www.hamarivani.com

सोमवार, 31 मई 2010

वरिष्ठ कवि निखिल सन्यासी का सम्मान




आगरा स्थित नागरी प्रचारिणी सभा के शताव्दी वर्ष में वरिष्ठ कवि निखिल सन्यासी का सम्मान किया गया। सांसद डाक्टर राम शंकर कठेरिया, विख्यात कवि सोम ठाकुर, पूर्व सांसद व कवि प्रो ओमपाल सिंह निडर ने उन्हें शाल पहनाकर तथा प्रशस्ति पत्र भेट कर उनका सम्मान किया। अध्यक्षता की सरोज गोरिहर ने। इस अवसर पर कवि गोष्ठी हुई जिसमें डाक्टर राज कुमार रंजन, डाक्टर महाराज सिंह परिहार, कैप्टेन व्यास चतुर्वेदी, डाक्टर त्रिमोहन तरल, राज बहादुर राज, शहीद नदीम, प्रताप दीक्षित, राजेंद्र मिलन, रामेन्द्र त्रिपाठी आदि कवियों ने काव्य पाठ किया। सञ्चालन व संयोजन किया मशहूर गीतकार शिव सागर शर्मा ने। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार तथा बात बेबात के ब्लोगेर डाक्टर सुभाष राय, अशोक सक्सेना आदि भी मौजूद थे।

शनिवार, 29 मई 2010

नहीं है ईमानदारी हिंदी पत्रकारिता में



हिंदी पत्रकारिता जिसने आज़ादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका का निर्वहन किया। वह आज कहीं दिखाई नहीं देती। समाज को जाग्रत करने तथा उसे पाखंडों से निकालने की अपेक्षा पत्रकारिता समाज को गलत दिशा में ले जा रही है। कभी सम्मान का यह पेशा अब दलालों, पूंजीपतियों तथा भ्रष्ट नेतायों की जुगलबंदी में बदल गया है। आज का पत्रकार केवल अपने आका को खुश करने में लगा रहता है क्योंकि वह जनता है की वह अपनी योग्यता से नहीं अपितु किसी की मेहरवानी से आया है। सारे देश के हिंदी अखवारों में यही स्थिति है। एक जाति विशेष के पत्रकारों का इस पेशे में वर्चस्व है। अधिकांश पत्रकारों को न तो हिंदी का आधिकारिक ज्ञान है और न ही उसमे विश्लेषण क्षमता है। वह बिना विज्ञप्ति के समाचार नहीं लिख सकता। उसका सामान्य ज्ञान हाई स्कूल तक का भी नहीं है। किसी भी अखवार में पत्रकारों व् सह संपादकों की भर्ती के लिए न तो कोई परीक्षा होती है और न ही इस क्षेत्र में उसकी योग्यता को मापा जाता है। यह भी सच्चाई है की किसी भी संपादक को योग्य, ईमानदार और अपने से अधिक शिक्षित पत्रकार पसंद नहीं होते । वह उन्हें हर समय अपमानित और नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। सभी को दल्ले, जुगाडू और चमचों की जरूरत है। यह मेरा दावा है कि हिंदी के अखवारों के अधिकांश पत्रकार केंद्र सरकार कि एस एस सी कि परीक्षा और सम्पादक पीसीईस कि प्रारम्भिक परीक्षा भी पास नहीं कर सकते। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग कि नेट परीक्षा पास तो वह जिंदगी में नहीं कर सकते. अखवारों के मालिक और सम्पादक जातीय पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। यही कारन है कि दलित पत्रकार अखवारों में खोजने से भी नहीं मिलते। देश में धर्म और जाति का जो नंगा खेल चल रहा है उसके लिए मीडिया के जातीय और संकीर्ण विचारधारा के यही लोग जिम्मेदार हैं। आज की हिंदी पत्रकारिता का यही सच है। मीडिया बहुत मृत की बात करता है लेकिन क्या उसने कभी अपने गिरेबान में झाँकने का प्रयास किया कि वह कितने पानी में है। चमचों को तरक्की मिलती है और योग्य लोगों को हाशिये पर डाला जाता है. पत्रकारिता में पराड़कर, पालीवाल, विद्यार्थी, सुरेन्द्र प्रताप सिंह जैसे निष्पक्ष पत्रकारों का युग समाप्त हो गया। आप हिंदी पत्रकारिता दिवस है। इस दिन सिवाय आंसू बहाने के और क्या किया जा सकता है। पूँजी और चाटुकारों कि टोलियाँ इस मिशन को ध्वस्त करने में लगीं हैं.

बस सरकार चल रही है

यूपीए सरकार ने कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे आम आदमी को राहत मिले। किसी तरह से मनमोहन सिंह अपनी सरकार चला रहे हैं। यह सरकार अपनी योजनाओं को अमली जामा पहनाने में असमर्थ दिखाई देती है।यह दिशाहीन सरकार है। आम जनता को इससे भविष्य में कोई उम्मीद नहीं है। वस्तुत सरकार चलाना इतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं जितना सरकार का काम करना है। दिल्ली में मनमोहन सिंह की सरकार नहीं अपितु भानुमती का कुनबा राज कर रहा है। कांग्रेस की मजबूरी है कि वह सरकार का नेतृत्व कर रही है। सरकार जनाकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरी है। सरकार के साझीदार अपनी उंगलियों पर मनमोहन सिंह तथा उनकी नेता सोनिया गांधी को अपनी उंगलियों पर नचा रहे हैं। परस्पर अन्तर्विरोधों के चलते यह सरकार प्रभावशाली भूमिका नहीं अदा कर पा रही है। ममता अलग राग अलाप रहीं है तो शरद पवार अपनी कलाबाजियों खेल रहे हैं। इस सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी इसके नेतृत्व का कमजोर होना है। जो प्रधानमंत्री जनता के सामने से डरता हो। वह जनता द्वारा सीधा चुनकर आने की अपेक्षा बैकडोर से संसद में पहुंचता हो। वह सही अर्थों में जनता का सही प्रतिनिधि नहीं हो सकता। यही वजह है कि प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाते। अगर वह जनता के द्वारा चुने प्रतिनिधि होते तो निश्चित रूप् से उनमें आत्मविश्वास और स्वाभिमान होता। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है। आम आदमी के नाम पर वोट लेकर सत्ता में आई इस सरकार का आम जनता से कोई सरोकार नहीं है। वह योजनाएं तो अच्छी बना लेती है लेकिन भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी नौकरशाही पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। आम आदमी को रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए। वह उसे मुहैया नहीं हो रहा है। यह देश का दुर्भाग्य है कि सरकारी गोदामों में लाखों टन अनाज बर्वाद हो जाता है लेकिन उसे गरीबों को उपलब्ध कराकर सरकार उनके पेट की आग शांत नहीं करना चाहती। ऐसा नहीं कि यूपीए सरकार हर मोर्चे पर विफल रही है। उसने कई ऐसी महत्वाकांक्षी योजनाओं को अंजाम दिया है जो देश की कायाकल्प कर सकता है। शिक्षा गारंटी योजना, मनरेगा, शेैक्षिक ढांचे का पुर्नगठन सहित परमाणु समझौता आदि ऐसे काम है जो भारत का भाग्य बदल सकते हैं। मनमोहन सिंह ईमानदार और स्वच्छ छवि के हैं। उनके नेतृत्व में सरकार केवल चल रही है और उसकी योजनाओं से जनता को सीधा फायदा भ्रष्टाचार और कुशासन के कारण नहीं पहुंच रहा है।

शुक्रवार, 28 मई 2010

आम आदमी से दूर मनमोहन

केन्द्र की यूपीए सरकार ने अपना एक वर्ष पूरा कर लिया है। लेकिन जिस आम आदमी का नारा देकर यह सरकार आई थी। वह आम आदमी कहां है ? कहां है उसके सपने ? कौन सोच रहा है उसकी बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए ? वैसे मनमोहन सिंह ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल के छह वर्ष पूरे कर लिये हैं। स्वच्छ छवि का होने के बावजूद उनकी सरकार की छवि जनता में अच्छी नहीं है यानी कैप्टन तो बढ़िया है लेकिन खिलाड़ी घटिया हैं। इस सरकार मंहगाई रोकने के लिए अभी तक कोई भी कारगर कदम नहीं उठाया। मंहगाई बढ़ाने में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई संकेतात्मक कार्रवाई भी नहीं की। महिला आरक्षण कानून जो इस सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता सूची में शामिल था। उसे भी वह लोकसभा में पेश करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। नक्सलवाद सीना ताने सरकार के अस्तित्व को चुनौती दे रहा है। पाक भी अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। प्रशासन में भ्रष्टाचार का बोलवाला है। सरकार की महत्वपूर्ण योजना मनरेगा भी जमीन पर कम कागजों पर अधिक दिखाई दे रही है। अगर सरकार की यही कार्यदिशा रही तो क्या वह भविष्य में स्पष्ट बहुमत वाली सरकार बना सकेगी। राजनीति में स्वच्छता का नारा भी बेमानी लगता है। खेल भी अब भ्रष्टाचार में गरदन तक धस चुके हैं। अब क्या उम्मीदें हैं सरकार से।

पानी पर होगा युद्ध


इस समय समूचा देश जल संकट से त्राहि-त्राहि कर रहा है। अगर यही आलम रहा तो पानी ही लड़ाई का प्रमुख कारण बन जायेगा। क्योंकि जीने के लिए भोजन से भी अधिक पानी की जरूरत होती है। आश्चर्य इस बात का है कि इस भयावहता की ओर न तो सरकार का ध्यान है और न ही जनता का। वह किसी चमत्कार का इंतजार कर रही है। अगर समय रहते हम नहीं चेते तो निश्चित रूप से इस महान देश पानी के अभाव में काल-कवलित हो जायेगा।
बढ़ते औद्योगीकरण तथा हरित क्रांति का सबसे बड़ा भार पानी पर पड़ा है। हमारी नदियां गंदे नाले में परिवर्तित हो गयीं हैं। गांव और शहरों का सारा कूड़ा-कचरा तथा सीवर नदियों में बेखौफ प्रभाहित की जा रही है। भूगर्भ जल का अत्यधिक दोहन करने से उसके जलस्तर में निरंतर गिरावट आ रही है। वर्षा के जल का हम संचय नहीं कर रहे। तालाबों और पोखरों पर हमने कब्जा करके आलीशान इमारतें खड़ी कर ली हैं। नदियों के पाट पर भी हम डायनासोर की तरह फैेलते जा रहे हैं। इस चिंतनीय स्थिति की ओर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। सन् 1947 में देश मे प्रतिव्यक्ति जल की उपलब्धता 6000 घनमीटर थी जो कि 2017 तक घटकर मात्र 1600 घनमीटर रह जायेगी। ताजे जल का एक मात्र स्रोत भूगर्भ जल, जो पीने के अतिरिक्त कृषि और उद्योग के उपयोग में आता है। हरित क्रांति के बाद भूगर्भ जल का अत्यधिक मात्रा में दोहन हआ है। पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जिन्होंने हरित क्रांति में अर्वाधिक फायदा उठाया, वही बेतहाशा नलकूपों के लगने से भूमिगत जल के स्रोत लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गये हैं। भूमिगत जल के अत्यधिक नीचे जाने से पानी में लवण की मात्रा भी काफी बढ़ गई है। सिंचाई हेतु जो नहरें बनाई गई थीं, उनका पचास फीसदी पानी ही वास्तविक रूप से सिंचाई के लिये प्रयुक्त हो पाता है। मौसम परिवर्तन की वजह से वर्षा भी कम जोती जा रही है। जहां सबसे अधिक पानी बरसता था, वो भी पेयजल संकट से ग्रसित हो गये हैं। इजरायल जहां वर्षा का औसत महज 25 सेमी है। उनसे हमें सबक लेना चाहिए कि वे जल की एक-एक बूंद की कीमत समझते हैं। इसके विपरीत भारत में वर्षा का औसत 115 सेमी है। जिसके मात्र पच्चीस फीसदी जल-संचय से हम पानी के संकट से मुक्ति पा सकते हैं। लेकिन हमारा 90 फीसदी वर्षा का जल नदियों के माध्यम से सागर में समा जाता है। इस ओर हमने कोई ध्यान नहीं दिया है। इस वर्षा जल को बचाने हेतु वाटर हार्वेस्टिंग को प्रोत्साहन, तालाब, पोखरों की सफाई, कुओं को रिचार्ज करना, बंजर भूमि व पहाड़ी ढालों पर वृक्षारोपण, कृषि के लिए उचित फसल चक्र अपनाने, पेयजल आपूर्ति करने वालली पाइप लाइनों की नियमित देखरेख आदि से जल-संरक्षण को नई दिशा दी जा सकती है। सरकार ने अभी तक भूजल संरक्षण के लिए अभी तक कोई कठोर कदम नहीं उठाये हैं। शहरों के मकानों में कुकुरमुत्तों की तरह लगे समरसेबिल भूजल का अत्यधिक अपव्यय कर रहे हैं। आर-ओ प्लांट अथवा जल बेचने वाले औद्योगिक संस्थानों में पिचहत्तर फीसदी अवशिष्ट जल बेकार चला जाता है। जरूरत इस बात की है कि सरकार जल संरक्षण को प्राथमिकता दे तथा कड़ाई से जल का दुरुपयोग करने वालों को दंडित करे। जनता को भी इस सच्चाई का समझना होगा कि हमारे द्वारा किये गये जल के अपव्यय का खामियाजा हमारी आगामी पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा।

रविवार, 23 मई 2010

तखल्लुस और कविता में उपनाम की परंपरा


किसी भी कवि सम्मेलन को देखो अथवा मुशायरे को। वहां इस अदब के नामचीन लोग मिल जायेंगे। किसी का नाम भोंपू है तो कोई पागल है। कोई सरोज है तो कोई रंजन। कोई संन्यासी है तो कोई निखिल संन्यासी। लेकिन इस सच्चाई को बहंत कम लोग ही जानते होंगे कि इनके असली नाम कुछ और है और साहित्यिक अथवा मंचीय नाम कुछ और। लेकिन यह लोग साहित्यिक जगत में इन्हीं उपनामों से चर्चित हैं। यही स्थिति उर्दू शायरों की है। इनके उपनाम अथवा तखल्लुस भी इनके मूल नामों से सर्वथा भिन्न हैं। वस्तुतः भाषा किस प्रकार दूसरी भाषा पर अपना अटूट प्रभाव डालती हैं। इसका साक्षात उदाहरण है उर्दू शायरी में तखल्लुस और हिंदी कविता में उपनाम। कहा जाता है कि तखल्लुस की शुरूआत उर्दू शायरी के जन्म से ही है। पहले शायर दक्षिण के एक शासक वली दक्खिनी थे। उर्दू में शायद ही कोई ऐसा शायर होगा जिसका तखल्लुस न हो। जैसे बहादुरशाह जफर, रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी, आलम फतेहपुरी, मोहम्मद इकबाल हुसैन उर्फ खलिस अकबराबादी, अबरार अहमद उर्फ गौहर अकबराबादी आदि नामों की लम्बी श्रृंखला है। हिंदी में मिलन, सरित, प्रेमी, रंजन, विभोर, बिरजू, आजाद, दानपुरी, दिलवर, संघर्ष, राज, सहज आदि उपनाम ताजनगरी में चर्चित हैं।आखिर क्या कारण था कि रचनाकारों को अपना उपनाम अथवा तखल्लुस रखना पड़ा। एक जनवादी कवि जो स्वयं अपना नाम बदल कर उपनामधारी हो चुके हैं। उनका कहना है कि हिंदी में अधिकांश गैर ब्राह्मण कवियों ने ही अपने नाम के पीछे उपनाम लगाये। इसका कारण यह था कि ब्राह्मण को तो जन्मजात् योग्य व विद्वान माना जाता है। अतः उन्हें अपना मूल नाम अथवा जातिसूचक शब्द हटाने की आवश्यकता ही नहीं थी। लेकिन गैर ब्राह्मणों के साथ यह संभवतः मजबूरी रही होगी। यही कारण है कि हिंदी कवियों में बहुतायत में गैर ब्राह्मणों ने ही उपनामों को अपनाया है। महाकवि निराला के बारे में यह स्पष्ट ही है कि उनका पूरा नाम सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘ था।उपनामों के बारे में एक अभिमत यह भी है कि अधिकांश मंचीय लोगों ने अपने उपनाम इसलिए रखे जिससे वह जनता में शीघ्र ही लोकप्रिय हो जाये। लोकप्रियता में उनके मूल नाम आड़े न आयें। यही कारण है कि गोपाल प्रसाद सक्सैना को पूरा देश नीरज के नाम से ही जानता है। व्यंकट बिहारी को पागल के नाम से, प्रभूदयाल गर्ग को काका हाथरसी, देवीदास शर्मा को निर्भय हाथरसी तथा राज कुमार अग्रवाल को विभांशु दिव्याल के नाम से हिंदी मंच जानता है।हां इसका अपवाद भी है पं. प्रदीप। जिन्होंने अपने द्वारा रचित भजन और फिल्मी गीतों से देश में धूम मचा दी थी। हे मेरे वतन के लोगों जरा आंखों में भर लो पानी.......जैसे अमर गीत के प्रणेता का वास्तविक नाम पं. रामचन्द द्विवेदी था लेकिन फिल्मी दुनियां में यह नाम अधिक लोगों की जुबां पर शायद ही चढ़ पाये इसलिए उन्हें प्रदीप के नाम से ही मशहूरी मिली। हिंदी रचनाकार पाण्डेय बैचेन शर्मा ‘उग्र‘ व चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी‘ आदि ने उपनाम भले ही लगाया हो लेकिन वह अपने ेजातिसूचक शब्दों का जरूर प्रयोग करते रहे। हिंदी में श्यामनारायण पाण्डेय, सोहन लाल द्विवेदी, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत आदि ने कभी भी अपनामों का सहारा नहीं लिया और अपने मूल नामों से ही हिंदी जगत पर छाये रहे। जहां तक उर्दू शायरी का सवाल है। इसमें अधिकांश शायर अपने जन्मस्थानसूचक शब्द का ही अधिक प्रयोग करते हैं। जैसे दिल्ली में जन्मे शायर देंहलवी, आगरा के अकबराबादी, बरेली के बरेलवी, लुधियाना के लुधियानिवी, गोरखपुरी, जयपुरी आदि। इसके विपरीत उर्दू शायरी में ऐसे कुछ ही शायर भी हैं जो अपने जन्मस्थान सूचक शब्द को अपने नाम के आगे लगाने में परहेज करते हैं। जैसे के.के. सिंह मयंक, कृष्ण बिहारी नूर, बशीर वद्र आदि। मशहूर कवि और कथाकार रावी का वास्तविक नाम रामप्रसाद विद्य़ार्थी था। हिंदी जगत के प्रसिद्ध कवि सोम ठाकुर पहले सोम प्रकाश अम्बुज के नाम से जाने जाते थे। इसी प्रकार डा. कुलदीप का मूल नाम डा. मथुरा प्रसाद दुबे थाा। इसी प्रकार वरिष्ठ गीतकार चौ. सुखराम सिंह का सरकारी रिकार्ड में नाम एस.आर. वर्मा है। निखिल संन्यासी के नाम से चर्चित कवि का मूल नाम गोविंद बिहारी सक्सैना है। इसी प्रकार चर्चित गजलकार शलभ भारती का मूल नाम रामसिंह है। इसी श्रंखला में सुभाषी (थानसिंह शर्मा), पंकज (तोताराम शर्मा), रमेश पंडित (आर.सी.शर्मा), एस.के. शर्मा (पहले शिवसागर थे अब शिवसागर शर्मा), डा. राजकुमार रंजन (डा. आरके शर्मा) कैलाश मायावी (कैलाश चौहान) दिनेश संन्यासी (दिनेश चंद गुप्ता), पवन आगरी ( पवन कुमार अ्रग्रवाल), अनिल शनीचर (अनिल कुमार मेहरोत्रा), सुशील सरित (सुशील कुमार सक्सैना), हरि निर्मोही (हरिबाबू शर्मा), राजेन्द्र मिलन (राजेन्द्र सिंह), पहले रमेश शनीचर अब रमेश मुस्कान (रमेश चंद शर्मा) ओम ठाकुर (ओम प्रकाश कुशवाह) राज (एक का नाम राजबहादुर सिंह परमार है तो दूसरे राज का मूल नाम राजकुमार गोयल ह)

शुक्रवार, 21 मई 2010

जरूरी नहीं मुस्लमान फतवे को स्वीकारें

मजहबी ठेकेदार समाज पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए अपने धार्मिक अधिकारों का दुरुपयोग करते आ रहे हैं। वह नहीं चाहते कि लोग पढ़ें, लिखें, उनका विवेक जाग्रत हो। अगर लोग पढ़-लिखकर ज्ञानवान और विवकेशील बन जाएंगे तो इन कथित गुरुओं, पंडितों और मुल्लाओं की दुकानें खत्म हो जायेंगी। वस्तुतः हर मजहब के ठेकेदार अपने मजहबी लोगों को सदियों से अपनी लकड़ी से हांकते आ रहे हैं। पहले लोग अशिक्षित थे। ज्ञान के प्रकाश से दूर थे। अतः उनकी वकबास को भी ईश्वर अथवा खुदा का फरमान समझकर स्वीकार कर लेते थे। लेकिन जैसे ही समय ने करवट ली। लोगों में जाग्रति फैली। वह अपने विकास के बारे में सोचने लगा। उसका जीने का नजरिया बदल गया। लेकिन फिर भी कठमुल्ले अपने मजहबी लोगों को हांकने से बाज नहीं आ रहे हैं। अभी हाल में इस्लामी मजहबी संस्था दारुल-उलूम देवबंद द्वारा कामकाजी इस्लामी महिलाओं के बारे में जारी फतवे ने एक नई बहस छेड़ दी है। फतवे के मुताबिक इस्लामी महिलाओं के लिए सरकारी या निजी क्षेत्र में पुरुषों के साथ काम करना, पुरुष सहकर्मियों के साथ मेलजोल बढ़ाना व बातचीत करना इस्लाम विरोधी है। इससे पहले भी विवादास्पद फतवे जारी हुए। महिला की कमाई को हराम घोषित करना, सानिया मिर्जा की स्कर्ट, शोएब-सानिया के विवाह पूर्व साथ-साथ रहने सहित पंचायत चुनाव, बाल काटना, उन्हें काला रंग में रंगने के खिलफ भी फतवे जारी हुए। हालांकि पढ़े-लिखे लोग इन फतवों को अधिक महत्व नहीं देते लेकिन इससे नारी की गरिमा पर चोट तो लगती है।
इस्लाम में गैर-बराबरी नहीं
इस्लाम गैर-बराबरी की इजाजत नहीं देता। प्रगति के लिए मुहम्मद साहब ने कभी कोई बंदिश नहीं लगाई। पैगम्बर से इल्म की तालीम लेने आती थीं। इस फतवे का संभवतः यह आशय हो सकता है कि इस्लामी महिलाएं लाज-शर्म में रहें। वैसे भी आये दिन कामकाजी महिलाओं की यौन शोषण की शिकायतें आती रहती है। अगर वह तड़क-भड़क से दूर रहेंगी तथा मर्दों से अधिक नजदीकियां नहीं बढ़ाएंगी तो वह उनके शोषण से मुक्त रहेंगी। कट्टर इस्लामी देशों में भी औरतें काम करती हैं। पाकिस्तान जैसे इस्लामी देश में औरत ने देश की कमान संभाली है।
फतवा फरमान नहीं होता
वस्तुतः फतवा कोई फरमान नहीं होता जिसकी तामील की जाये। वैसे भी मजहबी ठेकेदारों को अपने मजहबी लोगों पर शिकंजा कसने में मजा आता है। मुल्ला और पुजारी नहीं चाहते कि लोग विवेकशील हों। इन फतवों की परवाह कौन करता है। यह कोई फरमान नहीं जिसे मानने के लिए बाध्य हों। वैसे इन फतवों से मुसलमानों का अहित ही हो रहा है जो आज के दौर में भी बेकारी, भुखमरी और अशिक्षा के वातावरण में जी रहे हैं।
फतवे व्यक्तिगत होते हैं
वैसे इस फतवे पर बेकार में ही हाय-तोबा हो रही है। इस तरह के कई फतवे जारी हुए हैं। लेकिन तरक्कीपसंद और शिक्षित मुसलमानों ने उसे गम्भीरता से नहीं लिया। अगर इन मुल्लाओं का मुसलमानों में इतना ही दखल होता तो हमारे फिल्म-जगत में एक भी मुस्लिम-औरत नहीं होती। फतवा तो सानिया मिर्जा के खिलाफ भी दिया गया था लेकिन उसका क्या हश्र हुआ। सभी जानते हैं।
औरत पर कामकाजी पाबंदी नहीं
इस्लाम में औरत के कामकाज पर कोई पाबंदी नहीं है। वह हिजाब में रहे। अपनी हया और शर्म को बरकरार रखें। उत्तेजक पोशाकों से अपने को महरूम रखें। पर्दा मुस्लिम जगत ही नहीं हिंदुओं में भी है। आज भी देहातों में पर्दा प्रथा है। अपने से बड़ों के सामने पर्दा करना हमारी परम्परा रही है। इस्लामी महिला बिना अत्याधुनिका बने भी प्रगति का सोपान पा सकती है। वैसे शर्म और हया ही औरत का जेवर है। इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता।
फतवा संविधान के खिलाफ
भारतीय संविधान इस देश में रहने वाले प्रत्येक स्त्री-पुरुष को को समानता का अधिकार देता है। हर किसी को पढ़ने-बढ़ने और काम करने की आजादी है तो फिर मजहबी लोग कौन होते हैं पाबंदी लगाने वाले। इस तरह के फतवों से अन्ततः मुस्लिमों का ही नुक्सान होगा जिसकी ठेकेदारी का दम फतवा देने वाले भरते हैं। देश की मुख्यधारा में आने के लिए मुस्लिम महिलाओं को और अधिक शिक्षित होकर देश के निर्माण में अपनी भागीदारी को अंजाम देना होगा।