लखनऊ केचिकित्सा शिक्षकों की आयु बढ़ाने जा रही है। इस संबंध में प्रस्ताव तैयार है जिसे केबिनेट की मंजूरी काइंतजार है। यह भी संभावना है कि प्रदेश के सभी मेडिकल कालेजों के शिक्षकों की आयु में वृद्धि कीजायेगी। सरकार के इस फैसले से बेरोजगार डाक्टरों में हताशा व्याप्त हो गई है। इससे पहले भी सरकारकेन्द्रीय विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की रिटायरमेंट आयु में वृद्धि की वुकी है। क्या सरकार को पता नहीं हैकि देश में हजारों पी-एच.डी., डी.लिट् तथा नेट क्वालीफाइड युवा हैं जो नौकरी की वाट जोहते-जोहतेप्रोढ़ावस्था के कगार पर गये हैं। इसी प्रकार बी.एड.एम.एड. लोगों की भी कोई कमी नहीं है। लेकिनसरकार के अदूरदर्शी निर्णय से इन लोगों का भाग्य भी अंधकारमय हो गया है। शिक्षित बेरोजगारों कीफौज निरंतर बढ़ती ही जा रही है। उस पर भी सरकार अपने शिक्षकों की रिटायरमेंट की आयुसीमा मेंनिरंतर वृद्धि कर रही है। प्रदेश के शिक्षा जगत में भी आयु सीमा 62 वर्ष है। सवाल यह पैदा होता है किजब देश में पढ़े-लिखे और प्रशिक्षित लोग हैं तो इन रिटायर्ड लोगों की फौज का क्यों पाला जा रहा पालाजा रहा है। इसी प्रकार कुछ शिक्षण संस्थानों में अनुभव के नाम पर रिटायर्ड शिक्षकों अथवा डाक्टरों कोरखा जा रहा है। यह क्या युवाओं के साथ द्रोह नहीं है। वस्तुस्थिति यह है कि लगभग सभी शिक्षक अपनीपारिवारिक जिम्मेदारियों से 55-60 की आयु तक मुक्ति पा लेते हैं। रिटायर होने के दो साल पहले से हीवह अपना कार्यभार त्याग देते हैं और अपनी पेंशन, ग्रेच्युटी आदि अन्य लाभों के गुणा-जोड़ में लगे रहतेहैं। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यहां शिक्षित बेरोजगारों की फौज हताशा और निराशा के सागर में गोतेलगा रही है और हमारे देश के कर्णधारों को उनसे कोई मतलब ही नहीं है। इस प्रकार देश के युवाओं कीऊर्जा और योग्यता का सही मूल्याकंन नहीं हो पा रहा है। सरकार को इन लोगों की आयु सीमा तब बढ़ानीशोभा देती कि देश में शिक्षित और प्रशिक्षित लोगों का अभाव है। अतः संस्थाओं के सुचारू संचालन केलिए रिटायरमेंट की सीमा बढ़ाई जा रही है। सरकार के इस तरह के अदूरदर्शी फैसलों से युवाओं केदिशाभ्रमित होने का खतरा मंडरा रहा है। असंतोष और हताशा कब किस शिक्षित युवा को अराजकता कीओर मोड़ दे। कहा नहीं जा सकता। आश्चर्य तो इस बात का भी है कि विपक्ष हर जरूरी और गैरजरूरी बातपर अपनी आपत्ति दर्ज कराता है लेकिन रिटायर्ड लोगों की चारागाह बनाने के लिए उसकी भी मौनस्वीकृति है। वस्तुतः अब समय गया है कि शिक्षित युवाओं को स्वयं ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी।अन्यथा नौकरी के इंतजार में उनकी आयुसीमा निकलने में देर नहीं लगेगी।

सोमवार, 26 जुलाई 2010

गुरुता हुई कलंकित, गुरु बने गुरु घंटाल

कभी भारत को विश्व गुरू कहा जाता है। यहां ज्ञान का अथाह भंडार था। गुरु सात्विक जीवन और नैतिक मूल्यों में विश्वास करते थे। राजा से लेकर रंक तक उनका सम्मान करता था। यह उन गुरूओं की महानता ही थी कि आरुणि, एकलव्य जैसे शिष्यों ने गुरू के प्रति अपनी श्रद्धा अनवरत जारी रखी। लेकिन बदलते परिवेश में भारत में गुरूओं की तो बाढ़ गई है लेकिन गुरुता दम तोड़ती नजर रही है। कोई धर्म-गुरु, कोई आध्यात्मिक-गुरु, कोई कुलगुरु, कोई कला और संगीत गुरु तो कोई विद्या-गुरु। अब तो चोर और डाकुओं के भी गुरु होने लगे हैं जो उन्हें उस पेशे का हुनर ईमानदारी से सिखाते हैं। वक्त के साथ गुरु-शिष्य परंपरा बदलती गई। गुरु या तो मास्टर हो गया है कोच। वह पूरा व्यवसायिक हो गया। इसी प्रकार शिष्य भी बदल गया। गुरु को वह या तो वेतनभोगी समझता है अथवा ट्यूशन खोर। उसके मन में गुरु के लिए कोई श्रद्धा और सम्मान नहीं है। आखिर कैसे बदला यह सब। गुरुओं के प्रति श्रद्धा घटने कामुख्य कारण शिक्षा जगत में अयोग्य लोगों का प्रवेश है। योग्य और प्रतिभाशाली लोग तो सिविलसर्विसेज, चिकित्सा, इंजीनियरिंग तथा वैज्ञानिक क्षेत्र में चले जाते हैं। जो इनसे बचे रहते हैं। वह शिक्षक बन जाते हैं। वह शिक्षक भी अपनी योग्यता के आधार पर नहीं अपितु भ्रष्टाचार और भाई-भतीजेवाद के कारण बनते हैं। जब ऐसे लोगों में शिक्षा के संस्कार ही नहीं है तो गुरुत्व कहां रहेगा ? जब से शिक्षा का बाजारीकरण हुआ है तब से शिक्षामंदिरों की दुर्दशा हो गई है ? गुरु और शिष्य का संबंध ग्राहक और दुकानदार का हो गया है। सरकारी और अनुदानित शिक्षा संस्थानों में शिक्षा का वातावरण समाप्त हो गया है। गुरु भी पैसे के लिए दौड़ रहा है। यह अपने कर्तव्य से विमुख हुआ है। जब अपने को राष्ट्रनिर्माता कहने वाला ही नैतिक मूल्यों और सात्विक जीवन में विश्वास नहीं रखेगा तो गुरुता में तो गिरावट आयेगी। वस्तुतः कुछ लोगों ने तो गुरु शब्द को ही अपने कर्मों और व्यवहार से कलंकित कर दिया है। कान में मंत्र फूंकने वाला अथवा कंठी-माला पहचाने वाला ही गुरु नहीं होता बल्कि गुरु तो शिष्य को अज्ञानरूपी अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले जाता है। कबीर ने भी गुरु को गोविंद से श्रेष्ठ माना है। वस्तुतः गुरु तो व्यक्ति है और ही संस्था। वह तत्व है जिसे पाने के लिए उसे ज्ञान अर्जन कर उसे वितरण करना होता है। आज समाज में गुरु कम गुरु घंटाल अधिक दिखाई देते हैं। जबगुरुओं ने ही सात्विक जीवन और नैतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ा दी है तो कौन शिष्य उनका सम्मान करेगा। आज का गुरु ज्ञानपिपासु कम भोगपिपासु अधिक हो गया है। सारे देश में धर्म-गुरुओं सहित शिक्षा-गुरुओं की बाढ़ आई हुई है लेकिन फिर भी समाज में गिरावट जारी है। इसका मुख्यकारण गुरुओं का गुरुता से हट जाना है। गुरुओं का समर्पण अपने परिवार को भौतिक साधन जुटाने तक सीमित रह गया है। यही कारण है कि आज हर क्षेत्र का गुरु साधन-संपन्न है। गुरुओं को अपना सम्मान अक्षुण्ण रखने के लिए भारतीय दर्शन और नैतिक मूल्यों को आत्मसात करना होगा।
आज का गुरु केवल अपने तक सीमित है। उसकी प्राथमिकताएं बदल गई हैं। शिक्षा मंदिरों में गुरुओं ने अपनी प्रासंगिकता खो दी है। बदलते सोशियो-इकोनोमिक परिवेश का उसपर पूरा प्रभाव पड़ा है।गुरु-शिष्य परंपरा तो गुरुकुल के बाद समाप्त हो गई। आज के गुरु रूपी शिक्षक को अपने वेतन से मतलब है। उसमें ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा नहीं रही। जब वह ही ज्ञान और सृजन से दूर भाग रहा है तो शिष्यों को कैसे प्रेरित करेगा। अगर शिक्षक प्रोफेशनल ओनेस्टी अपनाएं तो बहुत कुछ बदलाव हो सकता है। हकीकत यह है कि आज छात्र पढ़ना चाहता है और शिक्षक पढ़ाना। जब शिक्षक को बिना पढ़ाए पूरा वेतन और प्रोन्नति सहित सुविधाएं मिल रहीं है तो वह क्यों अपने कर्तव्य का पालन करे ? उस पर कोई अंकुश नहीं। निजी क्षेत्र का शिक्षक अल्पवेतन से परेशान है और सरकारी और अनुदानित संस्थान के गुरु निरंकुश हैं। कहां रहा गुरु और शिष्य का रिश्ता ?
पहले गुरुओं के पास अभिभावक ज्ञान और विज्ञान प्राप्त करने के लिए भेजते थे। गुरु और शिष्य का रिश्ता अटूट था। उनमें आत्मीयता और लगाव था। वह गुरुओं का सम्मान करते थे। लेकिन आज का अभिभावक बच्चों को पढ़ाने नहीं अपितु पास कराने के लिए आता है। वह स्कूल-कालेजों में सीधी बात कहता है कि बच्चा फर्स्ट क्लास पास होना चाहिए। जब से शिक्षा जगत में नकल का बोलवाला हुआ है। गुरु और शिष्य के संबंध आहत हुए हैं। अभिभावकों ने ही गुरु को भ्रष्ट बनाया है और उसी ने ट्यूशनखोर। आरंभ में अभिभावकों ने गुरु रूपी शिक्षक को लालच देकर खरीदा और अब गुरु अपनी कीमत पर बिक रहा है। शिक्षा जगत में आई गिरावट के लिए अभिभावक जिम्मेदार हैं। उन्होंने बच्चों में संस्कार नहीं दिए कि गुरु का कैसे सम्मान किया जाए ? पैसे के बल पर लोगों ने कला और धर्मगुरुओं तक को खरीद लिया। अतः उनकी गुरुओं के प्रति श्रद्धा नहीं है तो गुरुओं की उनके प्रति आत्मीयता कैसे रहेगी ?

शनिवार, 24 जुलाई 2010

श्रेष्ठ कवि दिविक रमेश और व्यंग्यकार अविनाश


लोकसंघर्ष परिकल्पना ब्लॉगोत्सव-10 ने वर्ष के श्रेष्ठ कवि के रूप में चर्चित कवि दिविक रमेश को सम्मान देकर स्वयं को महिमामंडित किया है। उनकी पहचान पहले से ही हिंदी जगत में ससम्मान है। उन्हें हिंदी साहित्य के कई पुरस्कार मिल चुके हैं। जिनमें सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार भी शामिल है। उनकी पुस्तकों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है। वह बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी है। हिंदी की लगभग सभी विधाओं पर उनका साधिकार लेखन है। दिल्ली निवासी दिविक रमेश का वास्तविक नाम रमेश चंद शर्मा है। वह मोतीलाल नेहरू कालेज दिल्ली में प्राचार्य हैं।
दिविक रमेश अनेक देशों जैसे जापान, कोरिया, बैंकाक, हांगकांग, सिंगापोर, इंग्लैंड, अमेरिका, रूस, जर्मनी, पोर्ट ऑफ स्पेन आदि की यात्राएं कर चुके हैं। आलोचक को संबोधित उनकी कविता-

समझ यह भी आता है
कि बहुत आसान होता है
व्याख्यायित करना अपने से इतर को
कि वह पेड़ है कि वह जड़ है
कि वह वह है कि वह वह है
और यह भी कि वह ऐसा है और वह वैसा है।

दिविक जी को अपनी कविता की यह पंक्तियां बेहद पसंद हैं-

जब चोंच में दबा हो तिनका
तो उससे खूबसूरत
कोई पक्षी नहीं होता

और ये भीरू
दरवाजा खुला हो
तो अंधड़-तूफ़ान ही नहीं
एक खूबसूरत
पंख भी तो आ सकता है
उड़ कर ।

ब्लॉगोत्सव में श्रेष्ठ व्यंग्यकार का पुरस्कार इस दुनियां के जाने माने लिक्खाड़ अविनाश वाचस्पति को मिला है। हिंदी ब्लॉग जगत को उन्होंने नये आयाम और बुलंदियां दी हैं। दिल्ली में जन्मे अविनाश शायद हर वक्त ब्लॉग की दुनियां में उपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। उनके कई ब्लॉग हैं जिनमें पिताजी, नुक्कड़, बगीची, तेताला, झकाझक टाइम्स आदि। लेकिन उनका चर्चित ब्लॉग नुक्कड़ ही है। इस ब्लॉग पर वह अपना परिचय इस अंदाज में देते हैं।
अंगूठा हूं मैं एक
ऊंगलियां चार
मिले सब हथेली हो गई तैयार
दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार
कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार
जब बांध लिया तो बन गया मुक्का
सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

चिट्ठाजगत में संभवतः अविनाश ही ऐसे चिट्ठाकार हैं जिनकी टिप्पणियां लगभग हर ब्लॉग पर मिल जायेंगी। चाहे वह टिप्पणीकर्ता के रूप् में अथवा अनुसरण कर्ता के रूप् में। उनका लेखन भी बहुआयामी है। उनके व्यंग्य चुटीले और व्यवस्था पर तीखी चोट करते प्रतीत होते हैं। ब्लॉगरों से मिलना और उसेे संस्मरण के रूप् में चिट्ठा जगत में प्रस्तुत करने का उनका अपना तरीका है। उनके व्यंग्य आलेख कई पत्रों में निरंतर प्रकाशित होते रहते हैं। उन्होंने बहुत लोगों को ब्लॉग दुनियां में आने के लिए प्रेरित किया है और ब्लॉगर्स को एक मंच पर लाने को वह प्रतिबद्ध नजर आते हैं।

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

भ्रष्ट जजों की बर्खास्तगी

‘जज की सेवा ऐसी है जिसमें ईमानदारी और उच्च पेशेवर मूल्यों को बचाए रखना पड़ता है।‘
बर्खास्त जजों की याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी आशा का संचार करती हैं कि भ्रष्टाचार के मामले में उसका कड़ा रुख है। यह ऐसे समय में और अधिक महत्वपूर्ण है जबकि विधायिका और कार्यपालिका अपनी प्रासंगिकता खोने के कगार पर है। न्यायपालिका के प्रति देश के नागरिकों को अभी काफी उम्मीदें हैं। इस निर्णय से साफ हो गया कि न्यायपालिका जब अपने जज को भ्रष्टाचार के मामले में माफी देने को तैयार नहीं है तो नेताओं और नौकरशाहों को भी उससे कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। वस्तुतः देश का पूरा सिस्टम भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है। लगता है कि लोगों ने भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया है। इसीलिए जहां देश में गरीबी बेतहाशा बढ़ रही है वहीं दूसरी ओर धनाढ्यों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। यह बढ़ोतरी उत्पादन और सेवा से नहीं अपितु भ्रष्टाचार के द्वारा अर्जित हो रही है। यह इस गरीब देश का दुर्भाग्य है कि हमारी गरीबों की लोकसभा में 300 माननीय सांसद करोड़पति हैं। हालांकि पैसे वाला होना कोई बुरी बात नहीं है। सवाल यह है कि यह लोग कैसे पैसे वाले हुए। आज अधिकांश नेताओं की जन्मपत्राी खंगाली जाये तो अधिकतर राजनीति से पहले साधारण हैसियत के लोग थे। अचानक उनकी दौलत इतनी बढ़ गई कि वह पूंजीपतियों के शामिल हो गये। यही स्थिति नौकरशाहों की है। लेखपाल से लेकर लिपिक, निरीक्षक से लेकर अधिकारी तक सभी भ्रष्टाचार की गंगा में जमकर गोते लगा रहे हैं। इन लोगों की नौकरी की भी खास परवाह नहीं होती क्योंकि इन्होंने भ्रष्टाचार के जरिए से इतना बेतहाशा धन कमा लिया है कि उन्हें भविष्य की चिंता नहीं है। हमारी कार्यपालिका भ्रष्टाचार के मामले पर घड़ियाली आंसू तो बहाती है लेकिन कोई कड़ी कार्रवाई नहीं करती। आखिर करे भी तो कैसे, सब उनके भाई-बंधू ही तो हैं। वह भी भ्रष्टाचार की गंगा में गोते लगाकर इस ऊंचाई पर आए हैं। भ्रष्टाचार की यह दास्तां जीवंत है कि हर वर्ष विकास के नाम पर अरबों-खरबों रुपया खर्च होता है लेकिन विकास के कहीं दीदार नहीं होते। सरकार की बहुत सी जनहितकारी योजनाएं कागजों पर हीं चल रहीं हैं। इस गड़बड़ घोटाले में शासन-प्रशासन ही नहीं अपितु सेवा का ढांेग करने वाले कुछ एनजीओ भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उच्च न्यायालय और आधीनस्थ न्यायालयों को सबक लेना चाहिए िकवह किसी कीमत पर भ्रष्टाचारियों को राहत न दें। सरकार को भी भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़नी होगी क्योंकि हमारी विकास की घास को भ्रष्टाचार रूपी जानवर जमकर चर रहे हैं।