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शनिवार, 13 अगस्त 2011

प्रख्यात आल¨चक नामवर सिंह ने किया उषा यादव का सम्मान


प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने किया उषा यादव का सम्मान

आगरा। प्रख्यात साहित्यकार एवं केएम मुंशी हिंदी विद्यापीठ, डा. भीमराव अम्बेडकर विश्घ्वविद्यालय आगरा की पूर्व प्रोफेसर एवं साहित्यिक संस्था इन्द्रधनुष की अध्यक्ष डा. उषा यादव का विगत दिवस मीरा फाउंडेशन के तत्वावधान में कला संगम, उत्तर-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र इलाहाबाद में आयोजित भव्य समारोह में मीरा स्मृति सम्मान 2011 प्रख्यात आलोचक डा. नामवर सिंह ने प्रदान किया। समारोह के मुख्य अतिथि प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री डा. राकेशधर त्रिपाठी व विशिष्ट अतिथि केन्द्रीय हिंदी संस्थान के कुलसचिव डा. चन्द्रकांत त्रिपाठी थे। इस अवसर पर डा. नामवर सिंह ने डा. उषा यादव के साहित्यिक अवदान की
भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा उनके साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। समारोह में न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्ता, प्रख्यात साहित्यकार दूधनाथ सिंह, ममता कालिया, आउटलुक के संपादक नीलाभ सहित प्रदेश के वरेण्य साहित्यकार उपस्थित थे। कार्यक्रम का संयोजन डा. पृथ्वीनाथ पाण्डेय व संचालन डा. विजय अग्रवाल ने किया। डा. उषा यादव के सम्मानित होने पर पद्मश्री डा. लाल बहादुर सिंह चैहान, डा. राजकिशोर सिंह, डा. महाराज सिंह परिहार, शिवसागर, डा. सुषमा सिंह, डा. राजकुमार रंजन आदि ने हर्ष व्यक्त किया है।


फोटो परिचय- इलाहाबाद के कला संगम-उत्तर-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र् पर आगरा की साहित्यकार डा. उषा यादव का सम्मान करते प्रख्यात आलोचक डा. नामवर सिंह

रविवार, 7 अगस्त 2011

अन्‍ना मौन क्‍यों हैं निजी क्षेत्र में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार पर

अन्ना हजारे व उनकी कथित सिविल सोसायटी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान किया और उनकी इस मुहिम में सक्रिय भागीदारी की तथाकथित नवधनाढ्य और प्रोफेशनल्स ने। इस दौरान सरकारी भ्रष्टाचार की तो खुलकर बातें की गई, विदेशों में जमा काले धन पर सरकार को कोसा गया लेकिन निजी क्षेत्र में अजगर की भांति फैल गये भ्रष्टाचार पर किसी ने चर्चा करना भी उचित नहीं समझा। क्या कारण है कि कल के मामूली व्यापारी आज करोड़ो और अरबों में खेल रहे हैं। शिक्षा के निजीकरण के नाम पर भ्रष्टाचाररूपी अवैध कमाई को मुनाफे का नाम दिया जा रहा है। इसी तरह चिकित्सा को व्यापारियों के हाथों सौंपने से आम आदमी बिना इलाज के मर रहा है। सरकारी अस्पताल में तो मरीज को केवल बाहर से दवा लाने पर विवश किया जाता है लेकिन निजी अस्पताल तो मरीजों का घर और खेत सहित जेबर भी बिकवा रहे हैं। किसान का आलू जब खेत में होता है तो दो रुपये किलो बिकता है लेकिन जब वह धन्ना सेठ के गोदामों में पहुंच जाता है तो वह 15-20 रुपये किलो क्यों हो जाता है ?
किसानों से कौडि़यों के भाव जमीन खरीदकर कौन कुबेरपति बन जाता है ? अन्ना हजारे टीम के प्रिय वकील क्या गरीब, शोषित और ईमानदार लोगों का मुकदमा ल़ड़कर सम्पन्नतम हुए हैं। इस आंदोलन के दौरान आरक्षण हटाओ-भ्रष्टाचार मिटाओ का नारा भी दिया गया लेकिन सवाल यह है कि निजी क्षेत्र में तो आरक्षण नहीं है फिर वहां भ्रष्टाचार का नंगा नाच क्यों हो रहा है ? अन्ना की इस सिविल सोसायटी में कोई गरीब, मजदूर, किसान, दलित, पिछड़ा या अल्पसंख्यक क्यों नहीं है ? चंद सफेद कॉलर वाले व पूर्व नौकरशाह इस देश के अघोषित नियंता नहीं बन सकते। निजी क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव क्यौं चुप हैं ? क्या निजी क्षेत्र जनलोकपाल के दायरे में नहीं आना चाहिए ?
वस्तुतः निजी क्षेत्र को भी सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत लाना चाहिए, तभी देश से भ्रष्टाचार की खात्मे की शुरूआत होगी। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि भ्रष्टाचार की ज़डे काफी गहरी हैं। केवल लोकपाल विधेयक पास होने से देश में भ्रष्टाचार समाप्त होने की बात सोचने वाले लोग कल्पनालोक में विचरण कर रहे हैं। जब कोई बुराई कार्यालय और दुकान अथवा कार्यस्थल तक सीमित हो तो उसे रोका जा सकता है लेकिन अब भ्रष्टाचार ने घरों में प्रवेश कर लिया है। किसी भी माता-पिता ने अपनी संतान से इस कारण रिश्ता नहीं तोड़ा कि उसका पुत्र अथवा पुत्री भ्रष्ट है और रिश्वत अथवा कालाबाजारी में लिप्त हैं। किसी पत्नी ने इस बात पर अपने पति को तलाक नहीं दिया है कि उसका पति भ्रष्ट तरीके से पैसे बना रहा है। घर में घुसे भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए न कानून काम आयेगा और न ही अन्ना हजारे का अनशन।
जरूरत इस बात की है भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन शुरू हो। इसकी शुरूआत हमें अपने घर, गली, मोहल्ले व शहर से करनी होगी। अपने मित्रों और रिश्तेदारों से करनी होगी। मेरा अभिमत है कि भ्रष्टाचार को केवल सरकारी प्रयासों से समाप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि लोकतांत्रिक पद्धति में चुनाव होते हैं और चुनाव बेहद खर्चीले होते है। अतः केवल राजनेताओं और सरकारी मशीनतरी से भ्रष्टाचार समाप्ति की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं है। वैध स्त्रोतों से अधिक अर्जित संपत्ति को अगर जब्त किया जाये। भ्रष्ट और कालाबाजारियों के साथ उनके परिजनों को भी आरोपी माना जाना चाहिए क्योंकि आदमी अपनी पत्नी, बच्चों और परिवार के लिए ही भ्रष्ट तरीके से कमाई करता है। जब उसका परिवार हराम की कमाई से गुलछर्रे उड़ा सकता है तो इस अपराध से उसे वंचित क्यों किया जाना चाहिए। अगर ऐसा होता है कि हर पत्नी और बच्चों की निगाह अपने बाप पर होगी कि उनकी गलत कमाई से उन्हें भी जेल की हवा खाना पड़ सकती है। इस तरह का कानून बनना चाहिए कि जिसके अंतर्गतं हर व्यक्ति के आय-व्यय का हिसाब रखा जाये तो सहज ही भ्रष्टाचार दिखाई देने लगेगा। वैसे भ्रष्टाचार का मतलब केवल सरकारी रिश्वत नहीं है। अपितु जनता का दोहन करने वाली हर इकाई दोषी है। भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अन्ना के अनशन से काम नहीं चलेगा और न ही पूंजीवादी मीडिया के अर्नगल प्रलाप से। हमें समाज के हर क्षे़त्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना होगा। वह क्षे़त्र चाहे मीडिया का हो, एनजीओ का हो अथवा व्यापार का। अन्ना हजारे का यह जान लेना चाहिए कि जो संपन्न और सक्रिय वर्ग उनके साथ है, वह दिल से कभी नहीं चाहेगा कि भ्रष्टाचार समाप्त हो। जिस भ्रष्टाचार की बुनियाद पर वह शीर्ष पर हैं। सत्ता और धन के शिखर पर बैठे व्यक्ति कभी नहीं चाहेंगे कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आर-पार की ल़ड़ाई हो।




सावन का मस्‍त गीत

सावन का मस्त महीना, रिमझिम पड़ती फुहार मन को तरंगित और आल्हादित कर देता है! लेकिन यह बेदर्दी बरसात नायिका की विरह को नहीं समझ पाती! आइए पढि़ये मेरा सावन गीत-

धीरे धीरे बरसियों बदरवा रे।
भीगे भीगे रे मोरों अचरवा रे।।

संग सखिन बागन में जाऊं
तौऊ मन में मै अकुलाऊं
फूल गुलाब देखि इतरावै
संग भंवरन वो रास रचावै

मेरे प्यासे से रहि गये अधरवा रे
धीरे धीरे बरसियों बदरवा रे।

रैन दिना मोहे चैन न आवै
जियरा मेरौ पिउ पिउ गावै
छोटौ दिवरा ऊ इठलावै
रंग रास मोहे कछु न भावै

मेरौ धक धक करत करेजवा रे
धीरे धीरे बरसियो बदरवा रे

चूनर धानी पहिरै माटी
करी रतियां जांय न काटी
बैरिन कोयलिया बौरावै
और पानी में अगन लगावै

आज बेदर्दी है गयौ जमनवा रे
धीरे धीरे बरसियो बदरवा रे

ननद जिठानी बोली मारै
पिया तेरौ कहूं नैन लड़ावै
मोहे यापै सांच न आवै
प्यारे बलमा चौ तडफावै

मेरौ काबू में नाहें जोवना रे
धीरे धीरे बरसियो बदरवा रे

मंगलवार, 31 मई 2011

काहे री नलिनी उपन्यास पर उषा यादव को मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार


काहे री नलिनी उपन्यास पर उषा यादव को
मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार

आगरा। बहुमुखी लेखन की अप्रितम साहित्यकार डॉ. उषा यादव को मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी ने उनके उपन्यास काहे री नलिनी को अखिल भारतीय वीरसिंह देव पुरस्कार देने का फैसला लिया है। साहित्य अकादमी के इस निर्णय से शहर के साहित्यकर्मियों में उत्साह और हर्ष की लहर दौड़ गई। केन्द्रीय हिंदी संस्थान आगरा एवं डॉ. भीमराव अम्‍बेडकर विश्वविद्यालय के संस्थान कन्हैयालाल, माणिकलाल मुंशी हिंदी एवं भाषा विज्ञान विद्यापीठ के पूर्व प्रोफेसर डॉ. यादव को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ से बाल साहित्य का सर्वोच्च सम्मान बालसाहित्य भारती तथा विश्वविद्यालय स्तरीय सम्मान प्राप्त हो चुका है। सूचना प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा उन्हें भारतेन्‍द्रु हरिश्चंद्र पुरस्कार मिला है। उनका बाल उपन्यास पारस पत्थर चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट से पुरस्कृत हुआ है।
देश के वरिष्ठ बाल-साहित्यकार कानपुर निवासी चन्द्रपाल सिंह यादव मयंक की सुपुत्री एवं केआर महाविद्यालय मथुरा के पूर्व प्राचार्य तथा उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा आयोग के सदस्य डॉ. राजकिशोर सिंह की धर्मपत्नी डॉ. उषा यादव टुकड़े टुकड़े सुख, सपनों का इन्द्रधनुष, जाने कितने कैक्टस, चुनी हुई कहानियां, सुनो जयंती, चांदी की हंसली आदि कहानी संग्रह तथा प्रकाश की ओर, एक ओर अहल्या, धूप का टुकड़ा, आंखों का आकाश, कितने नीलकंठ, कथान्तर, अमावस की रात, काहे री नलिनी आदि उपन्यास एवं सपने सच हुए, हिंदी साहित्य के इतिहास की कहानी, राजा मुन्ना, अनोखा उपहार, कांटा निकल गया, लाख टके की बात, जन्म दिन का उपहार, दूसरी तस्वीर, दोस्ती का हाथ, मेवे की खीर, खुशबू का रहस्य, पारस पत्थर, नन्हा दधीचि, लाखों में एक, राधा का सपना, भारी बस्ता, तस्वीर के रंग सांगर मंथन आदि बाल साहित्य की पुस्तकें देश के लब्ध प्रतिष्ठित प्रकाशनों से प्रकाशित हुई हैं।
आपकी तर्पण कहानी का अंग्रेजी, सपनों का इन्द्रधनुष का उड़िया, मरीचिका कहानी का तेलगू, सुनो कहानी नानक बानी का पंजाबी भाषा में अनुवाद हुआ है। राजस्थान शिक्षा परिषद की कक्षा 6 की पाठ्य पुस्तक में उनकी कहानी दीप से दीप जले, महाराष्ट्र हायर सैकेंड्री बोर्ड की नवीं कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में ऊंचे लोग कहानी संकलित है।
डॉ. उषा यादव साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था इन्द्रधनुष की अध्यक्ष एवं प्राच्य शोध संस्थान की सचिव भी हैं। शहर की इस बहुआयामी लेखन की धनी लेखिका को मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने पर पदमश्री डा. लालबहादुर सिंह चौहान, चौ. सुखराम सिंह, डा. त्रिमोहन शाक्य तरल, डॉ. सुषमा सिंह, शिव सागर, डॉ. राजकुमार रंजन, डॉ. चन्द्रशेखर राठौड, कैलाश चौहान मायावी, डॉ. महाराज सिंह परिहार, डॉ. शशि तिवारी, जितेन्द्र रघुवंशी आदि ने हर्ष व्यक्त किया है।

रविवार, 29 मई 2011


मंचों पर सुंदरता और गलेबाजी का बोलवाला - सोम ठाकुर
हिंदी मंच का एक ऐसा नाम जो 1953 से आजतक अपनी कविता की सुगंध बिखेर रहा है। छह दशक के बाद भी उनके गीतों में आज भी वही ताजगी और रवानगी बरकरार है। नीरज जी के बाद वही कवि सम्मेलन में मंचों के शहंशाह हैं। आज भले ही हास्य कलाकारों ने हिंदी मंच का अवमूल्यन किया हो लेकिन सोम ठाकुर ने अपनी रचनाओं में हिंदी की अस्मिता और जीवन के शाश्वत मूल्यों को आत्मसात किया है। उनकी रचनाधर्मिता के संदर्भ में जनसंदेश टाइम्स की ओर से डॉ. महाराज सिंह परिहार इस प्रख्यात गीतकार से रूबरू हुए।

आप कई दशकों से हिंदी मंच पर हैं। क्या परिवर्तन देखते हैं आप पहले की अपेक्षा अब के हिंदी मंच पर ? क्या कारण रहा आपका काव्य मंचों से जुड़ने का।

पहले से आमूलचूल परिवर्तन आया है कवि सम्मेलनी मंच पर। पहले कविता पढ़ी जाती थी तो कवि को नाम मात्र का पारिश्रमिक मिलता था लेकिन आज मंचों पर भरपूर पैसा है। मेरा मंचों पर आने का प्रमुख कारण आर्थिक रहा। मेरे चार पुत्रियां और दो पुत्र थे जिनका अच्छा पालन-पोषण कालेज की प्राध्यापकी नौकरी में संभव नहीं था। उन दिनों डिग्री कालेज की नौकरी से अधिक पारिश्रमिक कवि सम्मेलनों में मिलता था। इसीलिए मैंने पहले आगरा कालेज, फिर सेंट जौंस कालेज तत्पश्चात नेशनल पोस्ट डिग्री कालेज भोगांव में हिंदी विभागाध्‍यक्ष की नौकरी छोड़कर काव्य पाठ को अपने जीवन-यापन का माध्यम बनाया।

आपको कोई अफसोस है कि आपने प्रोफेसरी के स्थान पर काव्य पाठ को ही अपना कैरियर बनाया?

नहीं, मुझे कोई अफसोस नहीं अपितु गर्व है कि मैंने कविता को ही अपना कैरियर बनाया। देश में अब तक लाखों डिग्री कालेजों के शिक्षक हैं लेकिन क्या किसी को सोम ठाकुर जैसी अपार लोकप्रियता मिली है। इसी कविता ने मुझे राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाई। महामहिम राष्ट्रपति और महामहिम राज्यपाल से सम्मानित कराया। देश-विदेशों का भ्रमण कराया। मैं प्रोफेसर सोम ठाकुर की अपेक्षा कवि सोम ठाकुर के रूप में गर्व और आनंद का अनुभव करता हूं।

कवि सम्मेलनों में कैसी रचनाएं पसंद की जाती हैं। क्या अच्छा रचनाकार मंचों पर वाह-वाही बटोर सकता है?

वास्तविकता यह है कि मंचों पर ब्रांड नेम ही चलते हैं, अच्छी रचनाएं नहीं। मंचों पर मशहूर ब्रांड नेम के कवियों को ही बुलाया जाता है और उन्हें ही भरपूर पारिश्रमिक दिया जाता है। बड़ा मुश्किल है किसी नवोदित रचनाकार का मंचों पर जम जाना। यहां भी स्थिति लेखक, पत्रकारों जैसी है। खुशवंत सिंह, कुलदीप नैयर कुछ भी लिखें, हर अखबार छापता है लेकिन नवोदित प्रतिभावान लेखकों को वह सम्मान नहीं मिलता।

क्या कारण है कि हिंदी मंचों से साहित्यकार विदा हो गये हैं और उनके स्थान केवल मंचीय कवियों ने ले लिया है ?

हां, यह सच्चाई है। पहले रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंशराय बच्चन, पंत, निराला और मैथिलीशरण गुप्त जैसे साहित्यकार मंचों पर काव्यपाठ करते थे लेकिन अब वह स्थिति नहीं है। अब मंचों पर भोंडा हास्य व द्विअर्थी तथाकथित कविताओं का बोलवाला होता जा रहा है। कविता साहित्य से हटकर विशुद्ध मनोरंजन में बदलती जा रही है।

हिंदी मंच की गिरावट के लिए कौन जिम्मेदार है। आखिर
इस
गिरावट से कैसे निपटा जा सकता है।

निश्चित रूप से मंच की गिरावट के लिए संयोजक जिम्मेदार हैं। वहीं विशुद्ध मनोरंजन करने वाले कवियों को बुलाते हैं। लेकिन इसके लिए संयोजकों की भी मजबूरी है। कवि सम्मेलन के लिए अधिकांश ऐसे पूंजीपति पैसा देते हैं जिनका साहित्य से कोई सरोकार नहीं होता और न ही समझ। उन्हें खुश करने और उनका मनोरंजन के लिए ही संयोजक को समझौता करना पड़ा है।

मंचों पर अधिकांश आकर्षक और सुंदर चेहरे-मोहरे वाली कवयित्रियों का ही बोल वाला रहा है। वरिष्‍ठ कवियों की अपेक्षा अनुभवी कवयित्रियां दिखाई नहीं पड़तीं?

महिलाओं का काव्य पाठ करना एक तरह से विजुअल आर्ट है। हर दर्शक आकर्षक और जवान महिला को देखना चाहता है। वैसे भी मंचों पर अधिकांश महिलाएं अपकी आकर्पक देहाष्ठि व गलेवाजी के कारण हैं। उनमें लेखन की प्रतिभा: नगण्य होती है। अधिकांश नामचीन कवि ही ऐसी काव्य गायिकाओं को प्रमोट करते हैं।

क्या कवि के लिए वैचारिक प्रतिवद्धता आवश्यक है अथवा मात्र लेखन ?

बिना वैचारिक प्रतिवद्धता के लेखन निठल्ला
चिंतन में बदल जाता है। लेखन के माध्यम से ही एक रचनाकार एक नये संसार का सृजन करता है और उसे अपने शब्दों के माध्यम से परवान चढ़ाने का निरंतर प्रयास करता है। जहां तक मेरा लेखन है, वह समाजवाद की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है।

जनसंदेश टाइम्स के पाठकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे ?

प्रदेश में तेजी से उभरता जनसंदेश टाइम्स निश्चित रूप से हाशिये पर पहुंचा दिये गये साहित्य और संस्कृति को प्रमुखता प्रदान कर रहा है, यह वर्तमान दौर में मीडिया के गिरावट के दौर में अच्छी शुरूआत है। यह पत्र साहित्य और जीवन के शाश्वत मूल्यों को प्रोत्साहित करे तथा नागरिकों को सुसंस्‍कृत करने का प्रयास जारी रखे। आज के भैतिकवादी युग में जब मूल्यों का स्थान स्वार्थपरता ने ले लिया है, ऐसे विषम समय में समाज का सही मार्गदर्शन करना ही किसी अखबार के लिए बडी चुनौती होता है।

सोम ठाकुर का पता
अहीर पाडा, राजा की मंडी आगरा मोबा. 9412255604

गुरुवार, 5 मई 2011

निजी क्षेत्र में भ्रष्‍टाचार की पराकाष्‍ठा - चुप क्‍यों हैं हजारे और रामदेव

निजी क्षेत्र में भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा - चुप क्यों हैं हजारे और रामदेव
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अभी दिल्‍ली में जंतर मंतर पर अन्‍ना हजारे व उनके कथित सिविल सोसायटी के लोगों ने भ्रष्‍टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान किया और उनकी इस मुहिम में भागीदारी की तथाकथित नवधनाढय और प्रोफेशनल्‍स ने। इस दौरान सरकारी भ्रष्‍टाचार की तो खुलकर बातें की गईं, विदेशों में काले धन पर सरकार को कोसा गया लेकिन निजी क्षेत्र में अजगर की भांति फैल गये भ्रष्‍टाचार की किसी ने चर्चा करना भी उचित नहीं समझा। क्‍या कारण है कि कल के मामूली व्‍यापारी आज करोडो और अरबों में खेल रहे हैं। शिक्षा के निजीकरण के नाम पर भ्रष्‍टाचाररूपी अवैध कमाई को मुनाफे का नाम दिया जा रहा है। इसी तरह चिकित्‍सा को व्‍यापारियों के हाथों सौंपने से आम आदमी बिना इलाज के मर रहा है। सरकारी अस्‍पताल में तो मरीज को केवल बाहर से दवा लाने पर विवश किया जाता है लेकिन निजी अस्‍पताल तो मरीजों के घर और खेत बिकवा रहे हैं। किसान का आलू जब खेत में होता है तो दो रुपये किलो बिकता है लेकिन जब वह धन्‍ना सेठ के गोदामों में पहुंच जाता है तो वह 10 रुपये किलों क्‍यों हो जाता है। किसानों से कौडियों के भाव जमीन खरीदकर कौन कुबेरपति बन रहा है। अन्‍ना हजारे के प्रिय वकील क्‍या गरीब, शोषितों, मेहनतकश और ईमानदार लोगों का मुकदमा लडकर सम्‍पन्‍नतम हुए हैं। इस आंदोलन के दौरान आरक्षण हटाओ-भ्रष्‍टाचार मिटाओं का नारा भी दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि निजी क्षेत्र में तो आरक्षण नहीं है फिर वहां भ्रष्‍टाचार का नंगा नाच क्‍यों हो रहा है। अन्‍ना की इस सिविल सोसायटी में कोई गरीब, मजदूर, किसान, दलित, पिछडा या अल्‍पसंख्‍यक क्‍यों नहीं है। चंद सफेद कालर वाले व पूर्व नौकरशाह इस देश के अघोषित नियंता नहीं बन सकते। निजी क्षेत्र में फैले भ्रष्‍टाचार पर अन्‍ना हजारे और बाबा रामदेव क्‍यों चुप हैं, क्‍या निजी क्षेत्र जनलोकपाल के दायरे में नहीं आना चाहिए। वस्‍तुत निजी क्षेत्र को भी सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत लाना चाहिए तभी देश से भ्रष्‍टाचार के खात्‍मे की शुरूआत होगी।