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रविवार, 21 नवंबर 2010

हिंदी की उपेक्षा के दुष्परिणाम

यह कितना विरोधाभाष है कि एक ओर तो हम हिंदी को संयुक्त राष्ट्रसंघ में मान्यता दिलाना चाहते है दूसरी ओर हमारे देश में ही उसकी दुर्गति हो रही है। अभी उत्तर प्रदेश पीसीएस मुख्य परीक्षा का परिणाम आया है। इसमें शर्मनाक बात यह है कि 450 प्रतिभागी हिंदी विषय में फेल हैं। यह स्थिति अत्यंत निराशाजनक ही नहीं अपितु हमारी शिक्षा प्रणाली को भी सवालों के घेरे में खड़ा करती है। जिस प्रदेश ने हिंदी को समूचे विश्व को परिचित कराया। प्रदेश की सरकारी काम-काज की भाषा हिंदी है फिर इसी विषय में कुल प्रतिभागियों में से 10 फीसदी का अनुत्तीर्ण होना हमारी दिशाहीनता को इंगित करता है। इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि मुख्य परीक्षा में अधिकांश सफल प्रतियोगियों के हिंदी में नम्बर भी केवल पास लायक ही होंगे। युवाओं को इस वास्तविकता से परिचित होना चाहिए कि प्रशासन में आने के लिए हिंदी का ज्ञान आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य है। केवल अंग्रेजी रटने से वह प्रशासनिक सेवाओं में कभी नहीं आ सकते। यहां के लोगों की मातृभाषा भी हिंदी है। अतः इस भाषा में फिसड्डी रहना शिक्षा जगत के गाल पर तमाचा है। इस स्थिति के लिए कौेन जिम्मेदार है ? जिस भाषा को हमने मां की घुट्टी के रूप में प्राप्त किया है! उसमें हमारी कमजोरी दर्शाती हैे कि शिक्षा जगत अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन नहींे कर पा रहा है। जब प्रतियोगी हिंदी में ही फेल हैं तो उनके इतिहास, गणित, विज्ञान आदि अन्य विषयों में योग्य होने की उम्मीद करना बेकार है। इस स्थिति के लिए सरकार के साथ अभिभावक भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। उन पर अंग्रेजी का ऐसा भूत सवार हुआ है कि वह अपने बच्चों को कुकुरमुत्तों की तरह उगे कथित इंग्लिश मीडियम स्कूलों में प्रवेश कराकर गर्व का अनुभव करता है। बच्चा स्कूल में अधकचरे शिक्षकों से अंग्रेजी पढ़ता है और घर आकर हिंदी के वातावरण में चहलकदमी करने लगता है। इस विरोधाभास का दुष्परिणाम यह होता है कि बच्चा न तो अंग्रेजी भाषा में प्रवीणता प्राप्त कर पाता है और अंग्रेजी के चक्कर में अपनी मातृभाषा को भी भूल जाता है। इसका खामियाजा उसे आगे चलकर भोगना पड़ता है। हम वर्तमान परिप्रेक्ष्य की अनदेखी नहीं कर सकते कि अंग्रेजी विश्वभाषा का रूप धारण करती जा रही है। लेकिन हिंदी की कीमत पर विदेशी भाषा को आत्मसात करना न तो ज्ञान के लिए उचित है और न ही विज्ञान के लिए। हर व्यक्ति में विचार का प्रादुर्भाव उसकी अपनी भाषा में होता है। उसकी मेधा और ऊर्जा भाषा से ही प्रेरित और प्रभावित होती है। हिंदी की यह उपेक्षा केवल शिक्षा जगत में ही नहीं अपितु सभी जगह अपने पांव पसार चुकी है। मातृभाषा के अभाव में हमारा चिंतन मौलिक नहीं होता। जब चिंतन मौलिक नहीं होगा तो हम किस प्रकार नये अनुसंधान और शोध कर पायेंगे।

दिशाहीनता के शिकार भारतवासी



‘‘भारत ने अपना लगभग सब कुछ खो दिया-उसने अपनी आत्मा तक खो दी है। लेकिन हमें फिर भी चिंतित नहीं होना चाहिए और आशा नहीं छोड़नी चाहिए। किसी कवि ने कहा है, तुमको अपना पौरुष फिर से प्राप्त करना है। हां, अवश्य ही फिर से मनुष्य बनना है। इस सुन्दर भारत देश में इस समय ऐसे लोग विचर रहे हैं जारे निर्जीव अतीत की प्रेतात्माओं के समान हैं। चारों ओर निराशा है, मौत है, आरामतलबी है, बीमारी है, अटूट दुख है-भारत के सम्पूर्ण क्षितिज पर दुर्भाग्य के बादल छा गये हैं। ....लेकिन इस सम्पूर्ण निराशा,ज ड़ता, निर्धनता और भुखमरी के होते हुए भी तथा एक ओर भूख से पीड़ित लोगों की चीख-पुकार को डुबोते हुए, और दूसरी ओर विलासिता के दलदल में फंसे लोगों की पाखंडपूर्ण खिलखिलाहट को अनसुनी करते हुए, हमें दुबारा भारत का राष्ट्रीय संगीत छेड़ना है और वह है..........उत्तिष्ठ, जाग्रत।...उठो, जागो।’’

लगता है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा 27 दिसम्बर 1915 को अपने मित्र हेमंत कुमार सरकार को लिखे पत्र के यह अंश आज के भारत सी सच्ची तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हों। लगभग एक शतक होने के बाद भी भारत माता की वेदना में कोई अंतर नहीं आया है। हमने आजादी भले ही प्राप्त कर ली लेकिन अपनी आत्मा को खो दिया है। हमें पता ही नहीं कि हम किसके लिए और क्यों जी रहे हैं। न हमारे कोई सपने हैं और न ही राष्ट्रीय सरोकारों से हमें कोई मतलब रह गया है। हमारा राष्ट्रीय चरित्र खो चुका है। सिर्फ स्वार्थ-साधना ही हमारे जीवन का एकमात्र लक्ष्य बनता जा रहा है। देश दो भागों में बंट चुका है। एक और वह भारत है, जहां संपन्नता है, खुशी है। मस्ती है। संवेदनशून्यता है। अहंकार है। वहीं दूसरी ओर असली भारत है। जहां गरीबी है। बेरोजगारी है। शोषण और अत्याचार है। निराशा और चीत्कार है। अफसोस इस बात का है कि किसी भी देश की असली ताकत उसकी युवा शक्ति होती है। लेकिन लगता है कि उनके भी सपने मरते जा रहे हैं। शिक्षाध्ययन के बाद उनका एकमात्र लक्ष्य रोजगार पाना ही रह गया है। रोजगार पाने के बाद वह भी इसी सड़ी-गली व्यवस्था का अंग हो जाता है। लेकिन इसके लिए युवाओं को दोेषी नहींे ठहराया जा सकता। हम आजादी के बाद अपने लोगों को सपने तो आसमान से ऊंचे दिखाते रहे लेकिन उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं से महरूम रखा। यही कारण है कि युवाओं के सामने पहली प्राथमिकता अपने जीने के अस्तित्व की है। इसीलिए छात्र जीवन में कभी मार्क्स और कभी लोहिया दर्शन की बात करते नहीं अघाता युवा कालांतर में यथास्थितिवादी हो जाता है। ऐसे हालात में नहीं लगता कि हम देश को आगे ले जाने का साहस रखते हैं। केवल भौतिक विकास ही मनुष्य का वास्तविक विकास नहीं है। अगर लोगों में मानवीयता ही मर जाये तो ऐसे लोगों और पशुओं में अंतर ही कहां रह जाता है। यह देश का सामने बहुत बड़ा खतरा है। जिस आजादी के लिए कुर्बानियां दी गईं । उन शहीदों का नाम लेने वाला भी कोई नहीं है। सिर्फ स्वतंत्रता दिवस के दिन हम उन्हें रस्मी तौर पर याद कर लेते हैं। जब हमारे जीवन के आयाम ही बदल चुके हैं तो फिर कैसे जागेगा भारत। भूखा भारत कब तक इंतजार करता रहेगा विकास की भोर का। जीवन के हर क्षे़त्र में निराशा का वातावरण है। नैतिक मूल्यों की होली जलाई जा रही है। समाजसेवा का प्रतीक राजनीति अपने पथ से च्युत हो गई है। शिक्षा और चिकित्सा बाजारू हों गईं हैं। पहले लोग दूसरे के लिए जीने में विश्वास रखते थे लेकिन बदलते परिवेश मे वह दूसरों की जान की कीमत पर जी रहे हैं। आखिर हमारे इस स्वार्थपूर्ण आचरण का क्या परिणाम होगा। इस पर हमने विचार नहीं किया है। इसी प्रकार अगर लोगों में हताशा और निराशा बढ़ती गई तो निसंदेह शांति नहीं रहेगी। इसका खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ सकता है जो विलासिता में आकंठ डूबे हैं और जिनके कान में भूखों की चीत्कार नहीं पहुंच पा रही है। हमें अपने विकास मॉडल पर पुनर्विचार करना होगा। कुछ लोगों के विकास के लिए असंख्य लोगों को उजाड़ना बंद करना होगा। सामाजिक संरचना की अनदेखी के बिना विकास अधूरा है। क्या यह हमारे निजाम और कथित सभ्य समाज के गाल पर तमाचा नहीं है कि जहां मिड डे मील खाने से बच्चे इस लिए मना कर देते हैं कि उसे किसी दलित ने बनाया है। जाति और धर्म में जकड़ा भारत सुभाष के सपनों का कैसे भारत बनायेगा और कैसे अपने अस्तित्व के लिए हुंकारेगा....उठो, आगे बढ़ो।

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

मदन मोहन 'अरविन्द' को विशेष अकादमी सम्मान


जालंधर स्थित लायंस भवन के सभागृह में आयोजित एक भव्य समारोह में पंजाब कला साहित्य अकादमी द्वारा मदन मोहन 'अरविन्द' को विशेष अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया. इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश के पूर्व बागवानी मंत्री ठाकुर सत्य प्रकाश के हाथों प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिन्ह भेंट किये गए. समारोह में मिजोरम और आन्ध्र प्रदेश सहित देश के अठारह राज्यों से आये अनेक साहित्यकार और हिंदी सेवी उपस्थित थे. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं पंजाब के स्थानीय निकाय मंत्री श्री मनोरंजन कालिया के अतिरिक्त पंजाब की अन्य गणमान्य विभूतियाँ भी इस समारोह से जुडी रहीं.
विदित रहे कि मदन मोहन 'अरविन्‍द' हिंदी साहित्‍य के जाने माने रचनाकार हैं। कविता से लेकर गजल तथा कहानी लेखन में भी आप पारंगत हैं। देश की प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं अक्‍सर प्रकाशित होती रहतीं हैं। आकाशवाणी के विभिन्‍न केन्‍द्रों द्वारा भी आपकी रचनाएं प्रसारित होती हैं। उनके इस सम्‍मान पर जनसंदेश टाइम्‍स के संपादक डा। सुभाष राय, चर्चित ब्‍लॉगर अविनाश वाचस्‍पति, डा. महाराज सिंह परिहार आदि ने हर्ष व्‍यक्‍त किया है।

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

दीपावली पर सिसकते दीये

दीपों के पर्व दीपावली की चारों ओर धूम मची हुई है। शेयर बाजार आसमान पर चढ़कर हमारी आर्थिक समृद्धि का उद्घोष कर रहा है! सरकारी आंकड़ों की बाजीगAरी से देश की विकास दर बढ़ रही है लेकिन जमीन पर गरीबी अपना तांडव नृत्य कर रही है। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया व अखबार विलासिता के उत्पादों के विज्ञापनों से भरे हुए हैं। कहीं सोने की गिन्नी बिक रही है तो कहीं जड़ाऊ आभूषण। एलसीडी टीवी के साथ ही मंहगे परिधानों की एक से एक बढ़कर दिलकश रेंज है। महंगी कारों की बिक्री के रिकार्ड टूट रहे हैं। अतः दीपावली को देखकर लगता नहीं कि यहां कोई गरीबी है। चारों ओर देखकर मन भ्रमित हो जाता है कि किस प्रकार लक्ष्मी पैसों की मुक्त हस्त से बरसात कर रहीं हैं। इस जगमग और चकाचौंध से परे हटकर हम उन मलिन बस्तियों व गांवों को देखें जहां आज भी दो जून की रोटी के लाले पड़े हैं। गर्मियों में वह प्यासा मरता है क्योंकि उसके पास पानी खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। अब वह ठंड में वस्त्रों के अभाव में जान देगा। दवा-दारू के बिना तो वह हर समय मरता ही रहता है। वैसे भी गरीब की यही नियति है कि वह चाहे अकाल से मरे, बाढ़ अथवा भूकंप से मरे। भूखा मरे या प्यासा मरे। हमारे निजाम को इसकी कोई चिंता नहीं है। अखिर दीवाली का क्या यही संदेश है कि हमस ब घरों की रोशनी को छीनकर अपने घरों में कैद कर लें और इतना पुखता इंतजाम कर लें कि समृद्धि और शांति की एक भी किरण उन मजलूमों के घर नहीं पहुंचे ? आखिर कौन सुनेगा इनकी फरियाद ? अब त्रेता तो है नहीं कि श्रीराम बालि और रावण की भांति गरीबी और भ्रष्टाचार का वध कर दें। द्वापर भी नहीं है कि कृष्ण-कन्हैंया अपनी मुरली की तान से हमारे सारे कष्टों को हर लें। अब जमाना न किसी भगवान का है और न किसी राजा का। प्रजा ही राजा का चुनाव करती है। इतनी शक्तिशाली होने के बाद भी वह आज भूख और लाचारी से क्यों चीत्कार कर ही है। इस प्रश्न पर चिंतन करना होगा कि आखिर गलती कहां हो रही है ? उसके हितों पर डाका कौन डाल रहा है। लगता है कि हमारे नेताओं और समाजसेवियों की प्राथमिकता सूची से गरीब गायब है। तभी तो सारी योजनाओं का लाभ उस वर्ग को मिल रहा है जिसके पास पहले से ही सब कुछ है। ऐसा नहीं है कि हमारी सरकारें इन गरीबों की खुशी के लिए कुछ नहीं कर रहीं लेकिन उस विकास के दीपक को दलालों और भ्रष्ट नौकरशाही ने अपना गुलाम बना लिया है। परंतु अफसोस इस बात का है कि आम लोगों की दीवाली छीनने वाले निर्मम और क्रूरता की पराकाष्ठा पार कर रहे हैं। मिलावट ने इस पर्व को बेरौनक और अपावन बना दिया है। आज लोग देशी घी के दीपक के स्थान पर चर्बी का दीपक जलाने का विवश हैं। सिंथेटिक मिठाइयों से लक्ष्मी-गणेश का भोग लगाने को अभिषप्त हैं। जब तक ऐसे तत्व दीपावली के पर्व को कलंकित करते रहेंगे तो कहां मिटेगा अंधकार। एक बात हम बड़े गर्व से कहते हैं कि वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा के हमीं सर्जक है। अगर है तो वह यथार्थ में क्यों नहीं दिखाई देता। आखिर गरीब कब तक इंतजार करता रहेगा सच्ची दीपावली का। जब उसके यहां ज्ञान, धन और सम्मान की किरणें जगमग होंगी। उसके बच्चे किसी अमीर के बच्चों को पटाखें या फुलझड़ी चलाते बेवसी से नहीं निहारेंगे। वह भी फटे चिथड़ों के स्थान पर नये वस्त्र पहनकर लक्ष्मीजी की पूजा अर्चना करेंगे। वास्तव में सच्ची दीपावली तभी होगी जब हर व्यक्ति खुशहाल होगा। सत्य, अहिंसा, दया, करुणा और मैत्री की धारा बहेगी। हर अंधेरे में दीपक जलेगा और अज्ञान रूपी अंधकार को चीरेगा। मिलावटखोरी का अंत होगा। भ्रष्टाचार का खात्मा होगा। दरिद्र पर नारायण की कृपा होगी। अपमान, सम्मान में बदलेगा। अभाव का सिसकता चेहरा खुशी से दमकेगा। समाज में असमानता के स्थान पर समरसता अपना परचम लहरायेगी।

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

मानव की उत्पत्ति ईश्वर या विज्ञान से


मानव की उत्पत्ति ईश्वर ने क़ी या विकास क़ी प्राकृतिक प्रक्रिया से

डा. चन्द्रभान

मनुष्य की उत्पत्ति कब और कैसे हुई ? यह एक अनसुलझी पहेली है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सारे ब्रह्माण्ड का रचयिता भगवान है। वह सर्वव्यापी एवं सर्वशक्तिमान है। उसी ने चांद, तारे, ग्रह, उपग्रह, जल-थल, पेड़ एवं समस्त जीवों की रचना की है। मानव का पृथ्वी पर आगमन भी उसकी इच्छा और कृपा से हुआ है। वैज्ञानिक विचारधारा इसके बिल्कुल विपरीत है। विभिन्न क्षेत्रों मेंकिए गए अनुसंधानों से वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैंकि पृथ्वी का प्रत्येक प्राणी विकास की एक प्राकृतिक प्रक्रिया की उपज है। इस प्रक्रिया के अनुसार भिन्न भिन्नजीवों की उत्पत्ति भिन्न-भिन्न समय पर तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के भौगोलिक परिवेश में होती है।
आदिकाल से लेकर आजतक पृथ्वी के प्राकृतिक वातावरण में अनगिनत बदलाव आये हैं। इस बदलते पर्यावरणके अनुकूल बनाने के लिए प्रत्येक जीव अपने अंदर अनेकों परिवर्तन करता है तथा विकास की विभिन्नअवस्थाओं से गुजरता है। चिंपैंजी और गोरिल्ला से लेकर आजतक मनुष्य ने भी विकास की विभिन्नअवस्थाओं से गुजरते हुये आधुनिक स्वरूप धारण किया है। धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार भगवान ही जीवन देताहै तथा एक दिन वही इसका अन्त कर देता है। वैज्ञानिकों का मत है कि जीव एक निर्धारित मात्रा में ईधनलेकर स्वयं विकसित होता है और ईधन का समाप्ति पर स्वतः ही समाप्त हो जाता है। न कोई इसे मारता है न हीकोई इसे जन्म देता है। एक अध्ययन के अनुसार, सूर्य भी 7.6 बिलियन वर्षों के बाद अपने ईधन की समाप्ति केपश्चात् स्वतः ही नष्ट होकर ब्लैक होल में परिवर्तित हो जायेगा तथा अपने चारों ओर स्थित सभी ग्रहों तथाउपग्रहों को निगल जायेगा। विकास और विनाश की यह प्रक्रिया सतत् है इसी प्राकृतिक प्रक्रिया के कारणप्रत्येक प्राणी का जन्म होता है तथा इसी के कारण उसका अन्त हो जाता है।
धार्मिक विद्वानों का मानना है कि आज से अरबों वर्ष पूर्व भगवान ने ऋषि मनु के रूप प्रथम पुरुष तथा शतरूपा के रूप में प्रथम स्त्री की रचना की और सृष्टि की वृद्धि का दायित्व उन पर सौंपा। इस दम्पत्ति ने सनक, सनातन, सनन्तकुमार एवं सनन्दन नामक चार पुत्रों को जन्म दिया। परन्तु इन चारों पुत्रों ने शादी नहीं की और आजीवनब्रहम्चर्य का पालन किया। अतः प्रभु का सौंपा गया कार्य सम्पूर्ण नहीं हो सका। भगवान ने फिर नारद मुनि कोइस कार्य के लिये मृत्यु लोक में भेजा। लेकिन नारद जी भी सृष्टि की वृद्धि में कोई योगदान नहीं कर पायेक्योंकि उन्होंने अपने जीवनकाल में किसी कन्या से विवाह नहीं किया। अन्त में इस पुनीत कार्य का शुभारम्भकश्यप ऋषि ने अपनी पत्नी अदिति एवं दिति के सहयोग से किया। ऐसा कहा जाता है कि अदिति से देवताओंकी उत्पत्ति हुई तथा दिति से असुरो का जन्म हुआ। इसके पश्चात् सुरों और असुरांे के परिवारों में निरन्तरवृद्धि होती गयी और वसुन्धरा पर मनुष्यों का आधिपत्य होता चला गया।
इस धार्मिक अवधारण के अनुसार जिस मानव को प्रथम बार पृथ्वी पर भेजा, वह आदि मानव शारीरिक एवंमानसिक रूप से पूर्णतः विकसित था। आज के मनुष्य की तुलना में वह अधिक बलशाली, बुद्धिमान एवंतपस्वी था। असम्भव से असम्भव कार्य करने में वह समर्थ था। नारद जी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहस्वर्गलोक और मृत्युलोक में सशरीर भ्रमण कर सकते थे। इसके पश्चात् रामायण एवं महाभारत काल में पैदाहोने वाले पुरुष भी आधुनिक मनुष्य से अधिक बलवान थे। इस युग में जन्म लेने वाला कोई भी व्यक्तिमहाभारत के भीम जैसा बलशाली नहीं है जो हाथियों को उठाकर आसमान में फेंक दे। हमारा बड़ा से बड़ातीरन्दाज भी अर्जुन की तरह घूमती मछली की ऑख की परछाईं को देखकर भेद नही सकता। आज तक इसयुग में किसी ऐसे शिशु का जन्म नहीं हुआ है जिसने गर्भावस्था में ही चक्रव्यूह तोड़ने की विद्या सीख ली हो।ओलम्पिक में गोल्ड मेडल जीतने वाले आज के धनुष धारी में भी इतना सामर्थ्य नही है कि वह भीष्म पितामहकी भांति बाणों से गंगा नदी का बहाव रोक सकें।
विभिन्न काल की चटट्ानों में छिपे पड़े कंकालों एवं जीवांशा के अध्ययन से पता चलता है कि जब पृथ्वी परजीव के पनपने के लिये उपयुक्त वातावरण उपलब्ध हो जाता है तब ही जीव का धरा पर आगमन होता है। ईसासे लगभग 600 मिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी का थल एवं वायुमण्डल बहुत गर्म था। इस प्रकार के पर्यावरण में किसीभी प्रकार के जीव का विकसित होना सम्भव नहीं था। अतः इस युग में करोड़ों वर्षों तक पृथ्वी बिना जीवन केवीरान ही पड़ी रही। यही कारण है पृथ्वी के इस प्राचीनतम प्रारम्भिक युग को अजोईक अथवा जीवन-रहित युगकहा जाता है। धीरे धीरे पृथ्वी ठन्ड़ी होती गयी। प्रीकैम्ब्रियन युग के आते-आते, पृथ्वी पर कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुये। हाइड्ोजन और आक्सीजन गैसों मिलने से जल की उत्पत्ति हुई और वसुन्धरा के धरातल पर सागरों एवं महासागरों का उद्भव हुआ। धरती पर जीवन की शुरूआत पहली बार इन सागरों के जल से ही हुई।जल से उत्पन्न हुये जीवों का शरीर बहुत कोमल था। पौधो पर फूल नहीं खिलतें थे। इसीलिए इस युग के पौधोंको नान फलॉवरिंग अर्थात् फूलरहित कहा जाता है। जैसे-जैसे समय और परिस्थियां बदलती गयी, जीवों मेंपरिवर्तन होते गये। कुछ जीव लुप्त हो गये तथा कई नई प्रजातियों का अभ्युदय हुआ। ईसा से लगभग 500 मिलियन वर्ष पूर्व, कैम्ब्रीयन युग में सागरों में ऐसे जीवों की भरमार हो गई थी जिनमें रीद की हड्डी ही नहींथी। इन जीवों को इनवर्टीब्रेट कहा जाता है। जल की रानी मछली का पर्दापण आज से 350 मिलियन वर्ष पूर्व हुआ। सिल्युरियन काल की इस मछली में फेफड़े नहीं थे। करोडों वर्षों के पश्चात् मछलियों ने अपने शरीर में फेफड़ों का विकास किया। इसी काल में जमीन पर पनपने वाले पौधों की भी उत्पत्ति हुई। परन्तु इस काल के आते-आते उन जीवों का पृथ्वी से बिल्कुल सफाया हो चुका था, जिनके शरीर में रीढ़ की हड्डी नहीं थी।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, धरा के पर्यावरण में भारी बदलाव आते गये। जो जीव इन परिवर्तनों के अनुसारअपने आप को ढाल नही सके, वे हमेशा के लिये विलुप्त हो गये। एम्फीबियन प्रजाति के जीव, जो जमीन पर रहसकते थे तथा पानी में भी, आज से 320 मिलियन वर्ष पूर्व डिवोनियन काल में पृथ्वी पर प्रकट हुये। मैसोजोइकयुग के जुरासिक काल में डायनासोर का आगमन हुआ। इस भारी भरकम जीव ने लगभग 90 मिलियन वर्षों तक पृथ्वी पर साम्राज्य किया। परन्तु एक उल्कापिण्ड के पृथ्वी से टकराने से भूमण्डल का पर्यावरण इतना धूल-धूसरित हो गया कि सूर्य का प्रकाश भी कई वर्षों तक जमीन तक नहीं पहुंच पाया। पर्यावरण के इस बदलाव को डायनासोर सहन नहीं कर सके और आज से 65 मिलियन वर्ष पृथ्वी से हमेशा के लिये गायब होगये। पृथ्वी के भूगर्भिक इतिहास के टरशियरी काल को स्तनधारी जीवों का युग कहा जाता है। ह्वेल मछलिया, चमगादड़, बन्दर, घोड़े इत्यादि स्तनधारी जीव इसी काल में पृथ्वी पर आये। इस समय तक पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के पेड़ पौधों की भरमार हो चुकी थी। इनमें फल देने वाले वृक्ष भी शामिल थे। ऐसी घास जिनसे गेंहू, जौ, चावल और अन्य कई प्रकार के खाद्यान्न प्राप्त होते हैं जगंली पौधों के रूप में जगह-जगह उगने लगी थी।आज से 30-45 लाख वर्ष पूर्व जब टरशियरी काल अपने अन्तिम चरण में था, मनुष्य का पर्दापण हुआ।
अफ्रीकी महाद्वीप के इथोपिया देश में मिला लुसी फौसिल और अर्दी फोसिल जो क्रमशः 32 लाख एवं 44 लाख वर्ष पुराने हैं, इस बात का प्रमाण है। ये आदिमानव के प्राचीनतम फोसिल है। इन दोनों फोसिल की लम्बाई लगभग एक मीटर ही थी। यह तथ्य इस बात को प्रमाणित करता है कि इस युग का मानव पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाया था। उसके शरीर का कद भी छोटा था तथा उसके हाथ, पैर, उंगलियां और मस्तिष्क भी बहुत छोटा था। जैसे जैसे समय बीतता गया, मनुष्य के शरीर और मस्तिष्क में बहुत धीमी गति से व्यापक सुधार होते गये। लन्दन के इम्पीरियल कॉलेज के एक अध्ययन के अनुसार पाषण युग के आदि मानव को अपने दिमाग को उस क्षमता तक विकसित करने में लगभग बीस लाख वर्ष लगे ताकि वह पत्थर क़ी कुल्हाड़ी बना सके. मेधावीअथवा बुद्धिमान मानव जिसे हम होमोशेपियन कहते हैं और जिनको हम अपना सबसे नजदीकी पूर्वज मानते हैं, का अभ्युदय आज से लगभग 30,000 वर्ष पाषण युग में हुआ था। यह हमारा पूर्वज जंगलों से फल इकट्ठा करता था, हड्डियों एवं पत्थरों से बने हथियारों से शिकार करता था। तेज दौड़ने वाले पशुओं का शिकार करने के लिये उसने घोड़े को पालतू बनाया तथा उस पर चढ़कर हथियार चलाने की कला विकसित की। अपने पालतु पशुओं की जंगली जानवरों से रक्षा करने के लिये उसने भेड़ियों को पाला और प्रशिक्षित किया। आगे चलकर इन पालतू भेडियों ने कुत्ते का रूप धारण कर लिया। विकास की प्राकृतिक प्रक्रिया का यह सर्वोत्तम उदाहरण है।
मनुष्य में अधिकांश बदलाव जलवायु में निरन्तर होने वाले परिवर्तन के कारण आये। हिमयुग के अन्तिम चरण के समय जब हिमालय की निचली पहाड़ियां और घाटियां भी बर्फाच्छादित हो गई थीं तब यहां का आदिमानव दक्षिण में पठारी भाग की ओर प्रस्थान कर गया था। यहां की जलवायु आवास के लिये उपयुक्त थी। दुनिया में सबसे पहला स्थानातरण मनुष्य ने शायद जलवायु परिवर्तन के कारण ही किया था। पठारों परपत्थरों की बहुतायत होने के कारण यहां मनुष्य ने पत्थरों से औजार एवं भवन बनाने की कला में निपुणता प्राप्त की थी। संसार की सांस्कृतिक इतिहास का यह पाषण युग था। सीता माता का पहाड़ी गुफा में कुछ समयबिताना, किष्किन्धा के सम्राट बालि का एक राक्षस के साथ गुफा में युद्ध करना, श्रीराम का समुद्र पर पत्थरों का रामसेतु बनाना, इस बात की ओर संकेत करता है कि शायद राम-रावण युद्ध पाषाण युग में लड़ा गया था। इस युद्ध में किसी भी योद्धा ने तलवार का प्रयोग नहीं किया था। इससे सिद्ध होता है कि अभी मनुष्य ने लौह धातु से हथियार बनाने की कला विकसित नहीं कर पाया था। यद्यपि वह प्रगति की ओर बढ़ता हुआ हन्टिग अवस्था से काफी आगे निकल चुका था। शिवालिक पर्वत की घाटियों में मिली मानव हड्डियों के अध्ययन से ऐसे संकेतमिले हैं कि यह मानव ही हमारा पूर्वज था, जो उत्तरी भारत की अत्याधिक ठन्ड से बचने के लिये दक्षिण के पठारों पर जाकर कुछ समय के लिये बस गया था। अब वह पशुपालन एवं कृषि की ओर अग्रसर हो रहा था।चारागाह बनाने तथा खेती करने के लिये उसे जमीन से जंगल साफ करने की आवश्यकता पड़ी। पेड़ो को हड्डीया पत्थरों के औजारों से काटना सम्भव नहीं था। अतः उसने लोहे जैसी कठोर धातु खोज निकाली। लौह युगका व्यक्ति पाषाण युग के मानव की तुलना में बहुत अधिक विकसित हो चुका था। अपनी बुद्धि के बल पर वहप्रकृति का मास्टर बन चुका था। रोज नये-नये आविष्कार करता जा रहा था। कृषि में काम आने वाली अनेकवस्तुये जैसे हल, बैलगाड़ी, घोड़ा गाड़ी, रंहट, कुएं इत्यादि उसने स्वयं ही बनाये थे। ये औजार उसे किसी देवी, देवता की घोर तपस्या करने पश्चात् आशीर्वाद रूप में प्राप्त नहीं किये थेे। आधुनिक युग का आदमी पाषण, तांबा तथा ब्रोन्ज युग के मानव से अत्याधिक सशक्त एवं बुद्धिमान बन चुका है। पिछले कुछ शतकों में उसमें तेजी से विकास हुआ है। अपने विकसित मस्तिष्क के कारण, आशातीत गति से अब वह सफलता की नई ऊंचाइयां छूता जा रहा है। आधुनिक मानव के पैर चन्द्रमा के धरातल को छू चुके है। मंगल ग्रह पर कदम रखने के लिये वह व्याकुल है। शत्रुओं की सेना को नेस्तनाबूद करने के लिये, अब उसे अर्जुन के गान्डीव धनुष, भीमकी गदा या अन्य किसी दिव्य अस्त्र की आवश्यकता नहीं है। अब उसने अपने लिये अणु बम्ब ,अन्तर्राष्टीय महाद्वीपीय मिसाइल, पैंटन टैंक जैसे हथियारों का आविष्कार कर लिया है। ये हथियार रामायण और महाभारतकाल के दिव्य अस्त्रों से कई गुणा अधिक घातक है। भेड़ का क्लोन वह बना चुका है। मानव की हूबहू-शक्ल का क्लोन बनाने के लिये वह आतुर है। कृत्रिम ह्रदय बनाकर तथा एक 15 वर्षीय इटली के बालक में सफलता पूर्वक प्रत्यारोपित करके उसने सिद्ध कर दिया है कि उसके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। आज का मानव ब्रहमाण्ड का मास्टर है। आश्चर्य चकित कर देने वाला उसका प्रत्येक आविष्कार इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक मानव का बौद्धिक विकास तीव्रता से हो रहा है। आज का हर व्यक्ति कल के आदमी से बेहतर है। हमारे बच्चेहमसे ज्यादा बुद्धिमान हैं और मानसिक एवं बौद्धिक दृष्टि से ज्यादा विकसित है। वास्तव में अब यह कहावत सिद्ध होती जा रही है क़ी चाइल्ड ऑफ़ द फादर ऑफ़ मैन।
हमारी धार्मिक अवधारणा विकास की थ्योरी का सर्मथन नही करती।हिन्दू धर्म की पौराणिक कथाओं के अनुसार, पृथ्वी पर भगवान द्वारा प्रेषित प्रथम पुरुष शारीरिक एवं बौद्धिक दृष्टि से पूर्णतयाः विकसित था तथा आज के मनुष्य की तुलना में वह अत्यधिक बलवान एवं सामर्थ्यवान था। उसके कुछ वशंज इतने बलवान थे कि वे हिमालय या गोवर्धन पर्वत को हाथ में उठा सकते थे तथा सागर को छलांग मारकर, पार कर सकते थे। परन्तु हमारी दस अवतारी परिकल्पना विकास की प्रक्रिया का समर्थनकरती है। हमारे दस अवतारों में सबसे पहला अवतार मछली के रूप में पृथ्वी पर प्रकट हुआ जो मत्यस्य अवतार कहलाया। इसका अर्थ है कि हिन्दु माइथोलोजी इस वैज्ञानिक सत्य को स्वीकारती है कि पृथ्वी परजीवन का प्रारम्भ जल से ही हुआ था। कच्छप या कछुआ हमारा दूसरा अवतार था। यह अवतार एम्फीबियन प्रजाति के जीवों का प्रतिनिधित्व करता है जो जल में रह सकते हैं तथा जमीन पर भी। विकास की थ्योरी में तीसरे क्रम में वे जीव आते हैं, जो केवल जमीनपर ही पनप सकते है।
हमारा तीसरा ब्रहा अवतार उन जीव का प्रतीक है, जो जीव केवल जमीन पर ही जिन्दा रह सकते हैं। भगवानविष्णु ने चौथा अवतार नरसिंह (आधा नर तथा आधा शेर) के रूप में लिया था। यह ऐसा प्राणी था जो पूरी तरहसे मनुष्य रूप में पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाया था। इसी लिये यह आधा मनुष्य तथा आधा शेर जैसा था शायद यह विकास की थ्योरी का swaroop था। समय का पहिया घूमता गया और जीवों में सुधार होता गया। हमारा पांचवा वामन (मनुष्य का बौना स्वरूप) अवतार विकास प्रक्रिया की उस अवस्था का प्रकट करता है जबआदि मानव पूर्ण रूप से मनुष्य का स्वरूप धारण कर चुका था। लेकिन यह बहुत छोटे कद का मानव थाइसीलिये इसे वामन (बौना) अवतार कहा गया है। वैज्ञानिको के द्वारा खोजे गये मनुष्य के सबसे पुराने लूसी तथा अर्दी के फोसिल का कद भी छोटा ही था। लूसी तथा अर्दी का छोटा कद प्रमाणित करता है कि हमारेप्राचीनतम पूर्वज भारी भरकम इन्सान नहीं थे। उनके शरीर एवं मस्तिष्क का विकास धीरे धीरे ही हुआ था। परशुराम जी हमारे छठे अवतार थे। जो सम्पूर्ण मानव के रूप में पृथ्वी पर प्रकट हुये। इसके बाद सातवें, आठवें, तथा नौंवे सभी अवतारों में पूर्णतया विकसित मानव की छवि दृष्टिगोचर होती है। हमारा दसवां कलिका अवतार जब अवतरित होंगे, वह भी मनुष्य रूप में ही प्रकट होंगे। अब कोई भी अवतार कच्छप या मत्यस्य रूप में अवतरित नहीं होंगे। इस प्रकार दस अवतारों का पृथ्वी पर अवतरित होने की घटना विकास की थ्योरी को प्रमाणित करती है।

(लेखक प्रख्यात भूगोलविद तथा अध्येता हैं)
मोबाइल- 9411400657

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

क्या बदलेगी पंचायतों कि तस्वीर

उत्तर प्रदेश के पंचायती चुनावों का पहला चरण आरंभ हो चुका है। जिस ग्राम्य स्वराज्य की परिकल्पना महात्मा गांधी ने की थी। उसी के अनुरूप देश में पंचायती व्यवस्था है। इन चुनावों में काफी जोर-जोर से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाये जा रहे है। धनबल, बाहुबल का खुलकर प्रयोग हो रहा है। इन चुनावों को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का चुनाव माना जाता है। यही कारण है कि गांवों में आपसी रंजिश चरमसीमा पर है। हर गांव में दो-तीन गुट बन गये हैं। लोग मरने-मारने पर उतारू हैं। वह किसी भी तरह पंचायती चुनावों मे ंविजय पताका फहराना चाहते हैं। लेकिन यह लोग इन चुनावों के माध्यम से गांव की दशा और दिशा बदलने के लिए नहीं अपितु अपनी प्रतिष्ठा और सरकार से मिलने वाली भारी-भरकम धनराशि को हड़पने के लिए किया जा रहा है। पहले जब प्रधान का चुनाव सेवाभावना का होता था तो कोई भी सहज प्रधान या पंच बनने को तैयार नहीं होता था। उस समय प्रधान का मतलब फालतू खर्चा यानी बाहर से कोई हाकिम-हुक्काम आये तो उसकी आवभगत, गांव के सुख-दुख में सरोकारी होती थी। बड़ी मुश्ेिकल से किसी सम्मानित और ईमानदार व्यक्ति को ग्रामीण बिना चुनाव के ही अपना मुखिया चुन लेते थे। अब समूचा परिदृश्य बदल गया है। भ्रष्टाचार की गंगोत्री इतनी प्रबल और तेजस्वी ही गई है कि हर कोई इसमें गोता लगाना चाहता है। यही कारण है कि इन चुनावों में प्रधान पद के लिए लाखों रुपये बहाये जा रहे हैं। जिला पंचायतों व क्षेत्र पंचायत सदस्यों को भी जीतने के लिए भारी‘-भरकम धनराशि खर्च करनी पड़ रही है। यह सत्य को सभी जानते हैं कि ब्लाक प्रमुख अथवा जिला पंचायत अध्यक्ष में वही प्रत्याशी सफल होगा जो सदस्यों का बहुमत जुटा लेगा यानी उन्हें मैनेज कर लेगा। ऐसी स्थिति में कल्पना नहीं की जा सकती कि ग्रामों का विकास होगा या उनके प्रतिनिधियों का। काश! गांधी आज जिंदा होते तो ग्रामीण स्वराज्य पर सर धुनते। आखिर पंचायतों ने क्या बदला है गांवों का। जातीय व्यवस्था वहां कट्टरता के साथ हावी है। दबंग व्यक्ति के खिलाफ बोलने की कोई हिम्मत नहीं करता। मिड डे मील से लेकर मनरेगा तक में भारी-भरकम घोटाला हो रहा है। निर्माण के नाम पर कागजों पर काम हो रहे हैं। हां इतना अवश्य है कि चुने हुए प्रतिनिधि कुछ दिनों में अकूत सम्पदा के स्वामी हो जाते हैं। ग्रामीण परिवेश में समाई जातिवाद की खाई और आपसी नफरत के कारण ही डा. अम्बेडकर को दलितों को आह्वान करना पड़ा था कि यदि वे अपना विकास और सम्मान चाहते हैं तो उन्हें गांव छोड़कर शहर आना होगा। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन दलितों ने गांवों से शहरों की ओर पलायन किया। वह पढ़े-लिखे और उन्होंने उच्च पद प्राप्त किये। गांवों की तुलना में उन्हें शहरों में जातिवाद का जहर अधिक नहीं पीना पड़ा। किसी की बेगार और शोषण के शिकार नहीं हुए। अतः पंचायती चुनावों को कोई भी जीते या हारे लेकिन गांवों का कायाकल्प नहीं होगा। इस संदर्भ में हमारे नीति-नियंताओं और बुद्धिजीवियों को चिंतन और मनन करना चाहिए कि आखिर क्या खामी है हमारे पंचायती राज्य की संरचना में जिसमें धनबल और बाहुबल आजादी के बाद आज भी हावी है।

क्या बदलेगी पंचायतों की तस्वीर

उत्तर प्रदेश के पंचायती चुनावों का पहला चरण आरंभ हो चुका है। जिस ग्राम्य स्वराज्य की परिकल्पना महात्मा गांधी ने की थी। उसी के अनुरूप देश में पंचायती व्यवस्था है। इन चुनावों में काफी जोर-जोर से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाये जा रहे है। धनबल, बाहुबल का खुलकर प्रयोग हो रहा है। इन चुनावों को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का चुनाव माना जाता है। यही कारण है कि गांवों में आपसी रंजिश चरमसीमा पर है। हर गांव में दो-तीन गुट बन गये हैं। लोग मरने-मारने पर उतारू हैं। वह किसी भी तरह पंचायती चुनावों मे ंविजय पताका फहराना चाहते हैं। लेकिन यह लोग इन चुनावों के माध्यम से गांव की दशा और दिशा बदलने के लिए नहीं अपितु अपनी प्रतिष्ठा और सरकार से मिलने वाली भारी-भरकम धनराशि को हड़पने के लिए किया जा रहा है। पहले जब प्रधान का चुनाव सेवाभावना का होता था तो कोई भी सहज प्रधान या पंच बनने को तैयार नहीं होता था। उस समय प्रधान का मतलब फालतू खर्चा यानी बाहर से कोई हाकिम-हुक्काम आये तो उसकी आवभगत, गांव के सुख-दुख में सरोकारी होती थी। बड़ी मुश्ेिकल से किसी सम्मानित और ईमानदार व्यक्ति को ग्रामीण बिना चुनाव के ही अपना मुखिया चुन लेते थे। अब समूचा परिदृश्य बदल गया है। भ्रष्टाचार की गंगोत्री इतनी प्रबल और तेजस्वी ही गई है कि हर कोई इसमें गोता लगाना चाहता है। यही कारण है कि इन चुनावों में प्रधान पद के लिए लाखों रुपये बहाये जा रहे हैं। जिला पंचायतों व क्षेत्र पंचायत सदस्यों को भी जीतने के लिए भारी‘-भरकम धनराशि खर्च करनी पड़ रही है। यह सत्य को सभी जानते हैं कि ब्लाक प्रमुख अथवा जिला पंचायत अध्यक्ष में वही प्रत्याशी सफल होगा जो सदस्यों का बहुमत जुटा लेगा यानी उन्हें मैनेज कर लेगा। ऐसी स्थिति में कल्पना नहीं की जा सकती कि ग्रामों का विकास होगा या उनके प्रतिनिधियों का। काश! गांधी आज जिंदा होते तो ग्रामीण स्वराज्य पर सर धुनते। आखिर पंचायतों ने क्या बदला है गांवों का। जातीय व्यवस्था वहां कट्टरता के साथ हावी है। दबंग व्यक्ति के खिलाफ बोलने की कोई हिम्मत नहीं करता। मिड डे मील से लेकर मनरेगा तक में भारी-भरकम घोटाला हो रहा है। निर्माण के नाम पर कागजों पर काम हो रहे हैं। हां इतना अवश्य है कि चुने हुए प्रतिनिधि कुछ दिनों में अकूत सम्पदा के स्वामी हो जाते हैं। ग्रामीण परिवेश में समाई जातिवाद की खाई और आपसी नफरत के कारण ही डा. अम्बेडकर को दलितों को आह्वान करना पड़ा था कि यदि वे अपना विकास और सम्मान चाहते हैं तो उन्हें गांव छोड़कर शहर आना होगा। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन दलितों ने गांवों से शहरों की ओर पलायन किया। वह पढ़े-लिखे और उन्होंने उच्च पद प्राप्त किये। गांवों की तुलना में उन्हें शहरों में जातिवाद का जहर अधिक नहीं पीना पड़ा। किसी की बेगार और शोषण के शिकार नहीं हुए। अतः पंचायती चुनावों को कोई भी जीते या हारे लेकिन गांवों का कायाकल्प नहीं होगा। इस संदर्भ में हमारे नीति-नियंताओं और बुद्धिजीवियों को चिंतन और मनन करना चाहिए कि आखिर क्या खामी है हमारे पंचायती राज्य की संरचना में जिसमें धनबल और बाहुबल आजादी के बाद आज भी हावी है।